8 जून 2018

दुःखों की बस्ती

3.दुःखों की बस्ती
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दुःखों की बस्तियों में तो, बस आँसू का बसेरा है
जिधर भी देखती हूँ मैं, मिला डूबा अँधेरा है...
वो देखो जी रहें हैं यूँ, न रोटी है न कपड़ा है
उन्हें मायूसियों के फिर, घने जंगल ने घेरा है...
नहीं रुख़्सत हुई बेटी, न कंगन है न जोड़ा है
ये आँखें राह तकती हैं, विरासत में अँधेरा है...
नज़र आती नहीं कोई, किरण उम्मीद की उनको 
मगर सेठों के घर में तो, सवेरा ही सवेरा है...
मिले कोई तो अब उनको, जो समझे हाले दिल उनका
न छेड़ो ये तराना तुम, ये मेरा है ये मेरा है...

Dr.Bhawna Kunwar

28 मई 2018

बस यादें

आज बहुत दिनों बात ब्लॉग पर आना हुआ पर अब कोशिश रहेगी कि निरन्तर आती रहूँ आप सबका पहले की तरह ही स्नेह मिलेगा इस आशा से फिर से एक बार नई शुरुआत करती हूँ,पढियेगा मेरा संस्मरण उदन्ती में...

http://www.udanti.com/2018/05/blog-post_96.html







































Bhawna

27 जून 2017

दुःखों की बस्ती

3- दुःखों की बस्ती


दुःखों की बस्तियों में तो, बस आँसू का बसेरा है
जिधर भी देखती हूँ मैं, मिला डूबा अँधेरा है।

वो देखो जी रहें हैं यूँ, न रोटी है न कपड़ा है
उन्हें मायूसियों के फिर, घने जंगल ने घेरा है।

नहीं रुख्सत हुई बेटी, न कंगन है न जोड़ा है
ये आँखे राह तकती हैं, विरासत में अँधेरा है।

नजर आती नहीं कोई, किरण उम्मीद की उनको
मगर सेठों के घर में तो, सवेरा ही सवेरा है।

मिले कोई तो अब उनको, जो समझे हाले दिल उनका
छेड़ो ये तराना तुम, ये मेरा है ये मेरा है।

Bhawna

9 जून 2017

लिक्खी है पाती

2- लिक्खी है पाती
 
अब ये दुनिया नहीं है भाती
तभी तुम्हें लिक्खी है पाती।

खून-खराबा है गलियों में,
छिपे हुए हैं बम कलियों में,
है फटती धरती की छाती,
तभी तुम्हें लिक्खी है पाती।

उज़ड़ गये हैं घर व आँगन,
छूट गये अपनों के दामन,
यही देख के मैं घबराती,
तभी तुम्हें लिक्खी है पाती।

बढ़ी बहुत बेचैनी मन में,
फैल रही नफरत जन-जन में
नही नींद भी अब आ पाती,
तभी तुम्हें लिक्खी है पाती।

Bhawna

3 जून 2017

ज़रा रोशनी मैं लाऊँ

1-ज़रा रोशनी मैं लाऊँ 

छाया घना अँधेरा
ज़रा रोशनी मैं लाऊँ 
ये सोचकर कलम को
मैंने उठा लिया है...
घूमें गली-गली में 
नर-वहशी और दरिंदे
तड़पें शिकार होकर
घायल पड़े परिंदे
उनके कटे परों पर
मरहम लगा दिया है।
ये सोचकर कलम को
मैने उठा लिया है...
सजदे में झुकते सर भी
रहते कहाँ सलामत
पूजा के स्थलों में 
आ जाये कब क़यामत 
नफरत पे प्रेम का रंग
थोड़ा चढ़ा दिया है।
ये सोचकर कलम को
मैने उठा लिया है...                       
ढूँढें डगर कहाँ जब
क़ानून ही है अंधा
मर्ज़ी से इसको बदलें
नेताओं का है धंधा
आँखों में आस का अब
दीपक जला दिया है।
ये सोचकर कलम को
मैने उठा लिया है... 
"अंतर्राष्ट्रीय हिंदी कविता प्रतियोगिता में तृतीय स्थान प्राप्त"
Bhawna