16 जुलाई 2018

चोका/नया सवार





मझदार में
एक नाव थी फँसी
सवार आया
देख वो घबराया
नाव को लेके
था किनारे लगाया ।
बना गहरा
मधुर,विलक्षण
प्यारा सा रिश्ता ।
कितने सफ़र थे
संग में किए
वो सपने सारे ही
साकार हुए ।
काँटों की राह चले
पीछे ना हटे ।
छूट गए सारे ही
सगे संबंधी ।
मासूम वो सवार
बड़ा नादान
छल-कपट भरी,
बेदर्द इस
दुनिया से अन्ज़ान ।
बाज़ सा आया
इक नया सवार
उसे कहाँ था
भला इसका ज्ञान।
ले गया नाव
वो दूर देश कहीं
दोनों हैं खुश
तिल-तिल मरता
आँसू है पीता
पर चुप रहता
कभी झील को
मझदार को कभी
यूँ अपलक
निहरता रहता
वो पुराना सवार।


Dr.Bhawna Kunwar

8 जून 2018

दुःखों की बस्ती

3.दुःखों की बस्ती
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दुःखों की बस्तियों में तो, बस आँसू का बसेरा है
जिधर भी देखती हूँ मैं, मिला डूबा अँधेरा है...
वो देखो जी रहें हैं यूँ, न रोटी है न कपड़ा है
उन्हें मायूसियों के फिर, घने जंगल ने घेरा है...
नहीं रुख़्सत हुई बेटी, न कंगन है न जोड़ा है
ये आँखें राह तकती हैं, विरासत में अँधेरा है...
नज़र आती नहीं कोई, किरण उम्मीद की उनको 
मगर सेठों के घर में तो, सवेरा ही सवेरा है...
मिले कोई तो अब उनको, जो समझे हाले दिल उनका
न छेड़ो ये तराना तुम, ये मेरा है ये मेरा है...

Dr.Bhawna Kunwar

28 मई 2018

बस यादें

आज बहुत दिनों बात ब्लॉग पर आना हुआ पर अब कोशिश रहेगी कि निरन्तर आती रहूँ आप सबका पहले की तरह ही स्नेह मिलेगा इस आशा से फिर से एक बार नई शुरुआत करती हूँ,पढियेगा मेरा संस्मरण उदन्ती में...

http://www.udanti.com/2018/05/blog-post_96.html







































Bhawna

27 जून 2017

दुःखों की बस्ती

3- दुःखों की बस्ती


दुःखों की बस्तियों में तो, बस आँसू का बसेरा है
जिधर भी देखती हूँ मैं, मिला डूबा अँधेरा है।

वो देखो जी रहें हैं यूँ, न रोटी है न कपड़ा है
उन्हें मायूसियों के फिर, घने जंगल ने घेरा है।

नहीं रुख्सत हुई बेटी, न कंगन है न जोड़ा है
ये आँखे राह तकती हैं, विरासत में अँधेरा है।

नजर आती नहीं कोई, किरण उम्मीद की उनको
मगर सेठों के घर में तो, सवेरा ही सवेरा है।

मिले कोई तो अब उनको, जो समझे हाले दिल उनका
छेड़ो ये तराना तुम, ये मेरा है ये मेरा है।

Bhawna