29 फ़रवरी 2016

किस्मत

कुछ ऐसे हालात बने कि मेरा ब्लॉग मुझे पुकारता रहा और मैं उसकी पुकार सुनकर भी उस तक ना आ सकी किस्मत ने कुछ ऐसा पटका दिया कि अब तक नहीं सँभल पाई दुःख तो बहुत है पर जहाँ अपनी नहीं चलती वहाँ क्या किया जाए-

रूठ जाती है किस्मत कभी 
तो कभी साथी छोड़ देता है साथ
 खिलाए थे जो रंग-बिरंगे फूल संग-संग हमने
खो जाती है उनकी खुशबू कहीं
और हम मन को मजबूती से पकड़े
समेटने की नाकामयाब कोशिश 
करते रह जाते हैं आखिरी साँस के साथ...

2016 में "हम लोग" पत्रिका में पेज न० 61पर मेरे कुछ माहिया प्रकाशित हुए हैं लिंक है-

file:///C:/Users/Bhawna/Downloads/humlog%202016%20final%20new.pdf

Bhawna

29 अगस्त 2015


"राखियाँ घर नहीं आईं"

सदा की तरह राखियों से
बाज़ार सजा होता,
कलाई सजे भाई की
ख़्वाब बहन का होता।
छोटे थे हम
प्यारा हमारा भाई
जाने फिर भी क्यूँ
सूनी रहती उसकी कलाई,
डबडबाई आँखों में
हजारों सवाल तैरते
जवाब भी मिलता
पर समझ नहीं आता।
दिखती बहना रोती कहीं
भाई बिना सूनी भई।
कहीं भाई उदास होता
बहना उसके है नहीं।
पर हम तो हैं, दो छोटी बहनें,
बड़ा है, प्यारा सा एक भाई,
जाने क्यूँ फिर घर हमारे
राखियाँ ही नहीं आईं?
आँसुओं से,लबालब आँखे
एकदूसरे को निहारती,
दुःख से हम बिलख ही पड़ते,
फिर तीनों गले लगते
रोते-रोते सो जाते
दर्द भरे सपनों में खो जाते।
आज बड़े हो गए
समझ भी अब सयानी हो गई
"आन पड़ी है"
कहानी ये पुरानी हो गई
भाई की लम्बी उम्र की कामना
आज भी हर साँस करती है।
पर आज भी तिरती है आँखों में,
राखियों से सजी थाली
पर बात अब भी वही
पुरानी रूढ़ी, परम्परा वाली।
अब तो परदेस में बसी हूँ,
पर पुराने रिवाज़ों में अब भी फँसी हूँ।
भाई की सूनी कलाई,
आज भी सीने में खटकती है।
आज भी आँखों में, वो नमी
बेरोक-टोक विचरती है,
और सदा की भाँति "राखी"
आज भी तो बस हमारे
दिल ही में सँवरती है।

डॉ० भावना कुँअर















Bhawna