10 मई 2020

मातृ दिवस

मातृ दिवस पर माँ को समर्पित ये दो दोहे..❤❤️सभी को मातृ दिवस की शुभकामनाएँ❤❤
❤
ऐसी सबकी सोच हो, दे नारी को मान
यही सृष्टि मैंने रची, सोचेगा भगवान।
❤
वो ही रहें अनन्त तक, मन मंदिर के ईश
मात-पिता के सामने, झुका रहे ये शीश।


















Dr.Bhawna Kunwar

7 अगस्त 2019

सुषमा स्वराज जी

सुषमा स्वराज जी का इस लोक का सफ़र समाप्त होने की खबर ने मन 
को दु:ख से विचलित कर दिया।उन्हें भावपूर्ण श्रद्धाजंलि देती हूँ...

(हाइकु)

याद कलश
रीते न होंगे कभी
अनन्त तक। 


लो हम चले

दूसरे सफ़र पे
ख़ोजना नहीं।












Dr.Bhawna Kunwar

कालिदास/मेघदूत / ताँका

ताँका रचनाएँ

1
सूख चुकें हैं
घटाओँ के भी आँसू
बनी है शिला
कभी न बरसेगी
न कभी हरसेगी ।

2
मन भीतर
छन्न से कुछ टूटा
बिखरा सब
काले मेघों ने मुझे
इस तरह लूटा।

3

बची हैं कुछ
उलझी-उलझी सी
यादें पुरानी
जीने की चाह अब
हो चुकी है बेमानी।

4
सीले संदेश 
मुझ तक जो आए
पढें न जाएँ
बरस गईं आँखें 
होंठ कँपकँपाएँ।

5
तेज हवाएँ
ले उड़ी थी सन्देशे
जो भिजवाए
यादों के वो पन्ने भी
हुए अब पराए।

6
छीन ली पाती
जो मेघा ले चले थे
अश्रू भरे थे
सीपियों के बीच से
मोती बन झरे थे।

7
दुनिया वाले
ऊँगलियाँ उठाए
सीता पर भी
आँसुओं से नयना
भर-भर हैं जाएँ।
8
उमड़ पड़ा
आँसुओं का सैलाब
आँखों से आज
ये कैसा है तूफ़ान
जो ले गया है जान।

9
छलनी हुआ
से मासूम सा दिल
बिना कसूर
मिली ये कैसी सजा
कुछ पता न चला।

Dr.Bhawna Kunwar

4 नवंबर 2018

मिट्टी का दीया

शाम के वक्त
घर लौटते हुए
चौंका दिया मुझे एक

दर्द भरी आवाज़ ने
मैं नहीं रोक पाई स्वयं को
उसके करीब जाने से
पास जाकर देखा तो
बड़ी  दी अवस्था में
पड़ा हुआ था एक मिट्टी का दीया
मैंने उसको उठाकर...
अपनी हथेली पर रखा
और प्यार से सहलाकार पूछा
उसकी कराहट का मर्म...
उसकी इस अवस्था का जिम्मेदार...
वह सिसक पड़ा...
और टूटती साँसों को जोड़ता हुआ सा
बहुत छटपटाहट से बोला...
"मैं भी होता था बहुत खुश
जब किसी मन्दिर में जलता था
मैं भी होता था खुश जब...
दीपावली से पहले लोग मुझे ले जाते थे अपने घर
और पानी से नहला-धुलाकर
बड़े प्यार से कपड़े से पोंछकर
सजाते थे मुझे तेल और बाती से
और फिर मैं...
देता था भरपूर रोशनी उनको
झूमता था अपनी लौ के साथ
करता था बातें अँधियारों से
जाने कहाँ-कहाँ कि मिट्टी को
एक साथ लाकर
कारीगर देता था एक पहचान हमें
दीए की शक्ल में
और हम सब मिल-जुलकर
फैलाते थे एक सुनहरा प्रकाश
पर अब...
हमारी जगह ले ली है
सोने, चाँदी और मोम के दीयों ने
अब तो दीपावली पर भी लोग दीये नहीं
लगातें हैं रंग बिरंगी लड़ियाँ
बल्ब और मोमबत्तियाँ
और मिटा डाला हमारा अस्तित्व
एक ही पल में
तो फिर अब भी क्यों रखा है
नाम दीपावलीयानी
दीयों की कतार...
आज फेंक दिया हमें...
इन झाड़ियों में
तुम आगे बढ़ोगी
तो मिलेंगे तुम्हें मेरे संगी-साथी
इसी अवस्था में
अपनी व्यथा सुनाने को
पर तुमसे पहले नहीं जाना किसी ने भी...
हमारा दर्दहमारी तड़प
आज  वही भूला बैठे हैं हमें
जिन्हें स्वयं जलकर
दी थी रोशनी हमने"

Dr.Bhawna Kunwar