31 दिसंबर 2006

दिल के दरमियाँ की ओर से आप सबको नव-वर्ष हार्दिक शुभकामनाएँ

ओढ़े हुए है
कोहरे की चादर
नूतन वर्ष।


सर्द हवाएँ
करती आलिंगन
नव-वर्ष का।



पछीं समूह
गाये मधुर गीत
नये साल के।




करें स्वागत
खुशियाँ ले के हम
नव-वर्ष का।




ये नव-वर्ष
प्रेम संदेश लिये
खड़ा द्वार पे।



डॉ० भावना कुँअर

26 नवंबर 2006

फुरसत से घर में आना तुम



फुरसत से घर में आना तुम

और आके फिर ना जाना तुम


मन तितली बनकर डोल रहा

बन फूल वहीं बस जाना तुम ।


अधरों में अब है प्यास जगी

बन झरना अब बह जाना तुम ।


बेरंग हुए इन हाथों में

बन मेहदी अब रच जाना तुम ।


पैरों में है जो सूनापन

महावर बन के सज जाना तुम ।


डॉ० भावना

4 नवंबर 2006

डॉ० भावना कुँअर की काव्य चर्चा - दैनिक जागरण में !!

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29 अक्तूबर 2006

नन्हें पाँव

१४ नवम्बर पर आने वाले बाल दिवस पर मेरी एक रचना



हाथ पकडकर अनुज को अपने जो चलना सिखलाते हैं
वही आदमी जग में सच्चे दिग्दर्शक कहलातें हैं।

ठोकर लगने पर भी कोई हाथ बढाता नहीं यहाँ
सोचा था नन्हें बच्चों के पाँव सभी सहलाते हैं।

नन्हें बोल फूटते मुख से तो अमृत से लगते हैं
मगर तोतली बोली का भी लोग मखौल उडाते हैं।

खुद तो लेकर भाव और के बात सदा ही कहते हैं
ऐसा करने से वो खुद को भावहीन दर्शाते हैं।

हैं कुछ ऐसे उम्र से ज्यादा भी अनुभव पा जाते हैं
और हैं कुछ जो उम्र तो पाते अनुभव न ला पाते हैं।
डॉ० भावना कुअँर

26 अक्तूबर 2006

दीपावली हाइकु

मेरी और मेरे परिवार की ओर से आप सबको दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें:


करो रोशन

बुझते चिरागों को

इस पर्व में।


जगमग है

दियों की कतार से

सारा आलम।


हँसी रोशनी

जीत पर अपनी

अँधेरा रोया।


रंगोली सजे

दीपों की रोशनी से

अँधेरा मिटे।


झूम रहे हैं

रंगीन कंदीलों से

घर आँगन।


सुख समृद्धि

लाये ये दीपावली

जन - जन में।


डॉ० भावना

25 अक्तूबर 2006

हिन्दी का परचम लहरायें


सब मिलकर आज, कसम ये खायें
हिन्दी को उच्च स्थान दिलायें ।

लगे प्रचार में हम सब मिलकर
ऐसा ही इक प्रण निभायें ।

पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण
हिन्दी का परचम लहरायें।

इस भाषा के चाहने वालों
यादगार ये दिवस बनायें।

दुनिया भर के हिन्दी भाषी
इसको नत मस्तक हो जायें।
डॉ० भावना कुँअर

बस तुम यादें छोड गयीं



मैं और तुम खेला करते

गलियों में,चौबारों में

आँगन में चौपालों में।

मैं और तुम झूला करते

सावन के आने पर

पेडों की डालों पर।

मैं और तुम ब्याह रचाते थे

गुड्डे और गुडियों का

सब कुछ होता कहानी की परियों सा।

मैं और तुम रूठा करते

पर खुद ही मन जाते

फिर इक दूजे से दूर ना जाते।

आज अचानक हुआ है क्या?

जो तुम मुझसे रूठ गयी

गलियाँ,चौबारे,आँगन,चौपालें

सब कुछ यूँ ही छोड गयीं।

सूने हो गये झूले सब,

पेडों की डाली सिसक रही

बाट जोह रहे गुड्डे गुडिया

क्यूँ तुम मुँह अब मोड गयी?

मात - पिता जब छूटे थे-

तब तुमने मुझे संभाला था

आज तुम मुझसे छूट गयी

अब मुझको कौन संभालेगा?

सूनी हो गयी मेरी कलाई

अब रखिया कौन बांधेगा?

कौन कहेगा मुझको भैय्या?

अब कौन मुझे दुलारेगा?

कैसे हो गयी निष्ठुर तुम?

साथ जो मेरा छोड गयी

यहाँ वहाँ मैं ढूँढू तुमको

बस तुम यादें छोड गयीं

बस तुम यादें छोड गयीं।
डॉ० भावना कुँअर

मेरी अम्मा के गाँव में



मुझे आज फिर मेरी अम्मा याद आईं हैं।

छूकर हवा जब मुझको है लौटी

याद आई है मुझे अम्मा की रोटी।

नहीं भूल पायी हूँ आज भी-

उस रोटी की सौंधी-सौधीं खुशबू को

मिल बैठकर खाने के-

उस प्यारे से अपनेपन को

साँझ ढलते ही-

नीम के पेड की छांव में-

अपनी अम्मा के-

सुहाने से उस गाँव में-

चौकडी लगाकर सबका ही बैठ जाना

फिर दादा संग किस्से कहानियाँ सुनना, सुनाना।

नहीं भूली मैं खेत - खलिहानों को

उन कच्चे - पक्के आमों को।

जब अम्मा याद आती है-

तब आँखें भर-भर जाती हैं।

खोजती हूँ उनको-

खेतों में खलिहानों में

उस नीम की छाँव में

उन कहानियों में, उन गानों में

पर अम्मा नहीं दिखती

बस दिखती परछाई है।

न जाने ऊपर वाले ने

ये कैसी रीत चलाई है

हर बार ही किसी अपने से

देता हमें जुदाई है

और इस दिल के घरौंदें में

बस यादें ही बसाई हैं

मुझे आज फिर मेरी अम्मा याद आईं हैं

मुझे आज फिर मेरी अम्मा याद आईं हैं।

डॉ० भावना कुँअर

19 सितंबर 2006

मुम्बई बम ब्लास्ट



मुम्बई में १० जुलाई २००६ को हुए बम ब्लास्ट पर कुछ हाइकुः


तिथि १० जुलाई २००६

मुम्बई शहर में

हुयी बर्बादी।


इन्सान ने ही

उडाई हैं धज्जियाँ

इन्सान की ही।


तेज था बडा

वो बम का धमाका

ट्रेन में आज।


जलती लाशें

रोते लोग दर्द से

असहनीय।


आसमान में

काला सर्प सा धुआँ

फन फैलाए।


दर्दनाक था

सदमें का असर

मिटा ही नहीं।

डॉ० भावना कुँअर

10 सितंबर 2006

मजबूर गरीब


दुःखों की बस्तियों में तो, बस आँसू का बसेरा है
जिधर भी देखती हूँ मैं, मिला डूबा अँधेरा है।


वो देखो जी रहें हैं यूँ, न रोटी है न कपडा है
उन्हें मायूसियों के फिर, घने जंगल ने घेरा है।


नहीं रुख्सत हुई बेटी, न कंगन है न जोडा है
ये आँखे राह तकती हैं, विरासत में अँधेरा है।

नजर आती नहीं कोई, किरण उम्मीद की उनको
मगर सेठों के घर में तो, सवेरा ही सवेरा है।


मिले कोई तो अब उनको, जो समझे हाले दिल उनका
न छेडो ये तराना तुम, ये मेरा है ये मेरा है।

डॉ० भावना

7 सितंबर 2006

माँ

आज मेरी माँ का जन्मदिन है।मैंने एक रचना उनके लिए लिखी है जो आप सबके साथ बाँट रही हूँ। रोजी रोटी के लिए अपने वतन से दूर हूँ जन्मदिन पर जा भी नहीं सकती चैट कर सकती हूँ, फोन कर सकती हूँ और वैब कैम पर देख सकती हूँ, पर इतने सब से मन कहाँ मानता है क्योंकि माँ से बढकर इस दुनिया में है ही क्या माँ तो सबको ही प्यारी होती है...





माँ मुझे भी प्यारी है, माँ तुम्हें भी प्यारी है

माँ इस दुनिया में, सबसे ही न्यारी है।


बचपन में ऊँगली पकडकर,चलना सिखाया था हमको

आज उन हाथों को, थामने की बारी हमारी है।


माँ मुझे भी प्यारी है, माँ तुम्हें भी प्यारी है

माँ इस दुनिया में, सबसे ही न्यारी है।


जो अनेक प्रयत्नों के बाद, खिला पाती थी रोटी के टुकडे

अब थके हुए उन हाथों को, ताकत देने की बारी हमारी है।


माँ मुझे भी प्यारी है, माँ तुम्हें भी प्यारी है

माँ इस दुनिया में, सबसे ही न्यारी है।


कदम से कदम मिलाकर, चलना सिखाया था जिसने

उन लडखडाते कदमों को, सहारा देने की बारी हमारी है।


माँ मुझे भी प्यारी है, माँ तुम्हें भी प्यारी है

माँ इस दुनिया में, सबसे ही न्यारी है।


रातभर जागकर भी, हमें मीठी नींद सुलाया था जिसने

उन खुली आँखों की, थकन मिटाने की बारी हमारी है।


माँ मुझे भी प्यारी है, माँ तुम्हें भी प्यारी है

माँ इस दुनिया में, सबसे ही न्यारी है।
डॉ० भावना

3 सितंबर 2006

बूँद

जब आँख से छलकी


तो आँसू बन गई



गिरी बादल से

तो बरखा बन गई



जब पत्तों से खनकी


तो मोती बन गई



गिरी परिश्रम से


तो पसीना बन गई



जब केश से गिरी


तो गंगा बन गई
डॉ० भावना

28 अगस्त 2006

दुल्हन


माथे पे बिंदिया चमक रही

हाथों में मेंहदी महक रही।


शर्माते से इन गालों पर

सूरज सी लाली दमक रही।


खन-खन से करते कॅगन की

आवाज़ मधुर सी चहक रही।


है नये सफर की तैयारी

पैरों में पायल छनक रही।
डॉ० भावना

21 अगस्त 2006

प्यार की इमारत

मेरे जन्मदिन पर मेरे पति महाशय ने मुझे एक बहुत खुबसूरत तोहफा दिया जिसे मैं सहेजकर हमेशा अपने पास रखती हूँ वो शब्द जो उन्होंने मेरी तारीफ में कहे हैं उनसे अपनी साइट की शान बढाना चाहूँगी।


कभी मुझपे है प्यार आता कभी मुझसे शिकायत है,

न जाने प्यार करने की खुदा कैसी रिवायत है।


कभी मैं डूबता हूँ प्यार की गहराईयों तक भी,

मगर पाता तुझे ही हूँ वहाँ, कैसी कयामत है।


कोई भटका हो सहरा में और उसको झील मिल जाए,

तुझे पाकर लगा ऐसा, मिली ऐसी नियामत है।


मैं तुझको देखता था, सोचता था, बात करता था,

बडी मुश्किल से ये जाना, मुझे तुमसे मुहब्बत है।


दिलों की दफन है जिसमें मुहब्बत आज तक जिन्दा,

उसे हम ताज कहते है वो इक ऐसी इमारत है।

प्रगीत कुँअर

15 अगस्त 2006

स्वतन्त्रता के दिवस पर मेरी एक रचना आप सबके लियेः



मॉ का दर्द

एक रात मैं सो नहीं पाई;

सपनों में भी खो नहीं पाई।

उठकर रात में ही चल पडी;

थी बडी कूर बेरहम घडी।

चलते हुए कदम लडखडा रहे थे;

मन में भी बुरे-बुरे ख्याल आ रहे थे।

कुछ कदम चलने पर देखा

मेरा प्यारा देश जंजीरों में जकडा।

कैसे इसे छुडाऊँ?

कौन सी तरकीब लगाऊं?

तभी मेरे बेटे ने भाँप लिया मेरा दर्द

और बोला मत हो उदास

मैं कराऊँगा जरूर आजाद।

नई नई योजनाएँ बनाईं;

बहुत तरकीबें लगाईं।

लडा सच्चाई की लडाई;

जरा भी थकन न पाई।

फाँसी पर गया लटकाया;

पर जरा भी न घबराया।

फाँसी का फँदा कसता गया;

फिर भी भगत मेरा हँसता रहा।

काश एक नहीं मेरे होते हजार बेटे।

तो वो भी हँसते हँसते यूँ ही जान दे देते।

डॉ० भावना

11 अगस्त 2006

१६ अगस्त को आने वाली जन्माष्टमी के पर्व पर कुछ हाइकु

1.

गैय्या से खेले
हैं, मैय्या की गोद में।
मोर निहारे।।

2.

देख रहे हैं
गिराकर मटकी
नटखट से।

3.

रूठा है मैय्या
वो माखन खिवैय्या
कृष्ण कन्हैया।

4.


मैय्या पुकारे
आँगन में खेले हैं
नन्द दुलारे।

5.


खुश बहुत
यशोदा मैय्या, जन्मा
कृष्ण कन्हैया।
डॉ० भावना

9 अगस्त 2006

आज रक्षाबंधन पर मेरे कुछ हाइकु



1.

रंग बिरंगी

राखियों से सजी हैं

सभी दुकानें।

2.

तकती राहें

भाईयों के आने की

बहनें आज ।

3.

परदेस में

बहना ने भाई को

भेजी है राखी ।

4.

बँधा है आज

पवित्र से धागे से

दोनों का प्यार ।

5.

टूटता नहीं

बंधन ये प्यार का

साँसों के जैसा ।

6.

पडी है सूनी

भईया की कलाई

राखी न आई ।

डॉं० भावना