18 दिसंबर 2008

अनकही दास्ताँ...

आप सभी मित्रों के सहयोग और स्नेह के कारण आज़ मैं भी कर पूरी कर पाई सैंचुरी और कोई समय होता तो आप सबको केक खिलाया जाता पहले की तरह लेकिन कोई बात नहीं उधार रहा जैसे ही मूड़ अच्छा होगा आप सबको केक खिलाया जायेगा...


आज़कल कुछ अनजान सायों के बीच घिरी रहती हूँ मैं, चाहे रात का समय हो, या फिर दिन का, जिंदगी मानों थम सी गयी हो लाख चाहने के बावजूद भी खुद को सामान्य नहीं कर पाती हूँ। आज़कल बच्चों की छुट्टियाँ चल रहीं हैं, वो भी मेरा चेहरा देखकर रोज़ ही एक सवाल करते हैं-“ मम्मा आप इतना उदास और खोये-२ क्यों रहते हो ? ना ही हमारे साथ खेलते हो ना ही कहीं घूमने जाते हो, ना ही ठीक से बात करते हो हमारी तो सारी छुट्टियाँ आपके इसी मूड़ के साथ बीती जा रही हैं।“
मूड़ जी हाँ ये मूड़ भी अजीब चीज है कभी-२ कितना भी समझाओ खुद को, कि हमें दुखों से नहीं घबराना है, हिम्मत रखना है, संभालना है खुद को, पर हम हार जाते हैं,अब चाहे वह दुख मुम्बई में हुए हादसे से संबन्धित ही क्यों ना हो।

आँखों के आगे कभी शहीदों के परिवार वालों के चेहरे, कभी अपनों के बिछड़ने से रोते-बिलखते परिवार, कभी मोशे जैसे अनेक बच्चों की सिसकियाँ कानों में गूँजती रहती हैं। बस घर के अंदर बैठे-बैठे यही सब सोचते-२ तबियत भी जरा नासाज़ रहने लगी डॉ० ने कहा कि मुझे घूमना चाहिये, बस अब घर में सबकी डाँट शुरु –“चलो घूमने” अब बच्चों के प्यार और पतिदेव के प्रेमपूर्ण आग्रह के आगे भला कैसे इंकार कर पाते तो शुरू हुआ सिलसिला घूमने का कभी बाहर और कभी छत पर।

अभी कुछ हफ्तों से छत पर ही जा रहे थे क्योंकि जरा बाहर का माहौल इन दिनों यहाँ खराब सा हो जाता है, आप भी सोच रहे होंगे कि क्रिसमस और नया साल आने वाला है तो अच्छा होना चाहिये तो बुरा क्यों, जी हाँ यही तो कारण है बुरा होने का अब जिन लोगों को क्रिसमस मनाना है ,तो उनको पैसा तो चाहिये ही, पर मेहनत करना कुछ लोगों को पंसद नहीं आता तो हाथ साफ करते हैं,कभी सोने की चेन पर तो कभी मोबाईल पर हमारे कई मित्र इन अक्लमंदों के हत्थे चढ़ चुके हैं।

छत पर घूमते हुए निगाह पड़ी एक पंछी के जोड़े पर, बेहद उदास, ना ही कोई आवाज़, ना ही कोई हलचल एक दम पत्थर से बने एकटक एकदूसरे को निहारते हुए ना जाने कौन सी दुनिया में खोए हुए यूँ ही घंटों बैठे रहे। मैं जो अपनी उदासी दूर करने के लिए छत पर घूमने आई लेकिन उनकी उदासी देखकर फिर सोचने पर मज़बूर हो गई किस दुख के मारे होंगे ये बेचारे ? क्या इनके बच्चे इनसे बिछड़ गये? क्या किसी शिकारी की गोली का शिकार हो गए या फिर किसी ज्यादा ताकतवर पंछी ने इनके बच्चों को मार डाला, क्या कई दिन पहले आये तूफान ने इनका घर निगल लिया, क्या ये परदेसी हैं और अपनों की याद इनके अंतर्मन को झुलसा रही है, मैं कुछ भी नहीं समझ पाती और आकर बिस्तर पर लेट जाती हूँ, अब आँखों में नींद कहाँ बस वही पंछी का जोड़ा दिलो-दिमाग पर छाया रहता और बेसब्री से शाम होने का इंतज़ार।

अगले दिन फिर उस जोड़े को ठीक उसी समय, उसी मुद्रा में घंटों बैठे पाया एक अज़ीब सा लगाव हो गया मुझे जो बरबस ही मेरे कदम शाम होते ही छत की ओर बढ़ने लगते ये सिलसिला एक हफ्ते तक चलता रहा, तीन दिन पहले मैं जब छत पर गई तो उस जोड़े को वहाँ ना पाकर बहुत उदास मन से नीचे आ गई। अगले दिन फिर जाकर देखा वह जगह, वह मुंड़ेर सब वहीं था पर वह जोड़ा नहीं था ना जाने कहाँ गया होगा क्या अपने देश? या कि उसके बच्चे उसे मिल गये होंगे अगर ऐसा हुआ होगा तो बहुत अच्छा हुआ क्या कोई भी अपने घर परिवार से दूर रहकर सुखी हुआ है भला…

आज़ कुछ पड़ोसी मेरे पास आये और बोले कि वो हमारा नल देखना चाहते हैं हमने इज़ाज़त दे दी वो बिना कुछ कहे चले गये हमें तो समझ ही नहीं आया कि माज़रा क्या है थोड़ी देर बाद देखते हैं तो नीली वर्दी पहने कई सफ़ाई कर्मचारी धड़ाधड़ छत पर जा रहें हैं, हम बडे खुश हुए चलो इस बार नये साल पर बिना हमारे कहे छत तो साफ होगी, करीब दो घंटे बाद हम देखते हैं कि सभी मुँह पर मास्क पहने और ना जाने क्या-क्या बड़बड़ाते जा रहे थे, दिन भर सभी लोगों का आना जाना लगा रहा, जब पाँच घंटे बीत गए तो मुझसे भी सब्र नहीं हुआ मैं भी चली अपनी साफ सुथरी, सपनों की छत देखने, जब वहाँ पहुँची तो बदबू के मारे दिमाग घूम गया, समझ नहीं आया कि इतनी बदबू किस चीज़ की हो सकती है, तभी जो नज़ारा देखा उसे देखकर मेरे तो होश ही उड़ गए, दिमाग सुन्न हो गया और बरबस ही आँखों से आँसू बरस पड़े मेरी आँखों के सामने वो पंछी का जोड़ा था, जिसे पानी के बहुत बड़े टैंक से निकाला जा रहा था और उस जोड़े के शरीर में कीड़े चल रहे थे, अब मुझे सारी बात समझ आई …कि क्यों लोग हमारा नल चैक करने आये थे ? वो ये देखना चाहते थे कि क्या हमारे पानी में भी बदबू आ रही है? हुआ यूँ कि हमारे यहाँ बड़े-२ आठ टैंक हैं जिसमें से दो टैंक के ढक्कन शायद स्मैकियों ने निकलकार बेच डाले थे, जिनका हमें पता भी नहीं था, उनमें से ही एक टैंक में वो पंछी को जोड़ा मिला जिसके कारण कुछ घरों में पानी में बदबू की शिकायत थी, सभी लोग कह रहे थे-“ कि वे सभी दो दिन से उस पानी को इस्तेमाल नहीं कर रहे थे और मैं बहुत लक्की हूँ जो मेरी घर में वो पानी नहीं आ रहा था जिसमें बदबू आ रही थी, मेरा घर उस बदबू से अछूता था” लेकिन उन सभी लोगों में से ये कोई नहीं जानता कि मुझे वो बदबू नहीं मुझे छू गईं वो आँखे जो मरने के बाद भी किसी के इंतज़ार में खुली हुईं थी, मुझे छू गईं उनके प्यार की अनकही दास्ताँ...
Dr.Bhawna

25 टिप्‍पणियां:

Amit ने कहा…

bahut he maarmik daastaan hai....kaafi acche se aapne apne bhaavoo ko piroya hai.....

दिल का दर्द ने कहा…

भावनाजी बहुत ही मार्मिक रचना है. पढ़कर मेरे भी दिल में दर्द हुआ. लेकिन क्या करें इस प्यार को सब नही समझते

परमजीत बाली ने कहा…

पोस्ट अच्छी लगी।यही सच है कि जीवन के इसी उतार-चड़ाव में हम सब जीते हैं।लेकिन उसे सभी महसूस नही कर पाते।संवेदनशील इन्सान ही इसे महसूस कर पाते हैं।....

Alok Nandan ने कहा…

डाक्टर, इतना संवेदनशील होना अच्छा नहीं होता...जितना आप सोंचती हो उससे ज्यादा समझती हो. गहरी सबजेक्टिऱ राइटिंग है, अच्छा लगा पढ़कर...थोड़ा देर ठहरा और ठिठका...अब लगातार सोंच रहा हूं...

manoj dwivedi ने कहा…

DOCTOR SAHEB APNE NE TO KAMAL KA LIKHA HAI..HUM JAISE NAYE LOGO KE LIYE KAFI KUCHH SIKHANE KO MIL RAHA HAI..AJ SE APKA FAN!

दीपक कुमार भानरे ने कहा…

भावुक और मार्मिक रचना . सभी के मर्म की इतनी क़द्र काश सभी कर पाते तो दुनिया का रंग ही कुछ और होता .

डॉ .अनुराग ने कहा…

जीवन ओर म्रत्यु हमें बहुत कुछ सिखाती है ,हमें ओर अधिक मानवीय ओर दूसरे के दुःख को समझने के ओर अवसर देती है .....इस दुःख से आप यही सीख ले ....

creativekona ने कहा…

Bhawnaji,
Apke blog par apka lekh/shabd chitra/ya vichar Ankahee Dastan padha...Ap to lagta hai apne nam ke anuroop hee kafee samvedansheel bhee hain.
Aisee ghatnayen prayah sabhee ke sath hee ghatit hotee hain,par use ek samvedansheel man hee samajh aur likh sakta hai.
Hardik badhai.
Hemant Kumar

राज भाटिय़ा ने कहा…

आप की भावुक और मार्मिक रचना पढ कर मै कांप गया, आप ने बहुत सुंदर ढंग से अपने दिल का दर्द लिख दिया, चलिये अब बच्चो के साथ मन लगाये ओर फ़िर से नारमल हो जाये.
धन्यवाद

प्रदीप मानोरिया ने कहा…

आपकी संवेदन शीलता को प्रणाम

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

aapne itna bhaavpoorn likha hai ki meri soch bhi kuch waqt ke liye ruk gayi ..

pyar ki jubaan har koi thode hi samjhta hai ..

Pls visit my blog for new poems..

vijay
http://poemsofvijay.blogspot.com/

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

दिल की भावना को आपने जिस संवेदना से पिरोकर शब्द का रूप दिया है, बेहतरीन है,
संवेदनहीन होते हमारे समाज में ऎसी भावनाएं मील का पत्थर साबित हो सकती है.

Harsh pandey ने कहा…

sateek chitran kiya hai aapne
post dekhkar bahut achcha laga

Harsh pandey ने कहा…

sateek chitran kiya hai aapne
post dekhkar bahut achcha laga

MUFLIS ने कहा…

zindgi ki talkh haqiqatoN ko jis pakeeza nazariye se aap dekhti haiN
wo sach much hi qaabil.e.zikr hai.
kisi ke dukh meiN yooN gehre utar jana, usse apna hi dukh samajh lena
har ek ke jazbe ko poori ehmiyat dena.... sach ! insaaniyat aaj bhi zinda hai... aur issi nek jazbe ke naate aapko naman karta hooN.
Ab isske ilaava aapke lekhan ki kya tareef karooN...shabd hi naheeN haiN.
---MUFLIS---

MUFLIS ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Irshad ने कहा…

Kubsurat logo ka kubsurat blog.

JHAROKHA ने कहा…

Bhavnaji,
Bahut sundar dil ko chhoo lene vala shabd chitra likha hai apne ...Hardik badhai.
Poonam

Harkirat Haqeer ने कहा…

मरने के बाद भी किसी के इंतज़ार में खुली हुईं थी, मुझे छू गईं उनके प्यार की अनकही दास्ताँ...
दिल का दर्द लिख दिया.....अच्छा लगा ...

पुरुषोत्तम कुमार ने कहा…

यह तो बहुत बुरा हुआ।

vipinkizindagi ने कहा…

बहुत सुंदर भाव

SAHITYIKA ने कहा…

बहुत ही बढ़िया रचना है.. किसी के दर्द को खुद महसूस कर पाना.. बहुत बड़ी बात है.. आपने बहुत ही सुन्दर शब्दों में इसे प्रस्तुत किया है...

Bahadur Patel ने कहा…

bahut achchha likha hai.

vinay ने कहा…

kabhi,kabhi jeevan ki ghtnay dilo dimag ko jhakjhor deti hain.

BrijmohanShrivastava ने कहा…

नव वर्ष के आगमन पर मेरी ओर से शुभकामनाएं स्वीकार कर अनुग्रहीत करें /