21 जनवरी 2009

दांस्ता...

धड़कता रहा
लफ़्जों का सीना
रात भर,
सिसकती रही
कलम भी,
कागज़ भी न दे पाया
अपना हाथ,
चाँद ने भी
करवट ले ली,
ओढ़ ली काली चादर
रोशनी ने,
तारों ने भी
फेर ली अपनी आँखें,
पिघलता रहा आसमां
मोम की मानिंद,
थरथराते रहे
रात्रि के होठ,
तो फिर!
कैसे लिखता वो
दर्दे दिल की दांस्ता?
डॉ० भावना

21 टिप्‍पणियां:

Alok Nandan ने कहा…

बहुत खुब

Kanu ने कहा…

Hi mamma,
This is a greattttt poem. I loved it!!! Very nice comparison and language as well....

Good Luck
Keep writing
Love You
Kanupriya

mehek ने कहा…

waah dil ki baat dil se,bahut sundar bhav.

Kanu ने कहा…

Hi mamma,

This is a greattttt poem. I loved it!!! Very nice comparison and language as well....

Good Luck
Keep writing
Love You
Kanupriya

makrand ने कहा…

मोम की मानिंद,
थरथराते रहे
रात्रि के होठ,
तो फिर!
कैसे लिखता वो
दर्दे दिल की दांस्ता?
bahut sunder rachana bhawan ji

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत सुंदर।

Udan Tashtari ने कहा…

तो फिर!
कैसे लिखता वो
दर्दे दिल की दांस्ता?

-वाकई, फिर कैसे लिख पाना संभव है.

बहुत सुन्दर रचना. कनुप्रिया के साथ साथ हमें भी बहुत पसंद आई. :)

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत बढ़िया ..बहुत दिनों बाद आपका लिखा दिखाई दिया

Parul ने कहा…

bahut khuub

विनय ने कहा…

बहुत ही सहज और सरस कविता है...

---आपका हार्दिक स्वागत है
चाँद, बादल और शाम

विनय ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता है


---आपका हार्दिक स्वागत है
चाँद, बादल और शाम

अनिल कान्त : ने कहा…

अब मैं क्या कहूँ ...सब लोग पहले ही तारीफ कर चुके हैं ....

अनिल कान्त
मेरा अपना जहान

विवेक सिंह ने कहा…

बहुत खुब !!

BrijmohanShrivastava ने कहा…

शब्दों का सीना धड़कता रहा ,कलम सिसकती रही ,हाथ कागज़ न दे पाया ,चाँद ने करवट ली ,रोशनी ने चादर ओड़ी,तारों ने आँख फेरली,आसमा पिघलता रहा ,रात्री के होंठ थरथराते रहे तो दर्दे दिल की दास्ताँ कैसे लिखी जाती /डाक्टर साहिबा इस छायावादी कविता का बिल्कुल अर्थ नहीं समझ पाया हूँ /यह बात नितांत सत्य है कि पाठक को भी कल्पना शक्ति की आवश्यकता होती है /आपकी इस रचना में गहरी काव्यात्मकता के साथ प्रखर व्यंजनात्मकता भी है किंतु साथ ही वैचारिक आलोक न बन कर बौद्धिक जटिलता मुझे प्रतीत हो रही है /बैसे तो रचना के खाली स्थानों ,कोमा ,विरामों में भी अर्थलय निहित होता है ,मेरे लिए तो यह रचना वैसी ही है जैसे गोस्वामी जी ने कहा है ""जिमि पिपीलका सागर थाहा ""जैसे चींटी समुद्र का थाह पाना चाहती हो /यह निवेदन क्षमा प्रार्थना के साथ है /

creativekona ने कहा…

Bhavna Ji,
Bahut kam shabdon men bahut kuchh kah diya apne is kavita men.kabhee kabhee is halat se har rachnakar gujarta hai.
Hemant Kumar

राज भाटिय़ा ने कहा…

अति सुंदर कविता के लिये धन्यवाद

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

बेहतरीन अलंकार हैं इस कविता में...... आपको बधाई भावना जी...

JHAROKHA ने कहा…

Chand ne bhee
karvat le lee
odh lee kalee chadar
roshnee ne,taron ne bhee
fer lee apnee ankhen.....
Respected Bhavna Ji,
Atyant bhavnatmak panktiyon ke liye badhai.
Poonam

सचिन मिश्रा ने कहा…

Bahut khub.

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत सुन्दर!!

Servesh Dubey ने कहा…

भावना जी,
रात भर,सिसकती रही कलम भी,

सशक्त रचना,

आपकी भावनाये कलम के माधयम से जब प्रकाशित होता है,
सच कह रहा हू की सबका मन आल्हादित होता हैं।

अपनी लेखनी की धार ऐसे ही तेज करते रहे