
सीखने की कोई उम्र नहीं होती
कहते हैं न कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती और ये भी कि हम हर किसी से कुछ न कुछ सीखते हैं चाहे वो छोटे ही क्यों न हो। आज मेरे साथ ऐसा ही कुछ हुआ चलिये आप भी शामिल हो जाईये मेरे साथ।
आज जरा तबियत ठीक न होने के कारण स्कूल से छुट्टी ली हुई थी। पर लेटा तो जाता नहीं मुझसे, चाहे कितने भी आराम की जरुरत हो, अपना मित्र कम्प्यूटर तो चाहिये ही और अगर कम्प्यूटर पर काम करना है तो अपने पसंदीदा गाने भी। मैं हमेशा की तरह अपने कम्प्यूटर पर लगी थी और मग्न थी हिन्दी के गाने सुनने में। मुकेश जी, किशोर जी और रफी जी अपने पंसदीदा गायक हैं। आज सुबह से ही रफी जी को सुना जा रहा था। एक से एक कमाल के गाने चल रहे थे। वैसे मैं तो पक चुकी हूँ यहाँ के युगांडन गानों से- “सुन्नो डैडी सुन्नो मम्मी सुन्नो सुन्नो, सुन्नो मकवासी या “आई माम्मा एट्टी पेप्प्रो ओ ओओ ओ…आई माम्मा एट्टी पेप्पो ओ ओ ओ….” इसी तरह के अनेक। बस अब अपने वतन को तो भुला ही नहीं सकते हम, वो अपनी जान है, रहें कहीं भी पर अपना वतन तो अपना ही होता है। तो फिरअपनी सभ्यता को अपने में जिंदा रखने में जो खुशी मिलती है वो और कहाँ मिल सकती है।
मैं कहाँ थी, जी हाँ सही कहा आपने तो बात चल रही थी रफी साहब के गानों की तो क्या शानदार गानेचल रहे थे- "मेरा मन तेरा प्यासा… मेरा मन तेरा… पूरी कब होगी… आशा… मेरा मन तेरा… (फिल्म-गैम्बलर) और फिर - दुख हो या सुख जब सदा संग रहे न कोय, फिर दुख को अपनाइये कि जायेतो दुख न होय- "राही मनवा दुख की चिन्ता क्यों सताती है… दुख तो अपना साथी है… २ सुख है इकछाँव ढलती… आती है… जाती है… दुख तो अपना साथी है…” क्या गाने लिखे हैं लिखने वालों ने, जवाब नहीं अभी ये गाना खत्म हुआ ही था कि हमारी छुटकी ने (ऐश्वर्या) स्कूल से आकर घर में कदम रखा और गाना बज़ा- " तू हिंदू बनेगा… न मुसलमान बनेगा… इंसान की औलाद है… इंसान बनेगा… २ अच्छा हैअभी तक… तेरा कुछ नाम नहीं है… तुझको किसी मज़हब से कोई काम नहीं है…२ जिस इल्म ने…
अब उस नन्हे से दिल से सवाल उठा- "मम्मा जो Human being होते हैं उनको तो हम हिन्दू, मुस्लिम और क्रियश्चन आदि पहचान लेते हैं, किन्तु जो Animals होते हैं उनका कैसे पता चलता है कि वो हिन्दू हैं या मुसलमान या फिर क्रियश्चन? वो तो बस ऐसे होते हैं न कि युगांडन, इंडियन, आस्ट्रेलियन या अमेरिकन है ना?"
उसका ये नन्हा सा सवाल वास्तव में बहुत बड़ा सवाल है। काश ! हम बड़े लोग भी ऐसा ही सोच पाते। आदमी की पहचान बस ऐसे ही होती- कि वो आदमी है, न ही कोई हिन्दू, न मुस्लिम, न ही और कोई जाति बस इंसान तो इंसान है। हाँ वह इस बहुत बड़ी दुनिया में अलग-अलग जगह बसा है। काश !! ये भेदभाव न होता…, काश !! हमारा मन भी बच्चों के समान होता…, काश !! हमारी सोचें भी बस इंसान को इंसान ही समझती, कोई जातिगत इंसान नहीं। अगर ऐसा हो पाता तो दुनिया कितनी खूबसूरत होती, न ही कोई भेदभाव रहता, सब प्यार से एक साथ मिल जुलकर रहते, न ही कोई बंटवारा होता, हम सब मिलकर इस इस दुनिया को इस रूप में महसूस करें तो जो सुख हम दिल में महसूस करते हैं उसको शब्दों में बयान नहीं कर सकते।
हम सभी के दोस्त अलग-अलग जातियों में जरूर होंगे। जैसे कि मेरे भी हैं २ मुस्लिम दोस्त हैं एक अभी इंडिया गये हुये हैं एक महीने की छुट्टी में और एक अब इंडिया जाने वाले हैं जो साल भर बाद ही मिलते हैं। पर हमारा मेल का और फोन का सिलसिला जारी रहता है। एक महीना अपनी दोस्त के बिना कैसे काटा मैं ही जानती हूँ उनकी बेटियां मेरी बेटियों की दोस्त हैं जो एक साथ ही खाना खाते हैं,पढते हैं, खेलते हैं हांलाकि हम प्योर वेज़ेटेरियन हैं किन्तु वो भी इस बात का ख्याल रखते हैं कि हमें कुछ ठेस न पहुँचे और हम भी उनका उतना ही ख्याल रखते हैं। काश पूरी दुनिया ही इस तरह से दोस्त बन जाये तो किसी भी माँ बाप को अपने बच्चों के कठिन सवालों के जवाब न देने पडें।
{ ये आलेख किसी भी धर्म को ठेस पहुँचाने के लिये नहीं लिखा गया है। आप पढ़ने वालों से निवेदन है कि इसको अन्यथा न लें। किसी को कुछ बुरा लगा हो तो मैं क्षमा प्रार्थी हूँ। }
डॉ० भावना
6 टिप्पणियां:
अच्छे विचार हैं. काश, एक दिन ऐसे समाज का निर्माण हो. वोचारों से ही सृजन की राह बनती है. अच्छा किया विचार किया. शुभकामनायें.
नन्हा सा सवाल अच्छा लगा और जवाब भी.
समीर जी की टिप्पणी से सहमत। शुभकामनाए।
सही कहा है आपने. ताउम्र सीखते रहने के बाद भी कोष रिक्त ही रहता है
जी बिल्कुल, मन की बात कही है आपने !
बिल्कुल सही कहा है कि सीखने की कोई उम्र नही होती है।
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