8 मार्च 2011

पहरे...

तीन महीने का लम्बा सफ़र जो लम्बा लगा नहीं ना जाने कैसे गुजर गए ये ३ महीने इसे ही कहते हैं अपनों का साथ जी हाँ भारत यात्रा पूरी हुई बहुत सारी खट्टी मिट्ठी यादों को समेटे हमारी वापसी १४ फरवरी वेंलनटाईन डे वाले दिन हो गई अब यहाँ की इतनी व्यस्तता की आज किसी तरह समय चुराया है फिर से अपने लेखकों, पाठकों के बीच में आने का कुछ लिखा है इस तरह गौर फरमाईगा ...

















मेरी आँखों पर

इतने पहरे ...
पहले तो न थे ...
देख सकती थी मैं भी...
खूबसूरत ख्वाब ...
पर अचानक क्या हुआ?
जो निकाल ली गई
इनकी रोशनी ...
और अब तो ये
रो भी नहीं सकती ...
भावना

11 टिप्‍पणियां:

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत खूब ... आँखों पर पहरे लग जाएँ तो जीना दुश्वार हो जाएगा ....

Rajesh Kumar 'Nachiketa' ने कहा…

बहुत दिनों बाद लिखा आपने....
फिर से वही कशिश है आपकी कविता में....
नमस्कार.

सहज साहित्य ने कहा…

बहुत दिनों बाद आपका ब्लॉग सक्रिय हुआ । कविता पढ़ी । हर एक शब्द अबुझ दर्द से सराबोर था । भावोद्रेक का नायाब अ नमूना है आपकी यह कविता ।

Udan Tashtari ने कहा…

ओह! अजब भाव...दर्दीला सा....




को समेटे हमारी वापसी १४ जुलाई वेंलनटाईन डे वाले दिन


१४ परवरी कर लिजिये.

Sunil Kumar ने कहा…

एक बार फिर स्वागत है आपका और आपकी भावपूर्ण कविताओं का ....

यशवन्त माथुर ने कहा…

बहुत बढ़िया.

JHAROKHA ने कहा…

bhavna ji
aapki yah choti si kavita bahut hi gudh arth samete hue hai apne aap me .
badhai v dhanyvaad
poonam

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

होली की खूबसूरत और रंगबिरंगी शुभकामनाएं |सुंदर भावपूर्ण कविता के लिए बधाई |

निर्मला कपिला ने कहा…

मार्मिक अभिव्यक्ति। शुभकामनायें।

Kunwar Kusumesh ने कहा…

हफ़्तों तक खाते रहो, गुझिया ले ले स्वाद.
मगर कभी मत भूलना,नाम भक्त प्रहलाद.
होली की हार्दिक शुभकामनायें.

kshama ने कहा…

Uf! Ye kya kah dala aapne?

Holee kee dheron shubhkamnayen!