13 जून 2011

मेरा घर


डॉ भावना

आई जून की भरी दुपहरी

छाया देता भाये घर।


नीम -निबौंली से अक्सर

बने बिछौना मेरा घर।


चीं -चीं चिड़िया की बोली से

चहका रहता मेरा घर।

हम यहाँ मिल जुलकर रहते

खिल-खिल करता मेरा घर
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9 टिप्‍पणियां:

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

बहुत ही सुंदर प्रस्तुति |बहुत दिन बाद आपके सुंदर विचारों की खुशबू हमारे ब्लॉग तक पहुंची आभार |

mahendra srivastava ने कहा…

बहुत सुंदर रचना।

PK Sharma ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा है जी ऐसे ही लिखते रहे
हमारे कुटिया पर भी दर्शन दे श्री मान

Rachana ने कहा…

bahut sunder bachchon ki kavita bahut dino bad padh .aanand aaya .
rachana

JHAROKHA ने कहा…

bhawna ji
bahut bahut hi pyaari si rachna .badi hi man -mohak lagi .
sach me is bhaynkar garmi me ghar hi
me rahna achha lagta hai lekin majburi me kabhi kabhi na chahte hue bhi nikkna padta hai .
bahut hi khoob surat prastuti---
poonam

daanish ने कहा…

घर
मनभावन
तो
जग मनभावन

Kunwar Kusumesh ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति .

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत बढ़िया...नियमित पोस्ट करिये.

डॉ. हरदीप संधु ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति ...
चीं -चीं चिड़िया की बोली से
चहका रहता मेरा घर !