3 सितंबर 2006

बूँद

जब आँख से छलकी


तो आँसू बन गई



गिरी बादल से

तो बरखा बन गई



जब पत्तों से खनकी


तो मोती बन गई



गिरी परिश्रम से


तो पसीना बन गई



जब केश से गिरी


तो गंगा बन गई
डॉ० भावना

4 टिप्‍पणियां:

उन्मुक्त ने कहा…

जब सीप के मुख में गिरी
तो मोती बन गयी

renu ahuja ने कहा…

भावना जी,
आपके, सुंदर काव्य के छीटे
कहते हैं इतना ही:-

बूंद की हुई, लेखनी से प्रीत
छलका, सुंदर सहज गीत.

बहुत सुंदर कविता और चित्र भी है यूं ही लिखती रहिये.
-रेणू आहूजा.

Bhawna Kunwar ने कहा…

Renu ji
Bahut sundar bavon se sraha ha aapne agar isi trha sahyog milta raha to jarur lekhni chalti rahegi bahut bahut shukriya.
Regards
Bhawna Kunwar

-श्रीमति रेणु आहूजा. ने कहा…

नमस्ते भावना जी,
दरअसल आपकी कविताओं और भावों कि पसंद मेरे विचारों से काफ़ी मेल खाती है, और मैं आपकी कविताओं को पढ, कर आनंद भी अनुभव करती हूं, यह तो एक सुखद संयोग था कि हिन्दी कविता के ई-ग्रुप में आपसे मुलाकात हुई.
हालांकि मै निरंतर ब्लाग नहीं लिख पाती हूं, परंतु जब भी साईट सर्फ़िग करती हूं तो अनायास ही, अपने favourites कि लिस्ट में आप्के ब्लाग को ज़रूर क्लिक करती हूं

भगवान आपकी रचनाधर्मिता को उत्तरोत्तर सफ़लता दे,
शुभकामनाएं.
-श्रीमति रेणु आहूजा.