7 फ़रवरी 2007

सच्चाई को बयान करते हुए चन्द शेर



"हैं रिसते दिल के जब छाले, बहुत ही टीस उठती है

जिधर देखो ये दुनिया तो, लिए बस सूई दिखती है।"



"था मैंने दिल की क्यारी को, लगाया चाव से लेकिन

मगर गुज़रा वहाँ से जो, उसी ने बो दिये काँटे।"



"ये माना फूल में है नूर भी, खुशबू भी है उसमें

मगर सच ये भी है कि फूल के ही संग हैं काँटे।"



डॉ० भावना

16 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

सुंदर भाव हैं, बधाई.

Dr.Bhawna ने कहा…

समीर जी बहुत-बहुत शुक्रिया।

Sagar Chand Nahar ने कहा…

भावना जी आज आपके शब्दों से निराशा कैसे झलक रही है?वैसे कविता के भाव बहुत सुन्दर है, बधाई!
www.nahar.wordpress.com

Dr.Bhawna ने कहा…

सागर जी जिन्दगी ये दो ही तो पहलू होते हैं 'सुख-दुख', आशा-निराशा, धूँप-छाँव कुछ भी कह लें। बस कभी कोई सा पहलू हावी हो जाता है मन पर कभी कोई सा। ऐसा ही हुआ होगा मेरे साथ भी जो ये सब लिख गयी। आप मेरे ब्लॉग पर आये मुझे सराहा उसके लिये शुक्रिया।

राकेश खंडेलवाल ने कहा…

खुशी वो ही सराहा है कि जिसने पीर भोगी है
लगे है खूबसूरत फूल, जब जब चुभ गये काँटे

सुन्दर अशेआर हैं भावनाजी

Dr.Bhawna ने कहा…

बिल्कुल सही कहा है राकेश जी आपने। हौसला अफज़ाई का शुक्रिया।

Swarna Jyothi ने कहा…

भावना जी
सबसे पहले तो मेरा धन्यवाद स्वीकार करे आप ने मेरी कविता के लिए प्रतिक्रिया दी
अब कुछ मेरी सुनिये
जैसे ही आप की प्रतिक्रिया देखी तुरंत आप का परिचय भी देख लिया और साथ-साथ आप का चिट्ठा भी पूरा का पूरा देख लिया
आप लिखती हैं कि आप अधिक कुछ नहीं जानती यदि ऐसा है तो मैं तो बिल्कुल अनाडी ही हूँ
ऐसी स्थिति में मैं क्या लिखूँ ?
सारी विधाओं में आप पारंगत हैं और मैंनें अभी- अभी चलना सीखा है आप से गुजारिश है कि मेरा चिट्ठा पूरा पढे और कुछ लिखे
आप की फूल और काँटों की बात पर कहना चाहती हूँ कि
काँटों को मुरझाने का खौफ नहीं होता

Dr.Bhawna ने कहा…

आपका पूरा ब्लॉग पढा अच्छा लिखती हैं आप। आपकी रचना हिमखंड काफी अच्छी लगी। पर्वत को लेकर मेरी एक रचना है जो अनुभूति में छपी थी जो मुझे बहुत पसन्द है। आप मेरे लिंक में भी देख सकती हैं मैं लिख भी रही हूँ-


भ्रमण
गर्व न कर, गर तू बड़ा है
भले ही तू पर्वत की तरह खड़ा है
तुझसे तो चींटी भली है
जिसको भ्रमण तो मिला है।

काँटों के बारे में आपकी राय बिल्कुल सही है। शुक्रिया रचना पसन्द करने के लिये।

narendra ने कहा…

aadarniya bhawna ji, namaskar, blog par aapke sher padhe, aacha laga, muje pata nai tha ki aap sher bhi likti hei.
bhawna ji, aap me konsi khubi nahi hei vo bata dizeay, kalam par aapki pakad kafi majboot hei, bhagwan se yei prathna hei ki aap nirantar ucchayon ko chue.
narendra

Dr.Bhawna ने कहा…

नरेन्द्र जी बहुत-बहुत शुक्रिया। अब तो मैं भी भगवान से यही प्रार्थना करूँगी कि वो आपकी प्रार्थना सुन लें। देखा मैं स्वार्थी हो गई। :) :)

Divine India ने कहा…

सच कहा अगर फुल में अगर काँटे न हो तो कोमलता का अहसास कहाँ रह पायेगा…सुख में अगर वेदना न हो तो खुशी के क्षण को कोई क्यों संजोयेगा…बहुत सुंदर भावनाओं का संगम…बधाई स्वीकारें!

Dr.Bhawna ने कहा…

दिव्याभ जी आज आपको अपने ब्लॉग पर शायद पहली बार देखा अच्छा लगा। आपको पंक्तियां पसन्द आईं उसके लिये बहुत-बहुत धन्यवाद।

मोहिन्दर कुमार ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना है बाकी अभी बहुत कुछ पढने एंव समझने को बाकी है
मेरे ब्लाग http://dilkadarpan.blogspot.com पर पधार कर अपनी टिप्पणी से मेरी रचनाओं का मुल्याकंन करने की कृपा करें
विशेष रूप से मेरी एक कविता "केवल संज्ञान है" जो http://merekavimitra.blogspot.com पर प्रेषित है आप की टिप्पणी की प्रतीक्षा में है

मोहिन्दर

Dr.Bhawna ने कहा…

मोहिन्दर जी आपका ब्लॉग देखा, पढा और टिपण्णी भी दी। आपको मेरी पंक्तियाँ पसन्द आईं उसके लिये बहुत-बहुत धन्यवाद।

श्यामल सुमन ने कहा…

भावना जी,

बहुत अच्छा। बधाई।

चमन में बहार आये तो कुछ इस तरह बहार आये।
फूल तो फूल हैं, काँटों पे भी निखार आये।।

सादर
श्यामल सुमन

Dr.Bhawna ने कहा…

श्यामल जी बहुत-बहुत शुक्रिया। आपकी पंक्तयाँ बहुत पसंद आई।