9 नवंबर 2007

जगमगाये दिल के दिये

जलेगा दिल

फिर दीवाली पर

माटी से दूर।


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देकर साँसें

करे जग रोशन

दीया बेचारा।


दीप सजाएँ

स्नेह और प्रेम के

दीपावली में।


नेह चिराग

जलाकर रखना

घर-घर में।


जल उठेंगे

निर्दोष शलभ भी

इन दीपों से।


चीरता गया

अँधियारे का सीना

पावन दीया।


सच्ची दीवाली

जो पोंछ डाले आँसू

गरीबी के भी।


आँख के आँसू ,

उदर की आग को

डस लें दीये।


6 टिप्‍पणियां:

raj yadav ने कहा…

भावना जी दिवाली कि ढेरों सारी बधाई और शुभ कामना !

prabhakar kumar ने कहा…

मेरी तरफ़ से भी सीधी सादी और मीठी सी शुभकामना दीवाली की...

अजित ने कहा…

बहुत सुंदर कविता। शुभसंदेश। आपको भी दिवाली की मंगलशुभकामनाएं ।
ब्लाग का नया रंग-रूप निखरा-निखरा सा लग रहा है।

राजेंद्र त्‍यागी ने कहा…

SUNDAR RACHNA

Lavanyam - Antarman ने कहा…

सुँदर कविता !
आपके समस्त परिवार जनोँ को दीपावली की शुभ कामनाएँ
स स्नेह, लावण्या

Lavanyam - Antarman ने कहा…

सुँदर कविता !
आपके समस्त परिवार जनोँ को दीपावली की शुभ कामनाएँ
स स्नेह, लावण्या