26 नवंबर 2008

सिलसिला…

आज़ सुबह जैसे ही टी०वी० खोला सबसे पहली खबर सुनने में आई एक नवजात बच्ची को मुम्बई के माँ बाप ने डस्टबिन में डाल दिया ये सुनते ही दिल दहल गया भावनाएँ उमड़ पड़ी उस बच्ची के लिए ….पिछले हफ्ते दिल्ली की भी ऐसी एक खबर पढ़ने में आई थी जिन्होंने अपनी बच्ची को फुटपाथ पर छोड़ दिया था ना जाने कब रुकेगा ये सिलसिला…


क्यूँ है मेरे हिस्से में
सिर्फ कचरे का डिब्बा !
क्यूँ नहीं माँ का आँचल !
पिता का दुलार !
ऐसा करते हुए
क्यूँ नहीं काँपते हाथ !
क्यूँ नहीं धड़कता दिल !
क्यूँ नहीं तड़पती आत्मा !
ऐ ! मुझे यूँ मारने वाले सुनो !
तुम तो मुझसे पहले मर चुके हो
तुम भला मुझे क्या मारोगे
भावनाओं से शू्न्य
तुम्हारा दिल बन चुका है
माँस का लोथड़ा
जिसे खायेगी
तुम्हारा दिल अब बन चुका है
माँस का लोथड़ा
जिसे खायेगी
तुम्हारी ही आत्मा
नोंच-नोंचकर
अभी जरा वक्त है…
एक दिन आयेगा
जब तुम्हें देना होगा
इस गुनाह का हिसाब
मेरा क्या !
मुझे तो मिल गई मुक्ति
तुम्हारे जैसे इन्सानों की दुनिया से
डॉ० भावना कुँअर

8 टिप्‍पणियां:

makrand ने कहा…

well composed

सागर नाहर ने कहा…

भावनाजी
आजकल रोजाना यह समाचार सुनने- पढ़ने को मिल रहा है। कैसे कठोर हदय के वे माता-पिता होते होंगे जो अपनी सन्तान को इस तरह फेंक देते होंगे।
बहुत ही दुख:द है यह सब कुछ।
आपकी कविता एकदम सही, सचाई बयां करती है। एक ना एक दिन जरूर उन्हें अपने गुनाहों का हिसाब- किताब देना ही होगा।

डॉ .अनुराग ने कहा…

निशब्द है....क्या कहे ???

Zakir Ali 'Rajneesh' ने कहा…

आपके ब्‍लॉग पर पहली बार आया हूं। फार्मेट बहुत ही प्‍यारा है और उतनी ही प्‍यारी हैं आपकी रचनाऍं। आप युगाण्‍डा में रहकर भी हिन्‍दी सेवा कर रही हैं, यह बडी बात है। बधाई।

संगीता-जीवन सफ़र ने कहा…

कितनी क्रूर कड्वी सच्चाई!आपकी कविता इसी सच्चाई को दर्शाती अभिव्यक्ति है!

डा. फीरोज़ अहमद ने कहा…

बहुत अच्छी रचना. बधाई.अगर कुछ समय मिले तो देखियेगा.
http://rahimasoomraza.blogspot.com
http://vangmaypatrika.blogspot.com
http://hindivangmay1.blogspot.com

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

क्या कहे जो इस प्रकार का काम करने की हिम्मत भी रखते हैं ..दिल नही होते उनके पास शायद

mehek ने कहा…

sach kya gunah hai un masoom bachon ka,bhavuk rachana