23 नवंबर 2011

कुछ इच्छाएँ ...












दौड़ लगाएँ


धूप के खरगोश


हाथ न आएँ।


















लगाए आस


सूखती हुई घास


लगी थी प्यास।




















वर्षा जो आई


धूप के खरगोश


दूर जा बैठे।



घास के जैसे

हैं उगती इच्छाएँ

हाथ न आएँ।



Bhawna

11 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

घास के जैसे
हैं उगती इच्छाएँ
हाथ न आएँ।


-एक संपूर्ण दर्शन...

सहज साहित्य ने कहा…

बहुत लम्बे अर्से के बाद इतने अच्छे हाइकु पढ़ने को मिले । नई उद्भावना , नी कल्पना और भाशा का निखरा-निखरा रूप। सभी कुछ सन्तुलित और पूरी तरह अनुस्यूत । मुझे तो सारे ही हाइकु अच्छे लगे । हाइकु क्या कहें पूरे शब्द-चित्र ! दौड़ लगाएँ
धूप के खरगोश
हाथ न आएँ।
[धूप का सुन्दर दृश्य बिम्ब और साथ ही मान्वीकरण भी]
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लगाए आस
सूखती हुई घास
लगी थी प्यास।
[ घास को प्यास लगना ! बहुत सार्थक चित्रण]
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वर्षा जो आई
धूप के खरगोश
दूर जा बैठे।
[ यहाँ वर्षा आने पर धूप के खरगोशों की दूसरी स्थिति सामने आती है। ]
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घास के जैसे
हैं उगती इच्छाएँ
हाथ न आएँ
।[ सच कहा आपने इच्छाएँ भी घास की तरह जाने-अनजाने उगती ही रहती हैं।इस तरह के हाइकु से हिन्दी की गरिमा बढ़ेगी । हार्दिक बधाई!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति ...

भरत तिवारी ने कहा…

haiku ki gazab duniya
do ek aakhar
jo suno to ye hain duniya

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

आपके हाइकू कमाल के हैं |

अनुपमा पाठक ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति!
शब्द और तस्वीरों का सामंजस्य!

वन्दना ने कहा…

जीवन दर्शन समझा दिया।

sushma 'आहुति' ने कहा…

बेहतरीन अभिवयक्ति......

राकेश खंडेलवाल ने कहा…

जितनी सुन्दर रचना उतने ही सुन्दर चित्र ...


राकेश खंडेलवाल
लिखी गज़ल गीतों ने जब छन्दों की भाषामें
नये पृष्ठ जुड़ गये कई मन की अभिलाषा में

त्रिवेणी ने कहा…

bahut sunder haiku
khoobsurat bimb
धूप के खरगोश
**********
घास को प्यास
********
घास के जैसे
हैं उगती इच्छाएँ
हाथ न आएँ
dil ko chu gae sabhi haiku

hardeep

S.N SHUKLA ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति, सुन्दर भाव ,
सरल और सुन्दर रचना.