10 अप्रैल 2008

अरे कोई आत्मा आ गई तो !



यूँ बने हम भी हँसी के पात्र …

हुआ यूँ कि शुक्रवार को हमारे पतिदेव (प्रगीत) के मित्र ने उनको बताया कि " सर जी कल से तो नवरात्र शुरू हो रहें हैं" ।

" अच्छा" हमारे पतिदेव ने बस इतना ही कहा…
तभी उनके मित्र ने अमेरिका अपने बेटे को फोन मिलाया और बोले-" बेटे कल से नवरात्र शुरू हो रहें हैं तो तुम प्याज़, लहसुन मत खाना और हो सके तो सारे व्रत रख लेना या फिर पहला और आखिरी रख लेना और पूजा कर लेना" ।

बेटे ने भी एक समझदार बेटे की तरह " जी पापाजी" कहकर उनका मान बढ़ाया।
प्रगीत के मित्र बोले कि -"मेरी पत्नी का इंडिया से फोन आया है कि कल से नवरात्र शुरू हैं इसीलिये मैं आपको बता रहा हूँ"।

प्रगीत बोले-"ठीक है मैं भी घर में फोन करके बता देता हूँ कि वो भी तैयारी कर लें मैं तो ज्यादा जानता नहीं क्योंकि मेरे परिवार में तो मम्मी कबीर पंथी होने के कारण ये सब नहीं करती किन्तु मेरी पत्नी देवी जी की पूजा भी करती हैं और नवरात्र भी रखती हैं मैं और बच्चे भी उनका अनुशरण करते हैं"।

अब जैसे ही प्रगीत का फोन आया मैं तो जुट गयी तैयारी करने में जल्दी से कॉलेज़ से लौटी फटाफट सुपर मार्केट पहुँची व्रत की सामग्री लेने, कहीं कुछ मिला तो कहीं कुछ, खैर अन्त भला तो सब भला, बड़ी भागदौड़ के बाद जो कुछ मिला घर लेकर आई और आने वाले कल की तैयारी करके रख दी। हाउस गर्ल को बोला-" कल जल्दी आना हमारे व्रत शुरू हो रहें हैं तुमको जल्दी आकर घर की साज- सफाई करना हैं ताकि हम जल्दी से पूजा करके अपने-अपने ऑफिस निकल जायें"।

हम लोग बच्चों सहित जल्दी-2 उठे बहुत श्रद्धा के साथ पूजा पाठ किया और थोड़े फल लेकर अपने-अपने काम पर निकल पड़े, कोई १२ बजे मेरे पास प्रगीत का फोन आया वो बोले कि-“ आज़ हमें डिनर पर उनके दोस्त ने बुलाया है तो मैंने उनको बोल दिया कि हमारा तो व्रत है तो हम खाना तो नहीं खायेंगे हाँ मगर मिलने जरूर आ जायेंगे क्योंकि मिले हुये भी काफी समय हो गया है"।

मैंने कहा-“ ठीक कहा आपने” और शाम को ७ बज़े का प्रोग्राम तय हो गया। हम अक्सर वीक एंड पर दोस्तों के यहाँ बारी-बारी से डिनर का प्रोग्राम रखते हैं इससे मिलना जुलना भी हो जाता है और यहाँ परदेस में अपनों से हुई दूरी से दुखी मन को, अपने बीते हुये दिनों को, अपने बचपन को, एकदूसरे से कह सुनकर मन को हल्का करने की कोशिश करते हैं। कभी-कभी बच्चों के पेपर हों तो ये सब स्थगित करना पड़ता है। इसी कारण इस बार एक-दूसरे से मिले एक महीना बीत गया।

अभी दोपहर के २ बज़े थे कि मेरी मित्र का फोन आया वो मुझसे बोली कि - "नवरात्र तो सोमवार से हैं हमने अभी इंडिया फोन किया है क्योंकि जब से तुमसे बात हुई है हमारा तो मूड़ बहुत खराब हो गया था कि हमारे नवरात्र छूट गये पर उन लोगों ने बताया है कि वो तो सोमवार से हैं"।

अब अब चौंकने की बारी मेरी थी , मेरा तो दिमाग खराब हो गया, ऐसा पहली बार हुआ कि हमने ना तो न्यूज़ ही देखी ना ही इंड़िया फोन किया, मन पर विचारों की आँधियों ने हल्ला बोल दिया –“पर पापाजी तो हमेशा ही हमें सूचित करते हैं इस बार उन्होंने भी नहीं बताया” अपने आप से बड़बड़ाती रही, खैर हमने तुरन्त पापाजी को फोन मिलाया और अपना पूरा हाल कह सुनाया अब तो बारी पापाजी के बोलने की थी और हमारी सुनने की, वो बोलते रहे और हम मुँह लटकाये सुनते रहे, जब हम से नहीं रहा गया तो हमने कहा कोई बात नहीं अब रख लिया तो रख लिया अब क्या तोड़ना फिर एक बड़ी सी डाट खायी वो बोले- "तो क्या तुम अमावस्या की पूज़ा करके कोई सिद्धी पाना चाहते हो? चुपचाप जाओ और जाकर सब खाना खाओ"।

हमने सहमे हुये-" जी पापाजी" कहकर फोन रख दिया। अब घर आये मुँह लटकाये अब तो शरीर में जान भी ना बची खाना बनाने की ना ही खाने की पापाजी की डाट जो खायी थी खैर अब- जल्दी-जल्दी ढ़ोकला बनाया बच्चों को जैसे तैसे समझाया खुद भी खाया और पड़ोस में भी भिजाया। फिर प्रगीत को फोन मिलाया उन्हें भी खाने को उकसाया और पापजी की डाट का किस्सा सुनाया। फिर मैंने अपनी मित्र को फोन मिलाया उनको बताया कि तुम सही थी पर बिल्कुल सही नहीं थी -"क्योंकि नवरात्र सोमवार को नहीं रविवार को हैं "।वो बोलीं हो सकता है पर हमें तो सोमवार ही बताया है खैर जब भी हों आज़ नहीं हैं ना तो बस आप लोग आ जाईये हम इन्तज़ार कर रहें है…

अब खबर है तो फैलेगी ही ना हम वहाँ पहुँचे वहाँ हमारे काफी मित्र थे जो भी मिले वही पूछे क्यों साहब आज़ आपने व्रत रखा अमावस्या को? कौन सी सिद्धी प्राप्त की ? कोई कहता अरे आज़ आप लोगों से दूर ही रहना होगा कहीं आप किसी आत्मा को ना बुला लें या वो आपके पूज़ा करने से खुदबखुद ही ना आ जाये क्योंकि इस दिन तो तांत्रिक पूज़ा किया करते हैं। ये सब बातें चल ही रही थी कि पापाजी का फोन आ गया वो बोले -"बेटा नवरात्र सोमवार से ही हैं"।

अब हम उस महफिल में जाकर लटके मुँह से सबको कहते हैं कि- " पापाजी का फोन आया है वो बोले कि-“ नवरात्र सोमवार से हैं " बस वो सब हमारी शक्ल देखें और हँसे और हम ? हमारी हालत तो आप सोच ही सकते हैं कैसी हुई होगी तभी तो अपना दुख, अपना लटका चेहरा आप दोस्तों में शेयर करने आ गये प्लीज़ आप लोग मत हँसियेगा…


(यह लेख किसी भी व्यक्ति या धर्म पर कटाक्ष नहीं है अगर किसी भी व्यक्ति को किसी भी बात का बुरा लगे तो मैं पहले से ही माफी माँगती हूँ …)


झूठ नहीं बोलूँगी क्योंकि अब व्रत चल रहें हैं हम अपने बच्चों को और खुद को भी अपनी सभ्यता और संस्कृति से जुड़ा रखने का भरसक प्रयास करते हैं…


भावना

3 टिप्‍पणियां:

यमराज ने कहा…

बहुत बढ़िया आजकल के पंडित लोग दो दिनों का त्यौहार कर देते है फायदा उनका होता है अपुन तो दो दिन के चक्कर मे उलझ जाते है और अपना धरम करम एक तरफ़ रह जाता है .

narendra purohit ने कहा…

aadarniya bhawna ji, namaskar.

yeh jankar ke aapne aur baccho ne navratri ke vart kiye ,kafi khusi hui, sanskaro ka yeh parvah kabhi nahi ruke, kabhi nahi tute, kabhi nahi bhule.
amavas ka vart kiya , kafi maza aaya hoga, ek tarah se aapki devi ma ne REHERSAL karva de.

thanks
narendra purohit

कथाकार ने कहा…

आपके ब्‍लाग पर आना हुआ. रचनाएं देखीं. अच्‍छा लगता है देख कर कि हिन्‍दी ब्‍लागों के जरिये कितनी कितनी दूर से रचनाकारों को आपस में अपनी अभिव्‍यक्ति का रस बांटने का मौका मिल रहा है.
हाइकु मेरी प्रिय व‍िधा है. कभी हम भी क्षणिकाएं लिखा करते थे.
खूब खूब सफल हों लेखन में.
सूरज