4 नवंबर 2018

मिट्टी का दीया

शाम के वक्त
घर लौटते हुए
चौंका दिया मुझे एक

दर्द भरी आवाज़ ने
मैं नहीं रोक पाई स्वयं को
उसके करीब जाने से
पास जाकर देखा तो
बड़ी  दीन अवस्था में
पड़ा हुआ था एक ‘मिट्टी का दीया’
मैंने उसको उठाकर...
अपनी हथेली पर रखा
और प्यार से सहलाकार पूछा
उसकी कराहट का मर्म...
उसकी इस अवस्था का जिम्मेदार...
वह सिसक पड़ा...
और टूटती साँसों को जोड़ता हुआ सा
बहुत छटपटाहट से बोला...
"मैं भी होता था बहुत खुश
जब किसी मन्दिर में जलता था
मैं भी होता था खुश जब...
दीपावली से पहले लोग मुझे ले जाते थे अपने घर
और पानी से नहला-धुलाकर
बड़े प्यार से कपड़े से पोंछकर
सजाते थे मुझे तेल और बाती से
और फिर मैं...
देता था भरपूर रोशनी उनको
झूमता था अपनी लौ के साथ
करता था बातें अँधियारों से
जाने कहाँ-कहाँ कि मिट्टी को
एक साथ लाकर
कारीगर देता था एक पहचान हमें
‘दीए की शक्ल में’
और हम सब मिल-जुलकर
फैलाते थे एक सुनहरा प्रकाश
पर अब...
हमारी जगह ले ली है
सोने, चाँदी और मोम के दीयों ने
अब तो दीपावली पर भी लोग दीये नहीं
लगातें हैं रंग बिरंगी लड़ियाँ
बल्ब और मोमबत्तियाँ
और मिटा डाला हमारा अस्तित्व
एक ही पल में
तो फिर अब भी क्यों रखा है
नाम ‘दीपावली’ यानी
दीयों की कतार...
आज फेंक दिया हमें...
इन झाड़ियों में
तुम आगे बढ़ोगी
तो मिलेंगे तुम्हें मेरे संगी-साथी
इसी अवस्था में
अपनी व्यथा सुनाने को
पर तुमसे पहले नहीं जाना किसी ने भी...
हमारा दर्द,  हमारी तड़प
आज  वही भूला बैठे हैं हमें
जिन्हें स्वयं जलकर
दी थी रोशनी हमने।"

Dr.Bhawna Kunwar