
पर... क्या... इनकी खुशबू आप दोस्तों के बिना कुछ मायने रखती है? बिल्कुल नहीं तो फिर आईये ना... बस थोड़ा सा कष्ट कीजियेगा... और इस लिंक को क्लिक कीजियेगा और अपनी राय जरूर दीजियेगा... आपकी राय के बिना इन फूलों का महत्त्व ही क्या...
भावना कुँअर


मेरी बेटी ऐश्वर्या (उम्र ७ वर्ष) द्वारा बनाया चित्र : 
ऐश्रवर्या द्वारा बनाया "ऐलियन मास्क":
ऐश्रवर्या द्वारा बनाया आईस्क्रीम स्टिक का हैट जिस पर पोस्टर कलर से बनाई खोपड़ी और हड्डी :
एक बच्चे द्वारा बनाया गया स्पाइडर मैन जो थर्माफोल से बने टी० वी० के अन्दर दिखाया गया :


ये मोबाईल के रीचार्ज़ कार्ड से बनी ड्रैस हैः





मेरी बेटी अपने अफ्रीकन मित्रों के साथ
डॉ॰ भावना


प्रवासी भारतीय हाइकुकार डा० भावना कुँअर (युगांडा) के हाइकु संग्रह तारों की चूनर का लोकार्पण करते हुए मुख्य अतिथि डा० जगदीश व्योम, अध्यक्ष ओमप्रकाश चतुर्वेदी पराग, विशिष्ट अतिथि बी०एल० गौड़ एवं संयोजक कमलेश भट्ट कमल

डॉ० भावना
गाजियाबाद, जागरण संवाद केंद्र
प्रसिद्घ साहित्यकार स्व. सत्यभूषण शर्मा के पचहत्तरवें जन्म दिवस पर हाइकू कवि गोष्ठी का आयोजन कविनगर में किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता ओमप्रकाश चतुर्वेदी ने की। संगोष्ठी के मुख्य अतिथि डा. जगदीश व्योम व विशिष्ट अतिथि बी.एल. गौड़ रहे। इस अवसर पर डा. अंजलि देवधर द्वारा लिखित पुस्तक हाइकू प्रवेशिका (विश्व के बच्चों की हाइकू) व डा. भावना कुंवर की हाइकू संग्रह तारों की चूनर का विमोचन किया।
कार्यक्रम की शुरूआत मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण तथा दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। सरस्वती वंदना अनुराधा भट्ट ने की। मुख्य अतिथि डा. जगदीश व्योम ने कहा कि स्व. सत्यभूषण शर्मा को भारत में हाइकू काव्य विधा के जनक हैं। उन्होंने बताया कि सत्रह अक्षरों में ही हाइकू में कविता निहित होती है। उन्होंने कहाकि आज के दौर में नेट पर विश्व में सबसे ज्यादा हिंदी भाषा पसंद की जा रही है। उन्होंने अपनी हाइकू 'छिड़ा जो युद्घ, रोएगी मानवता, हंसेंगे गिद्घ' के माध्यम से वाहवाही लूटी। गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे ओमप्रकाश चतुर्वेदी ने कहाकि हाइकू को जापानी भाषा में सेन्ड्रयू कहा जाता है। उन्होंने बताया कि जापान के कवि वासो ने भी हाइको एक विराट पूर्णता माना है। उन्होंने अपनी हाइकू 'बोये तुमने, काटने पड़े हमें पीड़ा के खेत' व 'पता न था, अंजाना सफर, कभी अंधा भी होगा' भी सुनाई। संगोष्ठी में मौजूद कवियों ने हाइकू के माध्यम से झकझोरा। व्यापार कर अधिकारी राजनाथ तिवारी ने सुख और दुख पर अपनी हाइकू 'पागल सुख, देता है, एक दिन दारुण दुख' कही तो लोग ताली बजाने लगे। डा. मधु भारती ने अंग्रेजी पर व्यंग्य कसते हुए कहा, देश प्रेमी वे, आंग्ल भाषा में हंसे, हिंदी में रोएं। अंजू जैन ने अपनी हाइकू 'खामोशी सदा हारती नहीं जीतती भी है।' सुनाई। संगोष्ठी के समापन पर संचालक कमलेश भट्ट ने अतिथियों को धन्यवाद दिया। महादेव प्रसाद, जितेंद्र साहू, नेहा बैद, विशारद भट्ट, कुसुम भट्ट, सुमन तिवारी, प्रत्युष यादव की गोष्ठी मौजूदगी उल्लेखनीय रही।
डॉ० भावना कुँअर
दीप सजाएँ
स्नेह और प्रेम के
दीपावली में।
नेह चिराग
जलाकर रखना
घर-घर में।
जल उठेंगे
निर्दोष शलभ भी
इन दीपों से।
चीरता गया
अँधियारे का सीना
पावन दीया।
सच्ची दीवाली
जो पोंछ डाले आँसू
गरीबी के भी।
आँख के आँसू ,
उदर की आग को
डस लें दीये।
हर पल मेरी आँखों में
रह-रहकर आता है
जिसे किया गया मज़बूर
मुझे भुलाने के लिये
पर क्या मैं
भुला पाया वो चेहरा!
नहीं कभी नहीं
उसी चेहरे ने दिया था मुझे
मेरी माँ जैसा प्यार.
जब मैं भटका करता था
सड़कों पर
भूख और प्यास से बेहाल
सोया करता था फुटपाथ पर,
फिर वही ले गयीं मुझे
अपने घर, अपना बेटा बनाकार
पर वक्त की मार देखो
मुझे उस माँ को ही छोड़ने पर
मज़बूर कर दिया
उनके अपने ही बेटों ने
क्यों ?
क्योंकि मैं उनका सगा भाई नहीं था
था तो बस एक फुटपाथी,
मैं चला आया
उस माँ के आँचल से दूर
किन्तु आज़ तक नहीं भूला
उस माँ का प्यार
उसकी रोती तड़फती आँखें मेरे लिये,
मैं जीये जा रहा था
उन यादों के सहारे
किन्तु आज़ जिन्दा रहने की चाह
अचानक मर गयी
क्योंकि
आज़ देखा है मैंने
एक ऐसा मंजर जिसे देखने के बाद
नहीं जीना चाहता और अब
देखा है मैंने आज़
अपनी माँ को
यहीं फुटपाथ पर
चिथड़ों में लिपटे हुये
उलझे बिखरे बाल
पैरों में फटी बिवाईयाँ
चेहरों पर दर्द की परछांईयाँ
मात्र एक हड्डियों का ढ़ाँचा
नहीं देख पा रहा…
अपनी मुँह बोली माँ का ये हस्र
ये क्या हुआ? ये कैसे हुआ?
किसने किया ये हाल मेरी माँ का?
शायद उन्हीं बेटों ने
जिन्होंने एक दिन
मुझे घर से निकाल फेंका था,
उन्होंने अपनी माँ को भी नहीं बख्शा
जो न समझ पाये
माँ की भावनाओं को
तो फिर क्या समझेंगे
उसकी ममता को
क्या यही होते हैं अपने
क्या इन्हें ही
दी जाती है परिभाषा
‘अपने खून की”
तो अच्छा है
मैं उनका खून नहीं हूँ
मेरी माँ के इस हाल ने
झकझोर ड़ाला है
मेरा अस्तित्व,
एक साथ हज़ारों सर्प
मेरे शरीर में
बिलबिलाने लगे,
मेरा मस्तिष्क
शून्य हो गया
और मैं
जा गिरा
अपनी माँ के चरणों में
बनकर एक बुत…
डॉ॰ भावना
मेरी माँ के जन्मदिन पर उनको मेरे मन की भावनायें…
जन्म दिन मुबारक हो माँ !
लो माँ… एक साल और बीत गया
ना हो पाया
इस साल भी
हमारा मिलन,
सोचा था…
इस जन्म दिन पर
मैं तुम्हारे साथ रहूँगी,
पर मेरी विवशता देखो,
नहीं आ पाई इस साल भी,
क्योंकि…
मैं निभा रही हूँ
उन कसमों को, उन वादों को
जो तुमने मुझे निभाने को कहा था…
परिवार के उन दायित्वों को
जो तुमने मुझे सिखाया था…
जब मैं विदा हो चली थी
उस घर से इस घर के लिये
पर माँ !
मैं माँ और पत्नी के साथ-2
इक बेटी भी हूँ ना…
मुझे भी तुम्हारी याद आती है
तुम्हारी वो सुकून भरी गोद
जब मैं टूटती या बिखरती हूँ
पर, फिर लग जाती हूँ
निभाने दायित्वों को
तुम्हारी ही दी हुई
शिक्षा को
तुम भी तो मुझे याद करती होगी माँ !
पर
तुम भी तो घिरी हो
दायित्वों के घेरे में,
पर, तुम कभी नहीं थकती।
लेकिन, मैं देख पाती हूँ
वो मायूसी
जो मेरे दूर रहने से छा जाती है
तुम्हारी आँखों में
पर, माँ ! तुम उदास मत होना
शायद अगले साल
तुम्हारे जन्मदिन पर मैं
तुम्हारे पास होऊँ
इसी इन्तजार में…
आज से ही गिनती हूँ दिन…
३६५ हाँ पूरे ३६५ दिन…
फिर मिलकर काटेगें केक
मैं खिलाऊँगी केक का टुकडा तुम्हें
जो अपनी देश की धरती से दूर रहकर
नहीं खिला पायी
और तुमने भी तो..
मेरे ही कारण
केक बनाना ही छोड़ दिया
और छोड़ दिया जन्म दिन मनाना भी
माँ ! अगले साल मनाएँगे जन्म दिन
सजायेंगे महफिल
और तुम
केक बनाकार रखना
और फिर
मेरा इन्तजार करना...
मेरा इन्तजार करना...