28 अक्टूबर 2008

रोशन दिये हम यूँ ही करते रहें...

--भारत से वापसी के बाद--
दिल के दरमियाँ की ओर से सभी पाठकों को दीपावली की ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ---

() () () () () () () () () () () () ()
रोशनी के दिये यूँ ही जलते रहें
लड़खड़ाये कदम भी सँभलते रहें
लाये त्यौहार सौहार्द हर दिल में यूँ
साथ कदमों से मंजिल पर चलते रहें।
भावना,प्रगीत,कनु और किट्टू

30 जून 2008

कुछ दिनों के लिये लिखने पढ़ने से विदा...

एक लम्बे अरसे बाद ८ जुलाई को भारत जाना हो रहा, अपने परिवार के साथ रहने का अवसर मिल रहा है अज़ीब सा एहसास है मन में , कभी २ या ३ साल में जो जाने को अवसर मिलता है, क्योंकि यहाँ भी कभी हमें छुट्टी नहीं, कभी हमारे साहब को, तो कभी बच्चों के पेपर, पर अब अच्छा लग रहा है,बस आप लोगों से और नेट से ज्यादा सम्पर्क नहीं रह पायेगा , आप सबको बहुत मिस करूँगी २ महीने बाद मुलाकात होगी ,कोशिश करूँगी इस पर bhawnak2002@gmail.com बने रहने की तब तक लिये लिखने पढ़ने से विदा...

Dr. Bhawna

26 जून 2008

जरा आजकल तबियत नासाज़ रहती है लिखने का तो बहुत दिल करता है मगर शब्द हैं कि आह !बनकर उड़ जाते हैं पकड़ने की कोशिश जारी है…


बड़े-बड़े सपने
जो अचानक
दिखाये थे तुमने!
वो सब सपने
दिल की दहलीज़ पर आकर
खुशी में बरसे
आँसुओं की झड़ी में
फिसल कर रह गये…
काश ! मैंने
उन सपनों को
जिया ना होता…
काश ! मैंने उन्हें
सच ना माना होता…
काश ! मैंने उन्हें
दिल की धड़कन में ना समाया होता…
काश !
आँसुओं को झरने से
रोका होता…
तो आज़
मेरे भी वो सपने
साकार होते…
कहते हैं ना
कभी खुशियों को
खा जाती है…
नज़र की डायन…
मेरे साथ भी
ऐसा ही हुआ
जो सपने मेरे थे…
जो कुछ ही पल में
साकार रूप लेने वाले थे…
चुरा लिया उन्हें
कुछ कमजर्फ लोगों ने…
मिटा ली नज़र की डायन ने
उनसे अपनी भूख…
और मेरे सपने
मेरे ही दिल की दहलीज़ से
फिसल कर जा गिरे
उन लोगों के दामन में
जिन्होंने सदा ही
छीना था मेरी खुशियों को…
और आज़
छीन लिया मुझसे
मेरे जीने का हक भी
काश ! मैं उन सपनों को
कहीं छुपाकर रख पाती…
तो आज़ जीने का हक तो ना खोती…
जिन्दा रहती तो
शायद फिर से
अपने दिल के घरौंदे में
सज़ा पाती नये-नये सपनों को…
और साकार कर पाती
हर सम्भव सपने को…
काश ! ऐसा हो पाता…


भावना

16 जून 2008

एक बार फिर खिले फूल



पर... क्या... इनकी खुशबू आप दोस्तों के बिना कुछ मायने रखती है? बिल्कुल नहीं तो फिर आईये ना... बस थोड़ा सा कष्ट कीजियेगा... और इस लिंक को क्लिक कीजियेगा और अपनी राय जरूर दीजियेगा... आपकी राय के बिना इन फूलों का महत्त्व ही क्या...
रचना यहाँ भी पढ़ी जा सकती है http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/kachnar/bhawna_kunwar.htm

भावना कुँअर

8 जून 2008

वायरस के कारण टूटा आप सब लोगों से रिश्ता...



काफी एंटी वायरस सोफ्टवेयर के होने के बावज़ूद भी वायरस हार्ड डिस्क में पहुँच गया जिसके कारण आप सभी लोगों से सम्पर्क लगभग टूट ही गया आज़ काफी समय बाद कुछ पोस्ट कर पा रही हूँ प्रगीत का लिखा हुआ..


प्रगीत की कलम से...


दर्द के गाँव में भटका हुआ मुसाफिर हूँ

ढूँढ रहा हूँ खुशी का घर

सुना है आँसुओं का सैलाब आया था इस गाँव में

शायद बहा ले गया वो खुशी के घर को भी।


प्रगीत कुँअर

28 अप्रैल 2008

तो क्या ! अब मुझे हमेशा के लिये अपनी मिट्टी से दूर रहना होगा

आज़ एक खबर पढ़ी, पढ़कर हमारी तो सिट्टी पिट्टी गुम हो गई। खबर थी कि अब पी-एच० डी० और एम० फिल० की डिग्री लेकर भी आपको नेट की परीक्षा देनी होगी ऐसा विचार किया जा रहा, अब जब विचार किया जा रहा है तो उसको पूरा भी होते कहाँ देर लगेगी वैसे ही क्या बेरोज़गारी कम है भारत में जो अब और बढ़ाने के रास्ते खोज़े जा रहे ,हैं क्या पी-एच० डी० और एम० फिल० करना इतना आसान है मुझसे पूछो मैंने कितने पापड़ बेले हैं अपनी पी-एच० डी० पूरा करने के लिये तब जाकर इस डिग्री को हासिल किया है, पूरा किया है अपना ख्वाब डिग्री कॉलेज़ में जॉब करने का।

अगर ये नेट परीक्षा पहले से ही होती तो अच्छा था हम भी देते, हो सकता है अभी भी अच्छा हो, पर अब हम जैसों का क्या?

अब मैं यहाँ युगांडा में हूँ जॉब कर रही हूँ वैसे तो सैटल्ड हूँ अपने वतन से भी जुड़ी हूँ ब्लॉग के माध्यम से लेकिन कभी-कभी एक हूक सी उठती जब अपने वतन की याद आती है तो मन करता है कि सब कुछ छोड़कर चली जाऊँ अपने वतन की छाँव में, पर अब ये खबर पढ़कर तो लगता है वो छाँव मुझे अब कभी भी नसीब नहीं होगी, क्या मैं भारत जाकर पहले नेट का पेपर दूँ? फिर से पढ़ूँ? तो मतलब ये हुआ की मेरी इतने सालों की नौकरी, मेरी इतने सालों की पढ़ाई सब बेकार थी और मैं घर में बैठकर मक्खियाँ मारूँ, नहीं ये सब कैसे कर सकूँगी पढ़ना पढ़ाना मेरी जिंदगी की साँसे है, मेरी धड़कन है तो क्या मैं अपनी धड़कन के बिना जिंदा रह पाऊँगी ? अब मैं बहुत असमंजस में हूँ कि क्या कभी मैं अपना ख्वाब पूरा कर पाऊँगी...
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डॉ० भावना
मेरा आशय किसी को भी आहत करने का नहीं था, जो बात इस समाचार को पढ़कर मेरे दिल में आई वही मैंने आप दोस्तों से शेयर करना चाही ....
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26 अप्रैल 2008

आईये थोड़ा सा लुत्फ आप भी उठा लीजिये

24 अप्रैल का पूरा दिन बहुत व्यस्त गया जाता भी क्यों नहीं मेरी छोटी बेटी के स्कूल में " कला प्रदर्शनी " जो थी। वहाँ बच्चों का हुनर देखते ही बनता था कहीं पर कला की बात हो और हम ना जायें ऐसा तो हो नहीं सकता और बीच में ही प्रोग्राम छोड़कर चले आयें ये ना हमारी सभ्यता हमें करने देती है और ना ही हमारी आदत है।


बच्चों ने बहुत-बहुत सुन्दर पेंटिग बनायी हुई थी आप लोग तो देखने से वंचित रह गये आप हमें यहाँ बैठे-बैठे हमारे देश हमारे शहर की हमें सैर कराते हैं तो चलिये आज़ हम भी यहाँ नन्हें-मुन्नों की कलाकारी आपको दिखाते हैं ...

यह एक ऐसा समूह है जो रंग भेद बिल्कुल नहीं जानता अगर कुछ जानता है तो वो है प्यार, इनकी नन्हीं-२ मुस्कानों में मैंने खुद को एक बंधन में बंधा हुआ पाया "प्यार के बंधन में" जिसने मुझे प्रोग्राम की समाप्ति तक बांधे रखा ...

सर्वप्रथम कुछ चित्र देखिये जो बच्चों ने बनाये हैं-


मेरी बेटी ऐश्वर्या (उम्र ७ वर्ष) द्वारा बनाया चित्र :





ऐश्रवर्या द्वारा बनाया "ऐलियन मास्क":




ऐश्रवर्या द्वारा बनाया आईस्क्रीम स्टिक का हैट जिस पर पोस्टर कलर से बनाई खोपड़ी और हड्डी :

एक बच्चे द्वारा बनाया गया स्पाइडर मैन जो थर्माफोल से बने टी० वी० के अन्दर दिखाया गया :




कोल्ड ड्रिंक की स्ट्रा से बना घर, पिस्ते के छिलके से बना पेड़ और क्ले से बने फूल क्या शोभा दे रहे हैं:

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इसके बाद नम्बर आया फैशन शो का इसमें काफी बच्चों ने भाग लिया इसकी खासियत ये थी कि फैशन शो में पहने जाने वाले सभी वस्त्र बड़े अनोखे थे देखिये-





ये मोबाईल के रीचार्ज़ कार्ड से बनी ड्रैस हैः




ब्रूम स्टिक से बनी ड्रैस :
आज़ कम्यूटर थोड़ा थका हुआ महसूस कर रहा है घिसट-घिसट कर चल रहा सुबह १० बज़े पोस्ट डालनी शुरू की थी अब शाम के ५ बज़ने वाले हैं पर पोस्ट है की पूरी होने का नाम ही नहीं लेती शायद इतनी पिक्चर डालने से ये बुरा हाल हुआ है, तो अब मुझे चलना चाहिये आज़ वीक एंड हैं घूमने जाना है बहुत लेट हो गयी हूँ अभी भी पोस्ट में ही उलझी रही तो मेरे बच्चे मुझसे नाराज़ होकर सो भी जायेंगे, तो अलविदा फिर मिलेंगे अगर आपको चित्र पंसद आये तो टिपण्णी देना भूलियेगा मत और फिर लौटेंगे और चित्रों के साथ...
भावना कुँअर

19 अप्रैल 2008

आप सबके सहयोग और स्नेह की आभारी



प्रिय पाठकों मेरी नव प्रकाशित पुस्तक "तारों की चूनर" (हाइकु संग्रह) के बारे में विस्तृत जानकारी के लिये निम्न लिंक पर देख सकते हैं आप सबके सहयोग की आशा करती हूँ।

इस पुस्तक को प्राप्त करने के इच्छुक मित्र भी इस लिंक के माध्यम से पुस्तक को प्राप्त कर सकते हैं:


डॉ० भावना कुँअर

10 अप्रैल 2008

अरे कोई आत्मा आ गई तो !



यूँ बने हम भी हँसी के पात्र …

हुआ यूँ कि शुक्रवार को हमारे पतिदेव (प्रगीत) के मित्र ने उनको बताया कि " सर जी कल से तो नवरात्र शुरू हो रहें हैं" ।

" अच्छा" हमारे पतिदेव ने बस इतना ही कहा…
तभी उनके मित्र ने अमेरिका अपने बेटे को फोन मिलाया और बोले-" बेटे कल से नवरात्र शुरू हो रहें हैं तो तुम प्याज़, लहसुन मत खाना और हो सके तो सारे व्रत रख लेना या फिर पहला और आखिरी रख लेना और पूजा कर लेना" ।

बेटे ने भी एक समझदार बेटे की तरह " जी पापाजी" कहकर उनका मान बढ़ाया।
प्रगीत के मित्र बोले कि -"मेरी पत्नी का इंडिया से फोन आया है कि कल से नवरात्र शुरू हैं इसीलिये मैं आपको बता रहा हूँ"।

प्रगीत बोले-"ठीक है मैं भी घर में फोन करके बता देता हूँ कि वो भी तैयारी कर लें मैं तो ज्यादा जानता नहीं क्योंकि मेरे परिवार में तो मम्मी कबीर पंथी होने के कारण ये सब नहीं करती किन्तु मेरी पत्नी देवी जी की पूजा भी करती हैं और नवरात्र भी रखती हैं मैं और बच्चे भी उनका अनुशरण करते हैं"।

अब जैसे ही प्रगीत का फोन आया मैं तो जुट गयी तैयारी करने में जल्दी से कॉलेज़ से लौटी फटाफट सुपर मार्केट पहुँची व्रत की सामग्री लेने, कहीं कुछ मिला तो कहीं कुछ, खैर अन्त भला तो सब भला, बड़ी भागदौड़ के बाद जो कुछ मिला घर लेकर आई और आने वाले कल की तैयारी करके रख दी। हाउस गर्ल को बोला-" कल जल्दी आना हमारे व्रत शुरू हो रहें हैं तुमको जल्दी आकर घर की साज- सफाई करना हैं ताकि हम जल्दी से पूजा करके अपने-अपने ऑफिस निकल जायें"।

हम लोग बच्चों सहित जल्दी-2 उठे बहुत श्रद्धा के साथ पूजा पाठ किया और थोड़े फल लेकर अपने-अपने काम पर निकल पड़े, कोई १२ बजे मेरे पास प्रगीत का फोन आया वो बोले कि-“ आज़ हमें डिनर पर उनके दोस्त ने बुलाया है तो मैंने उनको बोल दिया कि हमारा तो व्रत है तो हम खाना तो नहीं खायेंगे हाँ मगर मिलने जरूर आ जायेंगे क्योंकि मिले हुये भी काफी समय हो गया है"।

मैंने कहा-“ ठीक कहा आपने” और शाम को ७ बज़े का प्रोग्राम तय हो गया। हम अक्सर वीक एंड पर दोस्तों के यहाँ बारी-बारी से डिनर का प्रोग्राम रखते हैं इससे मिलना जुलना भी हो जाता है और यहाँ परदेस में अपनों से हुई दूरी से दुखी मन को, अपने बीते हुये दिनों को, अपने बचपन को, एकदूसरे से कह सुनकर मन को हल्का करने की कोशिश करते हैं। कभी-कभी बच्चों के पेपर हों तो ये सब स्थगित करना पड़ता है। इसी कारण इस बार एक-दूसरे से मिले एक महीना बीत गया।

अभी दोपहर के २ बज़े थे कि मेरी मित्र का फोन आया वो मुझसे बोली कि - "नवरात्र तो सोमवार से हैं हमने अभी इंडिया फोन किया है क्योंकि जब से तुमसे बात हुई है हमारा तो मूड़ बहुत खराब हो गया था कि हमारे नवरात्र छूट गये पर उन लोगों ने बताया है कि वो तो सोमवार से हैं"।

अब अब चौंकने की बारी मेरी थी , मेरा तो दिमाग खराब हो गया, ऐसा पहली बार हुआ कि हमने ना तो न्यूज़ ही देखी ना ही इंड़िया फोन किया, मन पर विचारों की आँधियों ने हल्ला बोल दिया –“पर पापाजी तो हमेशा ही हमें सूचित करते हैं इस बार उन्होंने भी नहीं बताया” अपने आप से बड़बड़ाती रही, खैर हमने तुरन्त पापाजी को फोन मिलाया और अपना पूरा हाल कह सुनाया अब तो बारी पापाजी के बोलने की थी और हमारी सुनने की, वो बोलते रहे और हम मुँह लटकाये सुनते रहे, जब हम से नहीं रहा गया तो हमने कहा कोई बात नहीं अब रख लिया तो रख लिया अब क्या तोड़ना फिर एक बड़ी सी डाट खायी वो बोले- "तो क्या तुम अमावस्या की पूज़ा करके कोई सिद्धी पाना चाहते हो? चुपचाप जाओ और जाकर सब खाना खाओ"।

हमने सहमे हुये-" जी पापाजी" कहकर फोन रख दिया। अब घर आये मुँह लटकाये अब तो शरीर में जान भी ना बची खाना बनाने की ना ही खाने की पापाजी की डाट जो खायी थी खैर अब- जल्दी-जल्दी ढ़ोकला बनाया बच्चों को जैसे तैसे समझाया खुद भी खाया और पड़ोस में भी भिजाया। फिर प्रगीत को फोन मिलाया उन्हें भी खाने को उकसाया और पापजी की डाट का किस्सा सुनाया। फिर मैंने अपनी मित्र को फोन मिलाया उनको बताया कि तुम सही थी पर बिल्कुल सही नहीं थी -"क्योंकि नवरात्र सोमवार को नहीं रविवार को हैं "।वो बोलीं हो सकता है पर हमें तो सोमवार ही बताया है खैर जब भी हों आज़ नहीं हैं ना तो बस आप लोग आ जाईये हम इन्तज़ार कर रहें है…

अब खबर है तो फैलेगी ही ना हम वहाँ पहुँचे वहाँ हमारे काफी मित्र थे जो भी मिले वही पूछे क्यों साहब आज़ आपने व्रत रखा अमावस्या को? कौन सी सिद्धी प्राप्त की ? कोई कहता अरे आज़ आप लोगों से दूर ही रहना होगा कहीं आप किसी आत्मा को ना बुला लें या वो आपके पूज़ा करने से खुदबखुद ही ना आ जाये क्योंकि इस दिन तो तांत्रिक पूज़ा किया करते हैं। ये सब बातें चल ही रही थी कि पापाजी का फोन आ गया वो बोले -"बेटा नवरात्र सोमवार से ही हैं"।

अब हम उस महफिल में जाकर लटके मुँह से सबको कहते हैं कि- " पापाजी का फोन आया है वो बोले कि-“ नवरात्र सोमवार से हैं " बस वो सब हमारी शक्ल देखें और हँसे और हम ? हमारी हालत तो आप सोच ही सकते हैं कैसी हुई होगी तभी तो अपना दुख, अपना लटका चेहरा आप दोस्तों में शेयर करने आ गये प्लीज़ आप लोग मत हँसियेगा…


(यह लेख किसी भी व्यक्ति या धर्म पर कटाक्ष नहीं है अगर किसी भी व्यक्ति को किसी भी बात का बुरा लगे तो मैं पहले से ही माफी माँगती हूँ …)


झूठ नहीं बोलूँगी क्योंकि अब व्रत चल रहें हैं हम अपने बच्चों को और खुद को भी अपनी सभ्यता और संस्कृति से जुड़ा रखने का भरसक प्रयास करते हैं…


भावना

30 मार्च 2008

आइये बधाई देने का अवसर आया...


१४ फरवरी २००८ को उत्तर प्रदेश हिन्दी सस्थान द्वारा घोषित वर्ष २००६ के लिये साहित्यकार डॉ० कुँअर बेचैन को 'हिन्दी गौरव सम्मान' कल २८ मार्च २००८ को लखनऊ के 'यशपाल सभागार' में दिया गया। इसमें उनको प्रशस्ति पत्र के साथ-साथ २ लाख रुपये की राशि भी सम्मान रूप में दी गई उनके इस सम्मान के लिये 'दिल के दरमियाँ' एवं उसके पाठकगण की ओर से उनको हार्दिक बधाई ...
चित्र साभार दैनिक जागरण २९ मार्च २००८

28 मार्च 2008

दिल को झकझोर देने वाले कुछ लम्हें....

अन्तिम यात्रा
A और B दो अलग-अलग संप्रदाय के होते हुए भी इतने अभिन्न मित्र थे कि उनकी मित्रता ही उनकी पहचान और दूसरों के लिये मिसाल बन चुकी थी। बचपन से ही पड़ोसी रहे दोनों का ही बचपन साथ-२ पुराने शहर की गलियों में दौड़ते हुये फिर स्कूल, कॉलेज तक और बाद में साथ-साथ ही सेना की नौकरी तक जवानी तक पहुँचा था। विवाहोपरान्त भी दोनों के आपसी संबंध में कोई भी परिवर्तन नहीं हुआ था। दोनों ने साथ ही पसीने की कमाई से शहर से बाहर बस रहे नये शहर में बराबर-२ के मकान बनवाये थे ताकि वृद्धावस्था में भी समय साथ ही बिताने का मौका मिला रहे।

दोनों के एक-एक पुत्र थे और वह भी पढ़ लिखकर पिता की तरह ही देश की सेवा के लिये सेना में भर्ती हुए थे अब A और B का भी रिटायरमेंट हो चुका था और सेना की अनुशासनता और दबंगता दोनों में अब भी उतनी ही थी जितनी सेना की नौकरी के समय हुआ करती थी । दोनों साथ-साथ ही अपने-२ संप्रदाय के तीज - त्यौहार भी साथ-२ मनाते थे। वह अकसर देश और समाज में फैली सम्प्रदायकता से जुड़ी बुराईयों पर विचार करते और दुखी होते थे। यही कारण था कि दोनों ने यह निर्णय लिया था कि' अपना समय समाज में फैली बुराईयों को दूर करने में ही लगायेंगे।
दोनों कभी अपना पुराना समय याद करने के लिये अपने दुपहिये वाहन को लेकर पुराने शहर की उन्हीं तंग गलियों में निकल पड़ते और पुराने हलवाई,पान वालों आदि की दुकान पर उनका लुत्फलेतेअपानीपेंशन का एक हिस्सा दोनों ही समाज के ऊपर खर्च करने में लगाते और समय-समय पर प्रौढ़ शिक्षा, चिकित्सा कैंप आदि का आयोजन करते रहते। यही कारण था कि दोनों ही आम लोगों में बहुत ही लोकप्रय हो चुके थे।

अब तो शहर में होने वाले किसी भी सरकारी आयोजनों में उनको आंमत्रित किया जाना जैसे अनिवार्य सा हो चुका था। चाहे जिलाधिकारी हों या पुलिस अधीक्षक आदि सब उनका अभिवादन करते थे। मगर ना जाने सांप्रदायिकता की आग ने क्यों पुराने शहर को अपने शिकंजे में बुरी तरह जकड़ रखा था। कोई तीज-त्यौहार आया नहीं कि सांप्रदायिक दंगे भड़क उठते थे पूरे शहर में और परिणाम कर्फ्यू। दोनों ही यह सब देखकर बहुत हताश हो जाते थे और भरपूर प्रयास करते थे लोगों में जागरूकता लाने की, पुलिस अधीक्सक भी अकसर उनसे राय मशवरा लेते थे इन हालातों पर ।

इस वर्ष फिर गुप्त सूत्रों द्वारा पुलिस को सूचना मिल रही थी कि कुछ बाहरी ताकतों की राय में फिर दंगाईयों ने दंगा करने की योजना बनायी है।पूरे शहर में रैड अलर्ट थी और आने आते जाते वाहनों की गहन जाँच पड़ताल चल रही थी । कुछ मौहल्लों से छुटपुट वारदातों की भी सूचना पुलिस महकमें में आये दिन आने लगी थी। मौके की गंभीरता को देखते हुए पुलिस अधीक्षक ने शहर के सभी प्रमुख व्यक्तियों के साथ एक सभा का आयोजन किया जिससे इस बात पर विचार किया जाना था कि कैसे इन हालातो को सुधारा जाये और पहले की तरह सामान्य बनाया जाये। Aऔर B भी '''इस आयोजन में आमंत्रित थे और हमेशा की ही तरह दोनों बिना अनुपस्थित B भी इस आयोजन में अपनी दुपहिया को लिये तैयार थे पुलिस अधीक्षक के आफिस तक जाने के लिये। हालांकि आज A कुछ अस्वस्थ थे और मगर B के लाख मना करने पर भी A उस सभा को छोड़ने के लिये तैयार न थे।आखिर B को भी उनके सामने झुकना पड़ा और साथ-साथ सभा में ले जाना पड़ा। सभा बहुत ही सफल रही और A और B के सुझावों की सभी गणमान्य व्यक्तियों ने बहुत ही सराहना भी की। सभा समाप्ति के बाद दोनों साथ ही आफिस से बाहर आये और दुपहिये पर बैठ गये।

A की तबियत में अ'भी भी ज्यादा सुधार नहीं था। मगर सेना की दबंगता A को झुकने के लिये तैयार नहीं थी। B ने सुझाव दिया कि अच्छा होगा कि लम्बे रास्ते की जगह पुराने शहर की पुलिया से चला जाये ताकि पूरा शहर भी पार न करना पड़े और घर भी शीघ्र पहुँच जायें। दोनों की सहमति होने पर A ने दुपहिये को ड्राइव करना शुरू किया और B हमेशा की तरह A के पीछे की सीट पर बैठ गये। दोनों ही सभा में हुई चर्चाओं के बारे में बात करते हुये पुराने शहर की पुलिया तक पहुँच गये। पुलिया पर चढ़ाई के समय A के दुपहिये ने भी अपनी हालत नासाज होने का सिग्नल दिया और दो व्यक्तियों को साथ ले जाने से साफ इंकार कर दिया। B ने A को कहा कि क्योंकि A की तबियत ठीक नहीं है इस लिये अच्छा है कि A अपने दुपहिये से अकेले ही पुलिया को पार कर ले और B पैदल ही चलकर पुलिया पार कर ले।

पहले तो A ने साफ इंकार किया और कहा कि दोनों पैदल ही दुपहिया को हाथ में लेकर पुलिया पार कर लेंगे। मगर B ने A को विवश कर ही दिया कि A अस्वस्थ होने के कारण A को अकेले पुलिया ही दुपहिया पर बैठकर पार करनी चाहिये और B पैदल पीछे-२ आ जायेंगे और फिर A चल पड़े अपने रास्ते और B पीछे-२।मगर होनी को कुछ और ही मंजूर था। दंगाई जो कि A के संप्रदाय के थे शहर में हल्ला करते हुए उसी पुलिया से गुजर रहे थे और जब उन्होंने रास्ते में B को अकेला पाया तो उन कठोर ह्रदय लोगों ने B के अस्तित्व को इस तरह तहस-नहस किया कि B की आह तक भी A तक नहीं पहुँच सकी। जब A ने धीरे-धीरे पुलिया पार की ओर पुलिया के दूसरी ओर B का इंतजार करने लगा मगर उसका इंतजार इतना लम्बा हो गया जायेगा उसको ये अंदेशा भी न था। जब B ने पुलिया के उस पार उस ओर से दंगाईयों को अक्रामक तरीके से आते हुये देखा तो उसके चेहरे पर चिन्ता की लहर दौड़ गयी और वह सब कुछ भूलकर पुलिया के दूसरी ओर दौड़े मगर जल्द ही उनको खून के धब्बे B का चश्मा और B के स्लीपर तितर-बितर नजर आये और अंत में वही भयानक दृश्य A की आँखों के सामने आ ही गया जिसका डर A के मन में अनचाहे ही आ चुका था। A की तो जैसे दुनिया ही उजड़ चुकी थी।आज उसके सामने उसका बचपन का साथी अन्तिम यात्रा पर निकल चुका था और A निशब्द उसको एकटक देखता ही रह गये क्योंकि उन्हें इस यात्रा में भी तो B का साथ जो देना था।


प्रगीत कुँअर

20 मार्च 2008

परदेश में, जब होली मनाई, तू याद आई ......

आप सभी मित्रों को होली की ढे़र सारी शुभकामनाएँ
हुई आहट

खोला था जब द्वार

मिला त्यौहार ।

आया फागुन

बिखरी कैसी छटा

मनभावन।


खेले हैं फाग

वृन्दावन में कान्हा

राधा तू आना।


तन व मन

भीगे इस तरह

रंगों के संग।


स्नेह का रंग

बरसे कुछ ऐसे

छूटे ना अंग।


रंगी है गोरी

प्रीत भरे रंगों से

लजाई हुई।


आई है होली

रंगी सब दिशाएं

दिल उदास ।


पिचकारी से

रंगों की बरसात

लाया फागुन ।


परदेश में

जब होली मनाई

तू याद आई ।


अगले साल

मिलेगें अब हम

फिर होली में ।
भावना

16 फ़रवरी 2008

डॉ० कुँअर बेचैन जी हिन्दी गौरव सम्मान से अलंकृत


गत बृहस्पतिवार दिनांक १४ फरवरी को उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ ने अपने वर्ष २००६ के विभिन्न पुरस्कारों की घोषणा की, यह पुरस्कार हिन्दी क्षेत्रीय साहित्यकारों को उनके साहित्य में किये गये योगदान के लिये दिया जाता है।

इन पुरस्कारों में इस वर्ष "हिन्दी गौरव सम्मान" के लिये 'डॉ० कुँअर बेचैन' जी को चुना गया है। जिसके तहत 'डॉ० कुँअर बेचैन' जी को २ लाख रूपये एवं प्रशस्ति पत्र से सम्मानित किया जायेगा, जो उनके हिन्दी गज़ल में किये नये प्रयोगों एवं अन्यविधाओं में दिये गये योगदान के लिये दिया जायेगा।
दिल के दरमियाँ और पाठकगणों की ओर से इस सम्मान के लिये उनको बहुत-बहुत बधाई एवं हार्दिक शुभकामनायें...
डॉ० भावना

24 जनवरी 2008

इन्तज़ार... सफ़र के अन्तिम पड़ाव का


उदासी के ये बढ़ते घेरे

मेरे अन्तर्मन में

काले सर्प की तरह

फन फैलाकर

बैठ गये हैं।


एक अँधेरे कुँए में

फेंक दिये गये

अजन्मे शिशु की तरह

डूबता जा रहा है

मेरा अस्तित्व।


सन्नाटे भरा हर पल

मेरे रोम-रोम को

भूखे शेर की तरह

नोंच-नोंच कर खाये जा रहा है।


जन्म से मृत्यु की
ओर

बढ़ता ये
सफ़र

साँसों की धूमिल डगर
को

तार-तार किये जा रहा है।


अब तो है बस इंतजार

इस सफ़र के अंतिम पड़ाव का

ताकि फिर कर सकूँ तैयारी

इक नये सफ़र की।


शायद आने वाला नया सफ़र

दे सके मेरे सपनों को

एक पूर्णता

एक नयी उंम्मीद...

डॉ० भावना

31 दिसंबर 2007

बस कुछ पल और थोड‌़ा सा इन्तज़ार... फिर खिलेंगे फूल ....महकेगी बगिया...

नव-वर्ष पर आप सभी मित्रों को हार्दिक शुभकामनाएँ-भावना,प्रगीत,कनुप्रिया,ऐश्वर्या की ओर से





पुराने
दिन
थे घमंड से चूर
लो बीत चले।


लो बीत चला
एक और सफ़र
नयी तलाश।


डाकिया लाया
खुशियों की चिट्ठियॉ
नये साल में.।


नये साल की
बगिया में खिलेंगे
सुखों के फूल ।


लो चल पड़े
नया साल खोजने
बर्फीले दिन।


आतंकित सा
पग-पग बढाये
ये वर्ष आये।

उज़ाड‌े घर
काहे का नया साल
आतंकियों ने।

आओ लें प्रण
न हो कोई गुनाह
इस वर्ष में।

डॉ० भावना

28 दिसंबर 2007

कुछ ऐसे चित्र जो नहीं मानते रंग भेद या जाति भेद, जानते हैं बस प्यार....

जाति रंग का भेद न हो
रचें आज ऐसा संसार
होली,ईद या हो क्रिसमस
मिलकर मनाये सारे त्यौहार...


मेरी बेटी अपने अफ्रीकन मित्रों के साथ


डॉ॰ भावना

27 दिसंबर 2007

कैसे बीता गाजियाबाद में ४ दिसम्बर का दिन चलिये देखते हैं

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गाज़ियाबाद
में ४ दिसम्बर का दिन ओमप्रकाश चतुर्वेदी पराग जी, बी० एल गौड़ जी, कमलेश भट्ट जी और व्योम जी के साथ हाइकु दिवस में मेरी पुस्तक "तारों की चूनर" के विमोचन के कुछ चित्र और खबरें... डॉ० व्योम जी के सहयोग से..

मित्रों की ख्वाहिश पर पुस्तक के कुछ अंश जल्दी ही पोस्ट करूँगी...


प्रवासी भारतीय हाइकुकार डा० भावना कुँअर (युगांडा) के हाइकु संग्रह तारों की चूनर का लोकार्पण करते हुए मुख्य अतिथि डा० जगदीश व्योम, अध्यक्ष ओमप्रकाश चतुर्वेदी पराग, विशिष्ट अतिथि बी०एल० गौड़ एवं संयोजक कमलेश भट्ट कमल



डॉ० भावना

6 दिसंबर 2007

छिड़ा जो युद्घ, रोएगी मानवता, हंसेंगे गिद्घ

Dec 05, 10:46 pm

गाजियाबाद, जागरण संवाद केंद्र

प्रसिद्घ साहित्यकार स्व. सत्यभूषण शर्मा के पचहत्तरवें जन्म दिवस पर हाइकू कवि गोष्ठी का आयोजन कविनगर में किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता ओमप्रकाश चतुर्वेदी ने की। संगोष्ठी के मुख्य अतिथि डा. जगदीश व्योम व विशिष्ट अतिथि बी.एल. गौड़ रहे। इस अवसर पर डा. अंजलि देवधर द्वारा लिखित पुस्तक हाइकू प्रवेशिका (विश्व के बच्चों की हाइकू) व डा. भावना कुंवर की हाइकू संग्रह तारों की चूनर का विमोचन किया।

कार्यक्रम की शुरूआत मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण तथा दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। सरस्वती वंदना अनुराधा भट्ट ने की। मुख्य अतिथि डा. जगदीश व्योम ने कहा कि स्व. सत्यभूषण शर्मा को भारत में हाइकू काव्य विधा के जनक हैं। उन्होंने बताया कि सत्रह अक्षरों में ही हाइकू में कविता निहित होती है। उन्होंने कहाकि आज के दौर में नेट पर विश्व में सबसे ज्यादा हिंदी भाषा पसंद की जा रही है। उन्होंने अपनी हाइकू 'छिड़ा जो युद्घ, रोएगी मानवता, हंसेंगे गिद्घ' के माध्यम से वाहवाही लूटी। गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे ओमप्रकाश चतुर्वेदी ने कहाकि हाइकू को जापानी भाषा में सेन्ड्रयू कहा जाता है। उन्होंने बताया कि जापान के कवि वासो ने भी हाइको एक विराट पूर्णता माना है। उन्होंने अपनी हाइकू 'बोये तुमने, काटने पड़े हमें पीड़ा के खेत' व 'पता न था, अंजाना सफर, कभी अंधा भी होगा' भी सुनाई। संगोष्ठी में मौजूद कवियों ने हाइकू के माध्यम से झकझोरा। व्यापार कर अधिकारी राजनाथ तिवारी ने सुख और दुख पर अपनी हाइकू 'पागल सुख, देता है, एक दिन दारुण दुख' कही तो लोग ताली बजाने लगे। डा. मधु भारती ने अंग्रेजी पर व्यंग्य कसते हुए कहा, देश प्रेमी वे, आंग्ल भाषा में हंसे, हिंदी में रोएं। अंजू जैन ने अपनी हाइकू 'खामोशी सदा हारती नहीं जीतती भी है।' सुनाई। संगोष्ठी के समापन पर संचालक कमलेश भट्ट ने अतिथियों को धन्यवाद दिया। महादेव प्रसाद, जितेंद्र साहू, नेहा बैद, विशारद भट्ट, कुसुम भट्ट, सुमन तिवारी, प्रत्युष यादव की गोष्ठी मौजूदगी उल्लेखनीय रही।

5 दिसंबर 2007

आप सबके स्नेह की आभारी

हाइकु दिवस के पावन अवसर पर आप सबको हार्दिक बधाई

आज मैं खुद को बहुत भाग्यशाली मान रही हूँ कि इस इस शुभ अवसर पर मेरी पुस्तक "तारों की चूनर" (हाइकु संग्रह) का विमोचन भारत में किया गया जिसमें प्रसिद्ध हाइकुकार डॉ० जगदीश व्योम जी और पूर्णिमा जी का पूर्ण सहयोग मिला मैं उनकी तहे दिल से आभारी हूँइससे सम्बन्धित जानकारी आप यहाँ चित्र सहित देख सकते हैं...

डॉ० भावना कुँअर

9 नवंबर 2007

जगमगाये दिल के दिये

जलेगा दिल

फिर दीवाली पर

माटी से दूर।


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देकर साँसें

करे जग रोशन

दीया बेचारा।


दीप सजाएँ

स्नेह और प्रेम के

दीपावली में।


नेह चिराग

जलाकर रखना

घर-घर में।


जल उठेंगे

निर्दोष शलभ भी

इन दीपों से।


चीरता गया

अँधियारे का सीना

पावन दीया।


सच्ची दीवाली

जो पोंछ डाले आँसू

गरीबी के भी।


आँख के आँसू ,

उदर की आग को

डस लें दीये।