11 नवंबर 2010

रात का सन्नाटा...

















रात का सन्नाटा
और भी बढ़ा देता है
मन की वीरानी को...
और ढकेल देता है
यादों की गहरी खाईयों में...
कभी न निकलने के लिए...
और गहराता जाता है
हर पल, हर क्षण
कभी न खत्म होने वाली
बीमारी सा
और एक दिन
ले जाता अपने संग
कभी ना लौटाने के लिए...


भावना


4 नवंबर 2010

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ


आप सभी मित्रों को दीपावली की हार्दिक
शुभकामनाएँ ...

"दीपावली पर एक दीए की दर्द भरी कराह को महसूस करना चाहते हैं या उसका कुछ दुख बाँटना चाहते हैं तो इस लिंक को एक बार जरूर देखियेगा।"





http://gavaksh.blogspot.com/2010/11/2010.html

Bhawna



26 अक्टूबर 2010

आँखे















आँखे जाने क्यों


भूल गई पलकों को झपकना...

क्यों पसंद आने लगा इनको

आँखों में जीते-जागते

सपनों के साथ खिलवाड़ करना …

क्यों नहीं हो जाती बंद

सदा के लिए

ताकि ना पड़े इन्हें किसी

असम्भव को रोकना ।


Bhawna

14 अक्टूबर 2010

मेरा दर्द कुछ इस तरह भी...
















आँखों के नीचे

दो काले स्याह धब्बे ...

आकर ठहर गए

और नाम ही नहीं लेते जाने का...

न जाने क्यों उनको

पसंद आया ये अकेलापन।





Bhawna

7 अक्टूबर 2010

नहीं रही अब हिन्दी दूर ऑस्ट्रेलिया से...

ऑस्ट्रेलिया-"सिडनी" की बहुचर्चित प्रथम ऑनलाईन हिन्दी पत्रिका "हिन्दी गौरव" का अब प्रकाशन भी मासिक पत्रिका के रूप में प्रारम्भ हो गया है, जिसके प्रथम प्रकाशित संस्करण का विमोचन २ अक्तूबर को सिडनी में बहुत धूमधाम के साथ मनाया गया।
जिसके मुख्य संपादक अनुज कुलश्रेष्ठ जी ने संपादन समिति में मुझे और रामेश्वर काम्बोज जी को भी सम्मिलित किया है। इस पत्रिका के प्रथम संस्करण में मेरी दो रचनाएं और गॉधी जी पर लेख प्रकाशित हुए हैं।

साथ ही सिडनी में एक कवि सम्मेलन का आयोजन भी ११ सितम्बर २०१० को किया गया जिसमें मुझे भी कविता पाठ करने का अवसर प्राप्त हुआ।

प्रस्तुत हैं "हिन्दी गौरव" पत्रिका में प्रकाशित उस कवि सम्मेलन पर समाचार और मेरी रचनाएं-













































29 सितंबर 2010

क्या आप बता सकते हैं कि ये क्या है?

आप तो जानते ही हैं कि मुझे फोटो खींचने का कितना शौंक है तो बस ये फोटो मैंने हाल ही में खींचा है। तो अब आपकी बारी है बताने की कि- ये है क्या? हाँ जानती हूँ कुछ लोग बता भी देंगे तो जल्दी
बताइये ना मुझे इंतजार रहेगा। फिर तैयार रहना अगले फोटो के लिए।














Bhawna


6 सितंबर 2010

अपनी जन्मस्थली को बहुत मिस कर रही हूँ ...

आपको शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ...

आज शिक्षक दिवस पर मैं अपने सभी शिक्षकों को तहे दिल से याद करते हुए शत-शत नमन करती हूँ, जिनके कारण आज़ मैं इस मुकाम तक पहुँची हूँ, आज मैं भी एक शिक्षक हूँ मुझे भी मेरे छात्र बहुत प्यारे हैं, हाल ही में मेरी एक छात्रा Great Barrier reef की यात्रा पर गई थी, १५ दिन पानी के जहाज का आंनद उठाते हुए उसने जो भी महसूस किया सब मुझे बताया और तोहफे के रूप में आज मुझे उसके खुद के खींचे फोटो मुझे भेंट स्वरूप दिए, जिसे मैं आप सबके साथ बाँटना चाहूँगी, वैसे हजारों फोटो आपको गूगल पर मिल जायेंगे पर उनमें मेरी छात्रा का मेरी प्रति स्नेह, सम्मान तो नहीं छलकेगा, जो मेरे लिए अमूल्य निधि है। मैं अपनी भावनाएँ आप तक पहुँचा पाई या नहीं ये तो मालूम नहीं, किन्तु मुझे आप सब अपने बहुत करीब लगे , आज के दिन में अपनी जन्मस्थली को बहुत मिस कर रही हूँ क्योंकि मेरे सारे शिक्षक भी तो वहीं हैं।





























































भावना

24 अगस्त 2010

दिल में छाई उदासी..

आज रक्षाबन्धन है सभी इस पर्व पर खुशियाँ मना रहे होंगे, मनानी भी चाहिए, लेकिन कुछ दिल ऐसे भी हैं जो आज़ बहुत उदास भी हैं जिनमें मेरे पापा भी हैं उनकी दो बहनें थी दोनों ही उनका साथ छोड़ गई, बहुत याद करते हैं पापा उनको, पर यही तो दुनिया है दुख-सुख साथ-साथ चलते है। कुछ भाई अपनी बहनों से दूर परदेस में हैं, उनमें मेरा परिवार भी है जो यहाँ इतनी दूर है, इस पर्व पर उनका याद आना स्वाभिक भी है, माँ भी हर त्यौहार पर अपने बेटे का रास्ता देखती है, इसी को थोड़ा सा हाइकु के माध्यम से मैंने और रामेश्वर जी ने कहने का प्रयास किया है, शायद पंसद आए, अगर आए तो हौसला जरूर बढाइये।

बहुत-बहुत आभार

इस पर्व की बहुत सारी शुभकामनाएँ

नेह की गली
मन में खिली अब
आस की कली ।
R

आस की कली
ना मुरझाये कभी
ना, सूनी गली। B

नेह तुम्हारा
तोड़ बँधन सब
खींच ही लाया । B

न टूटे कभी
आशाओं की कलियाँ
आरज़ू यही । B

तुमको देखा
मिट गई मन से
चिन्ता की रेखा । R

परदेस में
जब याद तू आई
बड़ा रुलाई । B

चिन्ता ने तुम्हें
बना दिया बीमार
मेरे कारण। B

जाँऊगा नहीं
छोड़कर आँचल
माँ तेरा कभी। B

Bhawna

11 अगस्त 2010

हो गए पूरे ४ साल...आइये केक कर रहा है इंतज़ार...






केक आप सबके लिए...

अपना ही केक है, अपने घर में, चिन्ता मत कीजिए नुकसान नहीं देगा...







९ अगस्त २००६ का वो दिन था जब
मैंने अपनी पहली पोस्ट डाली थी यानि की मैंने ब्लॉग लिखना शुरू किया था, अब ९ अगस्त को पूरे ४ साल हो गए,पता नहीं कितनी सफलता मिली, पर हॉ एक बड़ा परिवार मिला, मित्र मिले, उनका अथाह स्नेह मिला बस जिंदगी में सबकुछ मिल गया.
आज़ ११ तारीख
हो गई लिखना तो ९ को ही चाहती थी, पर व्यस्तता ने हाथों में हथकडियाँ जो डाल दी थी। आप सबके बिना सेलिब्रेशन भी कैसा? अब तो देश भी बदल गया अब युगांडा ने आस्ट्रेलिया की जगह जो ले ली और यहाँ आये भी १ साल कैसे बीत गया पता नहीं चला। आप लोगों का स्नेह यूँ ही बना रहा तो कुछ न कुछ नया तो लेखन में आता ही रहेगा। अभी तो दो ही पुस्तक निकली हैं आगे जल्दी ही २ पुस्तक प्रकाशित करने का प्लान है देखिए कब तक सफलता मिलती है।



मैं और मेरी छोटी बेटी ऐश इंडियन रेस्टोरेंट में गए थे खाना खाने ....उसके बाहर का फोटो.... सूरज की किरणों ने हमारा कैसा श्रृंगार किया है देखिए..... है ना कमाल......







भावना

9 अगस्त 2010

दो मुँह वाला कछुआ...

अरे ये दो मुँह वाला कछुआ तो बहुत ही प्यारा है देखो तो कितने सारे लोगों की निगाहें इसको कितने प्यार से निहार रहीं हैं काश !मैंने भी इसे देखा होता यही मलाल हो रहा है ...





















अरे क्या देख रहे हो भाई मैंने मुंह साफ किया है ...













बहुत थक गया हूँ ...आराम करना चाहता हूँ ...चलिए इन महाशय का हाथ ही सही ...
बड़े प्यार से लिटाये हैं ...














चलना होगा ...दूसरे बच्चों से भी तो मिलना है ना...













बहुत तेज भूख लगी है ...आज पत्ते से ही काम चलता हूँ ...















अरे !ये तो बहुत स्वाद है
...












अरे रुको फोटो ले रहे हो

तो जरा पोज तो बनाने दो ...








Bhawna

3 अगस्त 2010

अनुभूति में...

कमल पर कुछ हाइकु अनुभूति में भी प्रकाशित हुए हैं पढ़कर प्रतिक्रिया दीजिएगा आपकी प्रतिक्रिया ही हौसला बढ़ाती है।

http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/kamal/bhawna_kunwar.htm


१-

देखी चाँदनी

आँचल सँवारती

खिले कमल।
२-

खुश तालाब

कमलों की बारात

सच या ख्वाब।

३-

सुबके झील

दिलासा देता हुआ

देखो कमल।
४-

बार-२ नहाए

शैतान सा कमल

झील शर्माए।

५-

कमल पर

बिखरे पड़े हीरे

चमचमाते।

भावना

22 मार्च 2010

एक बीज ...

लीजिए जनाब अब पर्थ से वापसी हो गई है सिडनी में, अपने परिवार के बीच, अब यहाँ आकर फिर वही जिंदगी पहले की तरह ...
कभी-कभी दिल कुछ इस तरह भी सोचता ...आप लोग भी देखियेगा उदासी जरूर है... पर ऐसा होता भी है ना... आप लोगों की राय बहुत कीमती है ...

एक बीज
मैंने बोया
छोटे से
टीन के डब्बे में...
गमला खरीद सकूँ
हैसियत न थी...
अंकुर फूटा
मेरा चेहरा खिल उठा
मैं उसे प्यार से सींचती रही
अब वो पौधा बन चुका था ...
मगर ये क्या?
ये अचानक मुरझाने लगा
मेरा दिल काँप उठा
मैं देख नहीं सकती थी
उसे इस तरह मरते हुए ..
आनन-फानन में
खरीद डाला मैंने
एक बड़ा बगीचे वाला घर ...
क्या करती उन आभूषणों का
जो बहुत दिन से
बन्द पड़े थे अलमारी में ...
मैंने पौधे को
मुक्ति दिला दी
उस टीन के टूटे-फूटे डिब्बे से ...
रोप दिया उसे
बड़े बगीचे में
पौधा मुस्करा उठा
लहलहाने लगा, झूमने लगा ...
अनदेखा किया मैंने
डब्बे की दयनीय स्थिति को
लचीला पौधा अब
बलिष्ठ पेड़ बन चुका था
बड़ी-बड़ी शाखायें
मजबूत तना
बहुत सारी पत्तियां
जिसने पूरे घर को
अपनी शाखाओं से
जकड़ कर
धराशायी कर दिया
सीना ताने
अपने मद में चूर
अहं की चादर लपेटे
शान से खड़ा है...
मैं निरीह सी
सड़क पर चल पड़ी
भूखी प्यासी
तूफानी रात में
भटकती रही
आज भी भटक रही हूँ ...
खोजने उस डब्बे को
ताकि माफी माँग सकूँ उससे ...
जिसकी पीड़ा जानकर भी
किया था अनदेखा मैंने
जानती हूँ
ये उसी की आह थी
जो लगी थी मुझे ...

Bhawna

28 फ़रवरी 2010

शुभकामनाएँ...

आप सबको दिल के दरमियाँ की ओर से होली की हार्दिक शुभकामनाएँ
भावना कुँअर

12 फ़रवरी 2010

बस यूँ ही...

मित्रों काफी दिनों से आप लोगों से वार्तालाप नहीं हुई, व्यस्तता ही इतनी रही,लिखा तो इन दिनों बहुत पर पोस्ट नहीं कर पाई,किन्तु अब ऐसा नहीं होगा, जो लिखा सभी अब क्रम से पोस्ट किया जायेगा, आप सबका स्नेह और दुआएं ही मेरी प्रेरणा रहें हैं।


कल मेरा जन्मदिन है और मैं यहाँ (आस्ट्रेलिया-पर्थ) में अकेली हूँ बच्चे और प्रगीत आस्ट्रेलिया-सिडनी में हैं,सबको बहुत मिस कर रही हूँ, पहली बार ऐसा हुआ है कि मैं मम्मा,पापा यहाँ तक कि बच्चों,प्रगीत सभी से दूर हूँ, पर किया जाये जब काम करना है तो करना ही है उसमें ये सब दूरियाँ तो सहनी ही होंगी,ऐसे वक्त में बस यही कह सकती हूँ

आज मन
कुछ अनमना सा है...
सब कुछ होते हुए भी
कुछ कमी सी ...
मिल रहा है
मेरे सपनों कों
एक साकार रूप ...
जिन सपनों को
टूटते, बिखरते से
बचाया था मैंने
फिर दिया ...
एक मुकम्मल मुकाम
तो फिर आज ...
ये उदासी मुझे
क्यूँ बींध रही है?
क्यूँ आज इन ओठों से
हँसी की जगमगाहट
धुँधली पड़ गई है?
क्यूँ दिल की धड़कन में
हलचल नहीं है?
और क्यूँ
मेरी इन आँखों में...
ठहरी हुई
ये नमी सी है?
हाँ जानती हूँ मैं
मेरी साँसों को
प्रवाह देने वाले
मेरे जीवन साथी
वो तुम ही हो ...
जिसकी
हर पल, हर लम्हा
इन धड़कनों में
कमी सी है ...

भावना कुँअर

7 दिसंबर 2009

वापसी अपनों के पास

प्रिय मित्रों आज बहुत दिनों बाद आप सबसे बात करने का अवसर मिला है, मेरी बहुत सारी मजबूरियाँ रही बेटी की तबियत बिगडना, मेरा युगांड़ा से सिडनी जाना और भी इस बीच काफी उथल-पुथल रही, पर अब आप लोगों को पढ़ने का सिलसिला हाँ लिखने का भी कोशिश करुँगी की ना टूटे, आप लोगों का स्नेह मुझे फिर खींच लाया अपनों के बीच यूँ ही स्नेह बनाये रखियेगा अपनी एक रचना आज़ पोस्ट करती हूँ आशा है पंसद आयेगी...

उदासी के ये बढ़ते घेरे
मेरे अन्तर्मन में
काले सर्प की तरह
फन फैलाकर
बैठ गये हैं।
एक अँधेरे कुँए में
फेंक दिये गये
अजन्मे शिशु की तरह
डूबता जा रहा है
मेरा अस्तित्व।
सन्नाटे भरा हर पल
मेरे रोम-रोम को
भूखे शेर की तरह
नोंच-नोंच कर खाये जा रहा है।
जन्म से मृत्यु की ओर
बढ़ता ये सफ़र
साँसों की धूमिल डगर को
तार-तार किये जा रहा है
अब तो है बस इन्तज़ार
इस सफ़र के अंतिम पड़ाव का
ताकि फिर
कर सकूँ तैयारी
इक नये सफ़र की
शायद आने वाला नया सफ़र
दे सके मेरे सपनों को
एक पूर्णता
एक नयी उंम्मीद।
भावना

24 अगस्त 2009

मेरी बेटी अब बहुत ठीक है...

प्रिय मित्रो,
आप सबकी सच्चे मन से की गई दुआओं से मेरी बेटी अब बहुत ठीक है, मैं अब परिवार सहित आस्ट्रेलिया में-सिडनी में आ गई हूँ अब यहीं रहना है,मैं जल्दी ही यहाँ का अनुभव आप सब लोगों के साथ बाँटूगी बहुत सारी बातें हैं जो आप लोगों को सुनानी हैं आप लोगों से सुननी हैं जरा थोड़ा सा समय चाहिये सैट होने में ...
स्नेह
भावना

16 मई 2009

मेरी नन्हीं सी जान...

मेरी प्यारी सी बेटी ऐश्वर्या जो मात्र ९ साल की है ...अप्रैल से ही बहुत बीमार चल रही ...है अभी तीन दिन पहले ही अस्पताल रहकर आई ...है अभी भी घर पर काफी दवाईयाँ दी जा रही ...हैं उसकी पढ़ाई भी बन्द ...है स्कूल जाने को डॉ० ने मना किया ...है मैं उसके कारण बहुत अपसैट ,हूँ इसीलिए ना ही कुछ लिख पाती ,हूँ ना पढ़ पाती ,हूँ मेरी जान मेरी प्यारी नन्हीं सी जान में अटकी ...है आज काफी दिन बाद मेल देखी तो काफी दोस्तों की मेल आई ...मिली मेरे ना पढ़ने ना लिखने का कारण जानने के ..लिए मैं मेरे दोस्तों की आभारी हूँ उनका स्नेह देखकर ...इसीलिए ये पोस्ट डाली है ताकि सभी को जानकारी मिल जाये मेरे ना पढ़ने और लिखने का ,कारण जैसे ही मेरी बेटी ठीक होकर स्कूल जाने लगेगी मैं वापस अपने दोस्तों और पाठकों के बीच आऊँगी...
स्नेह और आभार
भावना

2 अप्रैल 2009

फर्स्ट अप्रैल की मधुर स्मृति...

कल फर्स्ट अप्रैल पर मुझे भी मेरे बचपन की शरारतों ने आ घेरा, नींद का आँखों में नामोनिशान न था, रह-रहकर मुझे अपना मासूम, चुलबुला, प्यारा सा बचपन याद आ गया, अब तो वो मासूमियत दुनिया के थपेड़ों से कठोरता में,चुलबुलापन बच्चे और परिवार की जिम्मेदारियों में और बडप्पन में बदल गया है. लेकिन दिल तो वही है जिसमें यादों का खज़ाना हुआ है। उसी खज़ाने का एक प्यारा सा मोती आप सबके साथ बाँटना चाहूँगी…

ऐसा ही एक दिन था फर्स्ट अप्रैल का दिन, हम सभी परिवार के लोग अपने फार्म हाऊस पर गए हुए थे। हम भाई-बहिन बहुत धमा-चौकड़ी मचाते थे, शरारतें करते थे, पर पापाजी से सभी डरते थे, उन्हें देखकर तो बस साँप ही सूँघ जाता था, भूख-प्यास सब गायब हो जाती थी।

शाम का वक्त था मम्मी ने हमें बुलाया, वो रसोईघर में काम कर रहीं थी, हमसे बोली- "जाओ अपने पापाजी से कहो फार्म से अच्छा सा सीताफल ले आयें आज खट्टा मीठा सीताफल,परांठे और खीरे का रायता बना दूँगी, तुम लोगों को बहुत पंसद है ना" हमने भी खूब उछल-उछलकर कहा -"हाँ हाँ बहुत मजा आयेगा।" हमारी उम्र ६ साल रही होगी हम अपने बड़े भाई के साथ पापाजी को मम्मी की बात बताने पहुँच गए पापाजी ने कहा-“ चलो तुम लोग भी चलो” हम भी खुशी-खुशी पापाजी के साथ चल दिए। दूर-दूर तक फैले फार्म हमें बहुत भाये, चारों तरफ हरियाली ही हरियाली ,बहुत सारे पेड़ -आम,अमरूद, केले, कटहल, जामुन और भी ना जाने कितने, एक जगह पर बहुत सारी बेल फैली हुई थी जो रंग बिरंगे फूलों से सजी थी ,तब उनका नाम नहीं जानते थे, वहीं उन बेलों के पास पापाजी को जाते हुए देखा, शायद सीताफल वहीं होता है, यही सोचकर हम पापाजी का इन्तजार करने लगे जैसा कि उन्होंने आदेश दिया था।

थोड़ी देर बाद पापाजी को खाली हाथ आते हुए देखकर हमने पूछा- "क्या नहीं मिला "? तो वो बोले कि - "पहले ये बताओ कौन ले जाकर देगा अपनी मम्मी को मैंने तपाक से कहा- "मैं"। पापाजी ने कहा- "ठीक है मैं कुछ लेकर आता हूँ जिसमें उसको रख लूँ फिर तुम्हें दे दूँगा" । हमने हाँ में गर्दन हिला दी थोड़ी देर बाद वो एक कम्बल का टुकड़ा लेकर आये और वापस बेल वाले स्थान पर चले गए, वापस आये तो उनके हाथ में उस कम्बल के टुकड़े में सीताफल है सोचकर हम खुश होते हुए उनके पास पहुँचे, पापाजी ने थोड़ी दूर तक खुद ही रखने के बाद देने को बोला, क्योंकि वो हमारे लिए बहुत भारी था।

अब दरवाजे के पास जाकर उन्होंने हमें वो भारी-भरकम सीताफल दे दिया, हम ठहरे सींकड़ी पहलवान, हमसे वो सँभाले ना सँभले, पर हमने भी हार ना मानी और हम लुढकते पुडकते मम्मी के पास पहुँच गए, जो अँगीठी में कोएले डाल रहीं थी और चौकी पर बैठी थी हमने पापाजी के निर्देशानुसार जाकर, उनकी गोद में वो कम्बल के टुकड़े में लिपटा सीताफल लगभग पटक सा दिया, ताकि बोझ से निजात मिले, खाना तो बहुत पंसद था, पर आज जब उसको ढोना पड़ा तो नानी याद आ गई मैं,पापाजी और हमारे भाई वही खड़े मम्मी को उसको खोलते हुए देख रहे थे मम्मी ने जैसे ही उसको खोला तो तेजी से कोई चीज कूदती नजर आई और पापाजी जोर से चिल्लाए अप्रैल फूल बनाया, अप्रैल फूल बनाया हम भी उनके साथ यूँ ही चिल्लाने लगे और सभी उस भागने वाले जीव के पीछे दौड़े, मम्मी सहित, जानते हैं वो क्या था जी हाँ वो तो एक कछुआ था जो दौड़े जा रहा था और हम उसके पीछे ताली बजा-बजाकर नाच रहे थे फिर वो बाहर बने एक बड़े से नाले में कूद गया और हम बस मम्मी की शक्ल देखते रहे, जो अब भी उसकी सिहरन को महसूस कर रहीं थी।

(आज़ मैं यहाँ बहुत अकेला महसूस करती हूँ, उस मिट्टी की खुशबू को, उस शीतल हवा को अपने साँसों में महसूस करती हूँ, इतने दूर बैठे अपने माँ, पा को और कभी-कभी बच्ची बन खो जाती हूँ यादों के जंगल में ...परदेसी हवा और अपने वतन की हवा में बस यही तो अंतर है...)

डॉ० भावना

19 मार्च 2009

“जब मौत को मैंने देखा अपने बहुत ही करीब…

अनिल कान्त जी का संस्मरण "एनोदर डे ऑफ़ माय लाइफ " को पढ़कर बीता बचपन याद आ गया…

उम्र तो ठीक से याद नहीं है, बस इतना याद है कि हम छोटे थे। हम मम्मी पापा के साथ शहर में रहते थे।हमारी इकलौती बुआजी गाँव में रहती थी। हमने कभी उनका गाँव देखा नहीं था कारण मम्मी पापाजी कभी लेकर ही नहीं गये।

हमारे बड़े भाई (बुआजी के बेटे) शहर हमारे घर आये और हम भाई,बहन को अपने साथ ले जाने की जिद करने लगे, पर हमारे पापाजी के सामने किसी की चल सकती है भला, जहाँ पापाजी वहाँ कोई टिकता भी नहीं था। मम्मी को पटाया गया हाँ वो अलग बात है कि उनको पटाने पर भी हमको भेजा तो नहीं गया एक वादा जरूर किया गया कि… वो हमें लेकर वहाँ जरूर जायेंगे।

कुछ दिनों बाद पता चला हमारी बुआजी की बड़ी बेटी की शादी तय हो गई है ।अब हमने अपनी मम्मी को उनका किया वादा याद दिलाया… बस फिर क्या था… मम्मी लगीं पापाजी की मख्खनबाजी में… और आखिरकार मम्मी ने किला फतह कर ही लिया और हम सब चल पड़े शादी का आन्नद उठाने।


शादी बड़ी धूमधाम से हुई अपने बहन -भाईयों के साथ खूब मन लगा… अब बारी थी… बिछड़ने की… हम सब लगे फूट-फूट कर रोने …हमारा रोना हमारी बुआजी से देखा नहीं गया और उन्होंने हुक्म सुनाया कि बच्चे अभी नहीं जायेंगे बाद में बुआजी भिजवा देंगी। गुस्से में हमारी बुआजी भी पापाजी की ही तरह थीं । ( वो अब इस दुनिया में नहीं हैं पिछले दिनों कैंसर से उनकी मृत्यु हो गई)पापाजी से उम्र में भी बड़ी थीं, तो पापाजी को भी उनकी बात माननी पड़ी। मम्मी पापाजी के साथ लौट गईं। हम भी बेफिक्र हो अपने भाई बहनों के साथ खूब खुश रहे, खेले कूदे, जाने की भी चिन्ता नहीं थी, स्कूल खुलने में कुछ ही दिन बचे थे तो हमारे दोनों भाई (हमसे दोनों ही बड़े हैं , दो बड़ी बहनें हैं।) हमें और हमारे बड़े भाई को छोड़ने आये, अब यहीं मुसीबत आ गई… हमें पता भी नहीं था कि हम वापस कैसे जायेंगे। अब सुबह-२ तैयार हुए और चल पड़े। अब भैया ने हमें ट्रैक्टर पर बिठाया और बढ़ लिए स्टेशन की तरफ …जब तक स्टेशन पहुँचे तो मारे पेट दर्द के बुरा हाल था, इससे पहले कभी ट्रेन में भी नहीं बैठे थे ट्रैक्टर तो बहुत दूर की बात थी। कार के आदी जो थे। बस अब आ गया स्टेशन, भैया ने सख्त हिदायत दी कि- हम हाथ ना छोड़े , बहुत भीड़ थी, भैया ने समझाया कि- "हमारी ट्रेन उधर आयेगी तो हमें नीचे उतरना है पटरियों से, पुल से जाने में ट्रेन छुट जायेगी जब मैं चलूँ तभी चलना।" हमने हाँ में गर्दन हिला दी जबकि वो बता हमारे बड़े भैया को रहे थे, बस हम इन्तजार करने लगे उनके आदेश का… हम तो वैसे बहुत एक्साइटिड थे ट्रेन में जाने के …भैया ने हम दोनों का हाथ पकड़ा और नीचे कुदा दिया, लाईन पार करने के लिए… बस यहीं हमसे चूक हो गई क्योंकि नीचे उतारने के बाद भैया ने हाथ छोड़ दिया और हम लगे अपनी धुन में ना जाने क्या सोचते हुए से चले गये सीधे और लाईन कर ली पार… हमने भैया को बोला-" ऊपर चढ़ाओ" अब भैया हों तो चढ़ायें देखा सब लोग चिल्ला रहें हैं – “अरे कोई बचाओ बच्ची मर जायेगी” हमें नहीं पता कि वो किसके लिए बोल रहे थे हमारा तो बस खून सूख गया… जब देखा कि हमारे भैया लोग उधर खड़े हैं… हमने तो बस उनकी सूरत देखी और वापस दौड़ पड़े उनकी तरफ, वो भी कुछ कह रहे थे, इशारा कर रहे थे , पर हमें कुछ समझ ही नहीं आ रहा था, आ रहा था बस इतना कि हम अपने भैया से बिछड़ जायेंगे अगर इधर ही खड़े रहे तो, चीखना, चिल्लाना जारी था… हम जब लाईन के बीच में आये तो कान फाड़ देने वाली आवाज को सुना, दायें मुड़कर देखा तो ट्रेन हमारे बिल्कुल पास थी, जब मौत को हमने देखा अपने बहुत ही करीब तो होश ही उड़ गए …वहाँ खड़ी औरतों की तो सिसकियाँ तक फूट पड़ी, ना जाने कैसे हमने बाकी बची लाईन पार की, उसके आगे का कुछ पता नहीं जब आँख खुली तो हम ट्रेन में थे और हमारे भैया सहित कुछ लोग हमारे ऊपर पानी के छींटे मार रहे थे, हम खुद को इसी दुनिया में पाकर आश्चर्यचकित थे और डर के मारे बोल नहीं फूट रहे थे भैया हमें समझाने में लगे थे कि -" मामाजी से कुछ मत बताना वरना वो मुझे बहुत मारेंगे "

जब
घर पहुँचे तो हमारा उतरा चेहरा देखते ही पापाजी भाँप गये कि कुछ हुआ है… उन्होंने हमारे भैया को जैसे ही आँख दिखाकर सच बोलने को कहा… हमारे भैया सुपर फास्ट ट्रेन की तरह एक ही साँस में सब कह गये… बस फिर क्या था हमारे भैया की जो धुनाई हुई,उन्हें आज तक याद है और हम हमारा तो पूछो ही मत आज भी अगर दूर कहीं ट्रेन की आवाज सुन लें तो दिल इतनी जोर से धड़कता है कि लगता है बस ये धड़कन कुछ और थोड़ी देर बस …उसके बाद एक लम्बी सी खामोशी…

डॉ० भावना कुँअर

10 मार्च 2009

दिल के दरमियाँ की ओर से सभी मित्रों को होली की ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ...

आओ मनाए होली...
रंग चुरा लें...
तितलियों से...
और मधुर सुर.
चिड़ियों से...
फूलों पर छिटकती
किरणों से...
लेकर चमक,
दूब पर फैली
ओस कण को...
भर मुट्ठी में,
वादियों में बिखरे
रंगों को...
प्रीत संग घोल
आज रंग दें...
हर कोना...
भावना,प्रगीत, कनु, किट्टू