15 मई 2011
3 मई 2011
गवाक्ष में कुछ इस तरह....
गवाक्ष – नवंबर 2010
“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू।एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की तीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के नवंबर 2010 अंक में प्रस्तुत हैं - डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया) की कविताएं तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की इकत्तीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…
आस्ट्रेलिया(सिडनी) से
डा. भावना कुँअर की कविताएँ
॥एक॥
दीये की व्यथा
(दीपावली पर विशेष)
शाम के वक्त
घर लौटते हुए
चौंका दिया मुझे एक
दर्द भरी आवाज़ ने
मैं नहीं रोक पाई स्वयं को
उसके करीब जाने से
पास जाकर देखा तो
बड़ी दयनीय अवस्था में
पड़ा हुआ था एक "मिट्टी का दीया"
मैंने उसको उठाकर
अपनी हथेली पर रखा
और प्यार से सहलाकार पूछा
उसकी कराहट का मर्म?
उसकी इस अवस्था का जिम्मेदार?
वह सिसक पड़ा
और टूटती साँसों को जोड़ता हुआ -सा
बहुत छटपटाहट से बोला-
मैं भी होता था बहुत खुश
जब किसी मन्दिर में जलता था
मैं भी होता था खुश जब
दीपावली से पहले लोग मुझे ले जाते थे अपने घर
और पानी से नहला-धुलाकर
बड़े प्यार से कपड़े से पौंछकर
सजाते थे मुझे तेल और बाती से
और फिर मैं
देता था भरपूर रोशनी उनको
झूमता था अपनी लौ के साथ
करता था बातें अँधियारों से
जाने कहाँ-कहाँ की मिट्टी को
एक साथ लाकर
कारीगर देता था एक पहचान हमें
"दीये की शक्ल"
और हम सब मिलजुलकर
फैलाते थे एक सुनहरा प्रकाश
पर अब
हमारी जगह ले ली है
सोने, चाँदी और मोम के दीयों ने
अब तो दीपावली पर भी लोग दीये नहीं
लगातें हैं रंग बिरंगी लड़ियाँ
और मिटा डाला हमारा अस्तित्व
एक ही पल में
तो फिर अब भी क्यों रखा है
नाम "दीपावली" यानी
दीयों की कतार?
आज फेंक दिया हमें
इन झाड़ियों में
तुम आगे बढ़ोगी
तो मिलेंगे तुम्हें मेरे संगी साथी
इसी अवस्था में
अपनी व्यथा सुनाने को
पर तुमसे पहले नहीं जाना किसी ने भी
हमारा दर्द, हमारी तड़प
आज वही भुला बैठे हैं हमें
जिन्हें स्वयं जलकर
दी थी रोशनी हमने
0
॥दो॥
आँखें जाने क्यों
आँखें जाने क्यों
भूल गई पलकों को झपकना...
क्यों पसंद आने लगा इनको
आँखों में जीते-जागते
सपनों के साथ खिलवाड़ करना …
क्यों नहीं हो जाती बंद
सदा के लिए
ताकि ना पड़े इन्हें किसी
असम्भव को रोकना ।
०
॥तीन॥
स्याह धब्बे ...
आँखों के नीचे
दो काले स्याह धब्बे ...
आकर ठहर गए
और नाम ही नहीं लेते जाने का...
न जाने क्यों उनको
पसंद आया ये अकेलापन।
0
॥चार॥
दस हाइकु
1-भटका मन
गुलमोहर वन
बन हिरन।
2-नन्ही चिरैया
गुलमोहर पर
फुदकी फिरे।
3-जुगनुओं से
गुलमोहर वृक्ष
हैं झिलमिल।
4-था पल्लवित
मन मेरा -देखा जो
गुलमोहर।
5-मखमली सा
शृंगार किये,खिले
गुलाबी फूल।
6-झूम गाते हैं
खेत खलिहान भी
आया बंसत।
7-नटखट -सी
चंचला,लुभावनी
ऋतु बसन्त ।
8-दुल्हन बनी
पृथ्वी रानी,पहने
फूलों के हार।
9-खेत है वधू
सरसों हैं गहने
स्वर्ण के जैसे ।
10-रंग बिरंगी
तितलियों का दल
झूमता फिरे ।
00
डॉ० भावना कुँअर
शिक्षा - हिन्दी व संस्कृत में स्नातकोत्तर उपाधि, बी० एड०, पी-एच०डी० (हिन्दी)
शोध-विषय - ' साठोत्तरी हिन्दी गज़लों में विद्रोह के स्वर व उसके विविध आयाम'।
विशेष - टेक्सटाइल डिजाइनिंग, फैशन डिजाइनिंग एवं अन्य विषयों में डिप्लोमा।
प्रकाशित पुस्तकें - 1. तारों की चूनर ( हाइकु संग्रह)
2. साठोत्तरी हिन्दी गज़ल में विद्रोह के स्वर
प्रकाशन - स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानी, गीत, हाइकु, बालगीत, लेख, समीक्षा, आदि का अनवरत प्रकाशन। अनेक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय अंतर्जाल पत्रिकाओं में रचनाओं एवं लेखों का नियमित प्रकाशन, अपने ब्लॉग http://dilkedarmiyan.blogspot.com पर अपनी नवीन-रचनाओं का नियमित प्रकाशन तथा http://drbhawna.blogspot.com/ पर कला का प्रकाशन अन्य योगदान
स्वनिर्मित जालघर - http://drkunwarbechain.blogspot.com/
http://leelavatibansal.blogspot.com/
सिडनी से प्रकाशित "हिन्दी गौरव" पत्रिका की सम्पादन समिति में
संप्रति - सिडनी यूनिवर्सिटी में अध्यापन
अभिरुचि- साहित्य लेखन, अध्ययन,चित्रकला एवं देश-विदेश की यात्रा करना।
सम्पर्क - bhawnak2002@yahoo.co.in
प्रस्तुतकर्ता सुभाष नीरव पर ५:४७ अपराह्न
लेबल: कविताएं
12 टिप्पणियाँ:
सहज साहित्य ने कहा…
'दीये की व्यथा' में कथ्य का नयापन और नए ढग से उसकी प्रस्तुतिमें डॉ भावना जी का गहन चिन्तन-मनन प्रतिबिम्बित होता है।'आँखे जाने क्यों' और 'स्याह धब्बे' अन्तस की व्यथा का सूक्ष्म चित्रण है । भाषा पर गहरी पकड़ पाठक को छोटी सी कविता में भी भाव की गहन अनुभूति करा देती है। हाइकु तो भावना जी का प्रिय छन्द है । 17 वर्ण के इस लघु छन्द में उनकी भाषा -साधना के दर्शन होते हैं। गुलमोहर और वसन्त ॠतु पर का मनोरम चित्रण उन्हें श्रेष्ठ हाइकुकारों की श्रेणी में रखता है । बिम्ब विधान का सफल निर्वाह उनके हाइकुओं को और प्रभावशाली बनाता है । कम से कम उन कलमकारों से उनके हाइकु कहीं बेहतर हैं , जो पिछले दो दशकों से ख़लीफ़ा होने का दम भरते रहे हैं ।
३ नवम्बर २०१० ७:०१ अपराह्न
भगीरथ ने कहा…
सभी हायकू सुंदर
३ नवम्बर २०१० ७:४४ अपराह्न
PRAN SHARMA ने कहा…
BHAVNA KEE KAVITAAON MEIN MUJHE
" FRESHNESS " MAHSOOS HUEE HAI.
SUBHASH JEE , AESE RACHNAKAR KEE
SASHAKT KAVITAAYEN PADHWAKAR AAPNE
MUJH JAESE KAVITA PREMI PATHAK
PAR UPKAAR KIYA HAI .KRIPYA MEREE
BADHAEE AUR SHUBH KAMNA BHAVNA JEE
KO PAHUNCHAAEEYEGA .
३ नवम्बर २०१० ८:४० अपराह्न
बलराम अग्रवाल ने कहा…
भावना की सभी कविताएँ विशिष्ट हैं, लेकिन उनकी प्रथम कविता 'दीये की व्यथा' उस समूचे समाज की व्यथा है जों नवीन तकनीक, पूँजी और बाज़ार के बढ़ते दबावों के चलते पीछे धकेल दिया जा रहा है। 'सभी को साथ लेकर' चलने का चलन आज का आदमी भूल-सा गया है। बेहतरीन सामयिक भावाभिव्यक्ति।
४ नवम्बर २०१० ७:५२ अपराह्न
rachana ने कहा…
bhavna ji ki kavitayen jahan bhi milti hai me jaroor padhti hoon .
bahut gahre bhav liye huye kabhi muskati hai kabhi rulati hai inki kavitayen
bahut bahut badhai
saader
rachana
४ नवम्बर २०१० ९:०२ अपराह्न
KAHI UNKAHI ने कहा…
भावना जी के हाइकू को सुन्दर हैं ही , उनकी कविता ‘ स्याह धब्बे ’...बहुत अच्छी...।
आँखों के नीचे के काले धब्बे सभी के होते हैं , पर उनका यूँ भावपूर्ण अभिव्यक्तिकरण करने के लिए वे बधाई की पात्र हैं...।
प्रियंका गुप्ता
५ नवम्बर २०१० ८:५६ पूर्वाह्न
रूपसिंह चन्देल ने कहा…
डॉ. भावना कुंअर की ’दीये की व्यथा’ ने सच ही व्यथित कर दिया. दीपावली के दिन इस सच को कितनी ही बार महसूस किया, भावना जी ने शब्द दिए---आभार.
चन्देल
६ नवम्बर २०१० ८:५१ पूर्वाह्न
ashok andrey ने कहा…
bhavna jee ki inn sundar rachnaon ke liye badhai deta hoon
६ नवम्बर २०१० ११:४२ पूर्वाह्न
उमेश महादोषी ने कहा…
सभी रचनाएँ भावपूर्ण हैं। प्रभावित करती हैं।
....... उमेश महादोषी
७ नवम्बर २०१० ४:२६ अपराह्न
सुरेश यादव ने कहा…
भावना जी की कवितायें पढ़ने का अवसर गवाक्ष ने दिया ,नीरव जी को हार्दिक धन्यवाद |संवेदना में ताज़गी भरती सभी कविताओं के लिए भावना जी को हार्दिक बधाई |हाइकु भी सुन्दर और कसे हुए हैं |
९ नवम्बर २०१० ८:५६ अपराह्न
डॉ. हरदीप संधु ने कहा…
भावना जी की ’दीये की व्यथा' बहुत अच्छी लगी ।
सभी हाइकु एक से बढ़कर एक हैं ।
अक्षर-अक्षर दिल को छू जाने वाला है।
भावना जी को हार्दिक बधाई हो!
१२ नवम्बर २०१० ३:५५ अपराह्न
अनुपमा पाठक ने कहा…
सुन्दर रचनायें!
22 अप्रैल 2011
आसमान को छू लें
13 अप्रैल 2011
मन के आँगन, वो महक चन्दन-सी...
आप सोचेंगे कि किताब देख कर इतना खुश होने जैसी क्या बात थी ? पर बात तो थी न...जैसे किसी बच्चे को उसका मनपसन्द खिलौना मिल जाए तो वो कैसे रिएक्ट करेगा, उसकी कल्पना कीजिए...। हाइकु -संग्रह देख कर मुझे ऐसा ही लगा । वह सिर्फ़ एक पुस्तक ही नहीं, बल्कि एक पूरा दस्तावेज़ ही है । अठारह सशक्त क़लमों से निकली सुन्दर सशक्त रचनाएँ...।
हाइकु एक ऐसी विधा है, जिसमें मेरे विचार से- ‘जितने गहरे जाओ, उतने मोती पाओ’ वाली बात लागू होती है । पाँच-सात-पाँच वर्णों के क्रम में सजी तीन पंक्तियों वाली नन्ही-सी कविता । पर जितना छोटा आकार, उतनी गहरी बात...। ‘देखन में छोटी लगे, घाव कर गंभीर’...। बस आपमें उसे महसूसने की, उसकी रसानुभूति करने की कितनी क्षमता है, हाइकु का आनन्द उठाना बस इसी बात पर निर्भर है ।
पुस्तक जिस समय मुझे मिली, वह वक़्त था मेरे बाकी कार्यों का...। शाम की चाय, नाश्ता...फिर खाने की तैयारी...बेटे की पढ़ाई...वगैरह, वगैरह...। सो मन मसोसकर सरसरी निग़ाह से पुस्तक देखी और रख दी...। तुरन्त पढ़नी इसलिए नहीं शुरू की ;क्योंकि मैं उसे पढ़ना नहीं, उसमें डूबना चाहती थी ।
और डूबने का वक़्त मिला मुझे रात को...। सब कर्त्तव्यों से खाली होक, पूरी फ़ुर्सत के साथ जब हाइकुओं की उस नदी में डूबने उतरी तो बस्स...। न जाने उन लहरों के साथ कितनी दूर तक तैर आई, पता ही नहीं चला...। बहुत सारे मोती भी चुन लिए मैने...अपने मन की माला में पिरोने के लिए...। सबकी तो नहीं, पर कुछ की बानगी आपके सामने भी प्रस्तुत करना चाहूँगी...।
डा.भावना कुँवर के हाइकु-
देवी नागरानी जी का हाइकु- ये मौन क्या/ कभी चुप बैठा है / कुछ कहे बिन ?- का मौन सच में बहुत कुछ बयान कर देता है ।
एक और सशक्त हाइकुकार हरदीप कौर सन्धु -
हाइकुओं में प्रकृति का भी बड़ा सटीक चित्रण कर दिया जाता है । जैसे कमला निर्खुपा जी का हाइकु-
इस संग्रह की एक वरिष्ठ हाइकुकार डा. सुधा गुप्ता जी के विभिन्न हाइकु साल के हिन्दी महीनों पर लिखे गए हैं । मेरी नज़र के सामने से ऐसे क्रमबद्ध (बारहमासा) हाइकु शायद ही गुज़रे हों । कुछ बानगियाँ पेश हैं-
जहाँ एक ओर डा. सतीशराज पुष्करणा जी ने समाजिक विसंगतियों पर व्यंग्य कसते हुए कहा है -
और अब अन्त में...अंग्रेजी में कहूँ तो - लास्ट, बट नॉट द लीस्ट - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी के हाइकु...
तो अब कितना लिखूँ...। मेरा मन तो इनसे भर ही नहीं रहा । तो अब बस हाइकुओं के बारे में इतना ही कहूँगी -
ज़िन्दगी अहसास का है नाम, धड़कन का नहीं
आदमी ज़िन्दा नहीं अहसास मर जाने के बाद । -(रेहाना क़मर)
4 अप्रैल 2011
माँ की डायरी
आओ मेरी नन्हीं गुडिया मेरे पास आकर बैठो...
बड़की तुम भी आ जाओ माना कि तुम बड़ी हो गई हो ...
सब सुख-दुख अच्छा-बुरा समझती हो ...
पर अभी भी ज़रूरत है तुम्हें कुछ बातों को समझने की ...
लगता नहीं अब मैं देख पाऊँगी अगला सावन...
बड़की तुम्हें छुटकी को , दिखाना होगा सही रास्ता ...
मत भटकने देना इसे बिन माँ की बच्ची की तरह...
सुबह उठना होगा तुम्हें,
तैयार करना होगा नन्हीं का
अब ! टिफिन क्या बनाना है
सब लिख दिया है मैंने एक डायरी में ...
क्या पहनाना है ?
कब स्कूल छोड़ना है ?
कब लाना है ?
होमवर्क कैसे कराना है ?
कब सुलाना है ?
क्या पंसद है ?
क्या नापंसद है ?
कब उदास होती है ?
क्यूँ उदास होती है ?
सब लिखा है मेरी डायरी में ...
तुम्हारे लिए भी कुछ लाइनें हैं
अगर जरूरत समझो तो पढ़ लेना ...
वैसे तो तुम समझदार हो गई हो ...
पर जरा बेख्याली में मत चुन लेना काँटे...
अपने दामन में संभाल कर रखना मेरी डायरी ...
जो पग-पग पर देगी तुम्हें सहारा
और मेरे जिंदा होने का एहसास ...
और छुटकी तुम घबराना मत
ना ही रोना मैं हमेशा ही तुम्हें देखूँगी ...
उस चमकीले तारे के माध्यम से ...
बस अब मेरे पास ही बैठो न जाओ दूर मुझसे ....
क्योंकि मुझे जाना है फिर अनन्त यात्रा पर ।
Bhawna
20 मार्च 2011
8 मार्च 2011
पहरे...

मेरी आँखों पर
इतने पहरे ...
पहले तो न थे ...
देख सकती थी मैं भी...
खूबसूरत ख्वाब ...
पर अचानक क्या हुआ?
जो निकाल ली गई
इनकी रोशनी ...
और अब तो ये
रो भी नहीं सकती ...
भावना
11 नवंबर 2010
रात का सन्नाटा...
4 नवंबर 2010
दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ

"दीपावली पर एक दीए की दर्द भरी कराह को महसूस करना चाहते हैं या उसका कुछ दुख बाँटना चाहते हैं तो इस लिंक को एक बार जरूर देखियेगा।"
http://gavaksh.blogspot.com/2010/11/2010.html
Bhawna
26 अक्टूबर 2010
14 अक्टूबर 2010
मेरा दर्द कुछ इस तरह भी...
7 अक्टूबर 2010
नहीं रही अब हिन्दी दूर ऑस्ट्रेलिया से...
जिसके मुख्य संपादक अनुज कुलश्रेष्ठ जी ने संपादन समिति में मुझे और रामेश्वर काम्बोज जी को भी सम्मिलित किया है। इस पत्रिका के प्रथम संस्करण में मेरी दो रचनाएं और गॉधी जी पर लेख प्रकाशित हुए हैं।
साथ ही सिडनी में एक कवि सम्मेलन का आयोजन भी ११ सितम्बर २०१० को किया गया जिसमें मुझे भी कविता पाठ करने का अवसर प्राप्त हुआ।
प्रस्तुत हैं "हिन्दी गौरव" पत्रिका में प्रकाशित उस कवि सम्मेलन पर समाचार और मेरी रचनाएं-


29 सितंबर 2010
क्या आप बता सकते हैं कि ये क्या है?
6 सितंबर 2010
अपनी जन्मस्थली को बहुत मिस कर रही हूँ ...
पर मैं अपने सभी शिक्षकों को तहे दिल से याद करते हुए शत-शत नमन करती हूँ, जिनके कारण आज़ मैं इस मुकाम तक पहुँची हूँ, आज मैं भी एक शिक्षक हूँ मुझे भी मेरे छात्र बहुत प्यारे हैं, हाल ही में मेरी एक छात्रा Great Barrier reef की यात्रा पर गई थी, १५ दिन पानी के जहाज का आंनद उठाते हुए उसने जो भी महसूस किया सब मुझे बताया और तोहफे के रूप में आज मुझे उसके खुद के खींचे फोटो मुझे भेंट स्वरूप दिए, जिसे मैं आप सबके साथ बाँटना चाहूँगी, वैसे हजारों फोटो आपको गूगल पर मिल जायेंगे पर उनमें मेरी छात्रा का मेरी प्रति स्नेह, सम्मान तो नहीं छलकेगा, जो मेरे लिए अमूल्य निधि है। मैं अपनी भावनाएँ आप तक पहुँचा पाई या नहीं ये तो मालूम नहीं, किन्तु मुझे आप सब अपने बहुत करीब लगे , आज के दिन में अपनी जन्मस्थली को बहुत मिस कर रही हूँ क्योंकि मेरे सारे शिक्षक भी तो वहीं हैं। 



भावना
24 अगस्त 2010
दिल में छाई उदासी..
बहुत-बहुत आभार
इस पर्व की बहुत सारी शुभकामनाएँ
नेह की गली
मन में खिली अब
आस की कली । R
आस की कली
ना मुरझाये कभी
ना, सूनी गली। B
नेह तुम्हारा
तोड़ बँधन सब
खींच ही लाया । B
न टूटे कभी
आशाओं की कलियाँ
आरज़ू यही । B
तुमको देखा
मिट गई मन से
चिन्ता की रेखा । R
परदेस में
जब याद तू आई
बड़ा रुलाई । B
चिन्ता ने तुम्हें
बना दिया बीमार
मेरे कारण। B
जाँऊगा नहीं
छोड़कर आँचल
माँ तेरा कभी। B
Bhawna
11 अगस्त 2010
हो गए पूरे ४ साल...आइये केक कर रहा है इंतज़ार...
केक आप सबके लिए...
अपना ही केक है, अपने घर में, चिन्ता मत कीजिए नुकसान नहीं देगा...
९ अगस्त २००६ का वो दिन था जब मैंने अपनी पहली पोस्ट डाली थी यानि की मैंने ब्लॉग लिखना शुरू किया था, अब ९ अगस्त को पूरे ४ साल हो गए,पता नहीं कितनी सफलता मिली, पर हॉ एक बड़ा परिवार मिला, मित्र मिले, उनका अथाह स्नेह मिला बस जिंदगी में सबकुछ मिल गया.
आज़ ११ तारीख हो गई लिखना तो ९ को ही चाहती थी, पर व्यस्तता ने हाथों में हथकडियाँ जो डाल दी थी। आप सबके बिना सेलिब्रेशन भी कैसा? अब तो देश भी बदल गया अब युगांडा ने आस्ट्रेलिया की जगह जो ले ली और यहाँ आये भी १ साल कैसे बीत गया पता नहीं चला। आप लोगों का स्नेह यूँ ही बना रहा तो कुछ न कुछ नया तो लेखन में आता ही रहेगा। अभी तो दो ही पुस्तक निकली हैं आगे जल्दी ही २ पुस्तक प्रकाशित करने का प्लान है देखिए कब तक सफलता मिलती है।
मैं और मेरी छोटी बेटी ऐश इंडियन रेस्टोरेंट में गए थे खाना खाने ....उसके बाहर का फोटो.... सूरज की किरणों ने हमारा कैसा श्रृंगार किया है देखिए..... है ना कमाल......
भावना
9 अगस्त 2010
दो मुँह वाला कछुआ...


अरे क्या देख रहे हो भाई मैंने मुंह साफ किया है ...

बहुत थक गया हूँ ...आराम करना चाहता हूँ ...चलिए इन महाशय का हाथ ही सही ...
बड़े प्यार से लिटाये हैं ...

चलना होगा ...दूसरे बच्चों से भी तो मिलना है ना...
बहुत तेज भूख लगी है ...आज पत्ते से ही काम चलता हूँ ...

अरे !ये तो बहुत स्वाद है ...

अरे रुको फोटो ले रहे हो
तो जरा पोज तो बनाने दो ...
Bhawna
3 अगस्त 2010
अनुभूति में...
http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/kamal/bhawna_kunwar.htm
१-
देखी चाँदनी
आँचल सँवारती
२-
खुश तालाब
कमलों की बारात
सच या ख्वाब।
३-
सुबके झील
दिलासा देता हुआ
४-
बार-२ नहाए
शैतान सा कमल
झील शर्माए।
५-
कमल पर
बिखरे पड़े हीरे
भावना
22 मार्च 2010
एक बीज ...
लीजिए जनाब अब पर्थ से वापसी हो गई है सिडनी में, अपने परिवार के बीच, अब यहाँ आकर फिर वही जिंदगी पहले की तरह ...
कभी-कभी दिल कुछ इस तरह भी सोचता ...आप लोग भी देखियेगा उदासी जरूर है... पर ऐसा होता भी है ना... आप लोगों की राय बहुत कीमती है ...
एक बीज
मैंने बोया
छोटे से
टीन के डब्बे में...
गमला खरीद सकूँ
हैसियत न थी...
अंकुर फूटा
मेरा चेहरा खिल उठा
मैं उसे प्यार से सींचती रही
अब वो पौधा बन चुका था ...
मगर ये क्या?
ये अचानक मुरझाने लगा
मेरा दिल काँप उठा
मैं देख नहीं सकती थी
उसे इस तरह मरते हुए ..
आनन-फानन में
खरीद डाला मैंने
एक बड़ा बगीचे वाला घर ...
क्या करती उन आभूषणों का
जो बहुत दिन से
बन्द पड़े थे अलमारी में ...
मैंने पौधे को
मुक्ति दिला दी
उस टीन के टूटे-फूटे डिब्बे से ...
रोप दिया उसे
बड़े बगीचे में
पौधा मुस्करा उठा
लहलहाने लगा, झूमने लगा ...
अनदेखा किया मैंने
डब्बे की दयनीय स्थिति को
लचीला पौधा अब
बलिष्ठ पेड़ बन चुका था
बड़ी-बड़ी शाखायें
मजबूत तना
बहुत सारी पत्तियां
जिसने पूरे घर को
अपनी शाखाओं से
जकड़ कर
धराशायी कर दिया
सीना ताने
अपने मद में चूर
अहं की चादर लपेटे
शान से खड़ा है...
मैं निरीह सी
सड़क पर चल पड़ी
भूखी प्यासी
तूफानी रात में
भटकती रही
आज भी भटक रही हूँ ...
खोजने उस डब्बे को
ताकि माफी माँग सकूँ उससे ...
जिसकी पीड़ा जानकर भी
किया था अनदेखा मैंने
जानती हूँ
ये उसी की आह थी
जो लगी थी मुझे ...
Bhawna








