3 मार्च 2017
29 फ़रवरी 2016
किस्मत
कुछ ऐसे हालात बने कि मेरा ब्लॉग मुझे पुकारता रहा और मैं उसकी पुकार सुनकर भी उस तक ना आ सकी किस्मत ने कुछ ऐसा पटका दिया कि अब तक नहीं सँभल पाई दुःख तो बहुत है पर जहाँ अपनी नहीं चलती वहाँ क्या किया जाए-
रूठ जाती है किस्मत कभी
तो कभी साथी छोड़ देता है साथ
खिलाए थे जो रंग-बिरंगे फूल संग-संग हमने
खो जाती है उनकी खुशबू कहीं
और हम मन को मजबूती से पकड़े
समेटने की नाकामयाब कोशिश
करते रह जाते हैं आखिरी साँस के साथ...
2016 में "हम लोग" पत्रिका में पेज न० 61पर मेरे कुछ माहिया प्रकाशित हुए हैं लिंक है-
file:///C:/Users/Bhawna/Downloads/humlog%202016%20final%20new.pdf
Bhawna
रूठ जाती है किस्मत कभी
तो कभी साथी छोड़ देता है साथ
खिलाए थे जो रंग-बिरंगे फूल संग-संग हमने
खो जाती है उनकी खुशबू कहीं
और हम मन को मजबूती से पकड़े
समेटने की नाकामयाब कोशिश
करते रह जाते हैं आखिरी साँस के साथ...
2016 में "हम लोग" पत्रिका में पेज न० 61पर मेरे कुछ माहिया प्रकाशित हुए हैं लिंक है-
Bhawna
10 नवंबर 2015
3 नवंबर 2015
29 अगस्त 2015
राखियाँ घर नहीं आईं"
"राखियाँ घर नहीं आईं"
सदा की तरह राखियों
से
बाज़ार सजा होता,
कलाई सजे भाई की
ख़्वाब बहन का होता।
छोटे थे हम
प्यारा हमारा भाई
जाने फिर भी क्यूँ
सूनी रहती उसकी कलाई,
डबडबाई आँखों में
हजारों सवाल तैरते
जवाब भी मिलता
पर समझ नहीं आता।
दिखती बहना रोती
कहीं
भाई बिना सूनी भई।
कहीं भाई उदास होता
बहना उसके है नहीं।
पर हम तो हैं, दो छोटी बहनें,
बड़ा है, प्यारा सा एक भाई,
जाने क्यूँ फिर घर
हमारे
राखियाँ ही नहीं आईं?
आँसुओं से,लबालब आँखे
एकदूसरे को निहारती,
दुःख से हम बिलख ही
पड़ते,
फिर तीनों गले लगते
रोते-रोते सो जाते
दर्द
भरे सपनों में खो जाते।
आज बड़े हो गए
समझ भी अब सयानी हो गई
"आन
पड़ी है"
कहानी
ये पुरानी हो गई।
भाई
की लम्बी उम्र की कामना
आज
भी हर साँस करती है।
पर
आज भी तिरती है आँखों में,
राखियों
से सजी थाली।
पर
बात अब भी वही
पुरानी
रूढ़ी, परम्परा
वाली।
अब तो परदेस में बसी हूँ,
पर
पुराने रिवाज़ों में अब भी फँसी हूँ।
भाई
की सूनी कलाई,
आज
भी सीने में खटकती है।
आज
भी आँखों में, वो नमी
बेरोक-टोक
विचरती है,
और
सदा की भाँति "राखी"
आज
भी तो बस हमारे
दिल
ही में सँवरती है।
डॉ०
भावना कुँअर
24 जून 2015
11 मई 2015
"मीठी यादों के कुएँ"
साथ रखना
मीठी यादों के कुएँ
छोड़े अपने
जहर बुझे बाण
खाली न हो उनकी
जब कमान
एक लोटा याद ले
तू छिड़कना।
अँधेरी रात जब
गम से घिरे
अपनापन जब
कम सा लगे
यादों के जुगनू
को
हथेली में ले
मन अटरिया पे
हौले रखते
जरा न झिझकना।
सुहानी भोर
जब चुभने लगे
ओस मोती भी
जब हरने लगें
एक प्याली में
चाय संग घुली वो
मीठी सी याद,
हरी घास पे पड़े
झूले का साथ,
धीरे से निकाल तू
एक नई सी
दुनिया बुन लेना।
मीठे सपने
घुटन सीने में ज्यूँ
भरने लगें,
पलकों से दर्द ज्यूँ
झरने लगे,
मधुर मिलन की
बीती रात की
सुनहरी सी याद
हौले निकाल
तू पलकों के पास
मोती समझ
बिना किसी
हिचक
चुपके भर लेना।
Bhawna
15 मार्च 2015
30 दिसंबर 2014
13 सितंबर 2014
11 जुलाई 2014
15 मार्च 2014
कुछ पुरानी यादें ....
होली खेले तो बरसों हो गये पर कुछ पुरानी यादें हैं जो आज मन कर आया कि आप सबके साथ ताजा कर ली जायें,एक जमाना था जब रंग कुछ उन्माद सा भर देते थे, पर अब ना तो वैसा माहौल ही रहा ना वो खुशबू देने वाले साफ-सुथरे रंग, ऊपर से अपनी मिट्टी से दूरी भी होली ना खेलने का एक बड़ा कारण बनी, हाँ लेखन जरूर चलता रहा।
आप सभी को हमारे पूरे कुँअर परिवार की ओर से होली की हार्दिक बधाई,खेलिएगा जरूर अगर होली खेलना पसन्द है तो पर ध्यान भी रखियेगा कि ये त्यौहार स्नेह मिलन का त्यौहार है-
कपोलों पर
खिलते थे कभी यूँ
कई रंग हमारे
आज जीते हैं
एहसासों में छिपे
परछाईं से कहीं।




















Bhawna
आप सभी को हमारे पूरे कुँअर परिवार की ओर से होली की हार्दिक बधाई,खेलिएगा जरूर अगर होली खेलना पसन्द है तो पर ध्यान भी रखियेगा कि ये त्यौहार स्नेह मिलन का त्यौहार है-
कपोलों पर
खिलते थे कभी यूँ
कई रंग हमारे
आज जीते हैं
एहसासों में छिपे
परछाईं से कहीं।




















Bhawna
26 जनवरी 2014
फूलों जैसा मेरा देश,वतन से दूर
गणतंत्र दिवस की शुभकामनाओं के साथ अपनी दो पुरानी रचनायें आप लोगों के साथ शेयर करना चाहूँगी...
फूलों जैसा मेरा देश
फूलों जैसा मेरा देश मुरझाने लगा
शत्रुओं के पंजों में जकडा जाने लगा
रात-दिन मेरी आँखों में एक ही ख्वाब
कैसे हो मेरा 'प्यारा देश' आजाद
कैसे छुडाऊँ इन जंजीरों की पकड से इसको
कैसे लौटाऊँ वापस वही मुस्कान इसको
कैसे रोकूँ आँसुओं के सैलाब को इसके
कैसे खोलूँ आजादी के द्वार को इसके
कैसे करूँ कम आत्मा की तड़प रूह की बेचैनी को
चढ़ जाऊँ फाँसी मगर दिलाऊँगा आजादी इसको
ये जन्म कम है तो, अगले जन्म में आऊँगा
पर देश को मुक्ति जरूर दिलाऊँगा।
जो सोचा था कर दिखलाया
भले ही उसको फाँसीं चढ़वाया
शहीद भगत सिंह नाम कमाया
आज भी सब के दिल में समाया।
वतन से दूर
वतन से दूर हूँ लेकिन
अभी धड़कन वहीं बसती
वो जो तस्वीर है मन में
निगाहों से नहीं हटती।
बसी है अब भी साँसों में
वो सौंधी गंध धरती की
मैं जन्मूँ सिर्फ भारत में
दुआ रब से यही करती।
बड़े ही वीर थे वो जन
जिन्होंने झूल फाँसी पर
दिला दी हमको आजादी।
नमन शत-शत उन्हें करती।
फूलों जैसा मेरा देश मुरझाने लगा
शत्रुओं के पंजों में जकडा जाने लगा
रात-दिन मेरी आँखों में एक ही ख्वाब
कैसे हो मेरा 'प्यारा देश' आजाद
कैसे छुडाऊँ इन जंजीरों की पकड से इसको
कैसे लौटाऊँ वापस वही मुस्कान इसको
कैसे रोकूँ आँसुओं के सैलाब को इसके
कैसे खोलूँ आजादी के द्वार को इसके
कैसे करूँ कम आत्मा की तड़प रूह की बेचैनी को
चढ़ जाऊँ फाँसी मगर दिलाऊँगा आजादी इसको
ये जन्म कम है तो, अगले जन्म में आऊँगा
पर देश को मुक्ति जरूर दिलाऊँगा।
जो सोचा था कर दिखलाया
भले ही उसको फाँसीं चढ़वाया
शहीद भगत सिंह नाम कमाया
आज भी सब के दिल में समाया।
वतन से दूर
वतन से दूर हूँ लेकिन
अभी धड़कन वहीं बसती
वो जो तस्वीर है मन में
निगाहों से नहीं हटती।
बसी है अब भी साँसों में
वो सौंधी गंध धरती की
मैं जन्मूँ सिर्फ भारत में
दुआ रब से यही करती।
बड़े ही वीर थे वो जन
जिन्होंने झूल फाँसी पर
दिला दी हमको आजादी।
नमन शत-शत उन्हें करती।
Bhawna
13 जनवरी 2014
9 दिसंबर 2013
5 दिसंबर 2013
28 नवंबर 2013
आज फिर हो गई मैं अकेली...
आज फिर
हो गई मैं अकेली
कोयल भी नहीं आई
रोज सुबह जगाती थी मुझे
अपनी मधुर, कोमल आवाज से...
जाने कहाँ गई...
रात बहुत तेज तूफान आया था
कहीं...
नहीं-नहीं मैं ऐसा कैसे सोच सकती हूँ
देखा था कल मैंने
कैसे सँभाले थी अपने बच्चों को...
पर ये क्या
पेड़ की डाली कहाँ गई
जहाँ रहता था उसका
छोटा सा परिवार...
क्या वक्त इतना निर्दयी हो सकता है?
क्या हुआ होगा उसके बच्चों का?
क्या दोष था उसका?
घण्टों हम बातें करते...
वो अपनी सुरीली बोली से
मेरा मन का सारा दर्द समेट लेती
मेरे अकेलेपन को भर देती
और मैं भी घण्टों उसके बच्चों को निहारा करती
उनके क्रिया-कलाप आँखों में भरा करती...
पर क्या हुआ होगा?
क्या वो तूफान के डर से
कहीं दूर चली गई होगी...
या फिर...
नहीं-नहीं मैं ऐसा नहीं सोच सकती
क्या मैं दोषी हूँ?
या कि मेरी छाया ही बुरी है?
क्या मुझे खुशियाँ देने वाला
हर बार ही
कर दिया जाएगा
मुझसे दूर...
क्या छाया भी अच्छी-बुरी होती है?
अगर नहीं
तो क्यों कहा जाता है
उसके कदम पड़े
तो घर फला-फूला...
उसके पड़े तो सब डूब गया...
क्या सच्ची होती हैं ये मान्यताएँ?
अगर नहीं
तो क्यों नहीं तोड़ पाते हम
ऐसी मान्यताओं को...
जो सिवाय दुख-दर्द के
कुछ नहीं देतीं...
बस छोड़ जाती हैं ऐसे घाव
जो कभी नहीं भरते कभी भी नहीं...
Bhawna
17 नवंबर 2013
14 नवंबर 2013
8 नवंबर 2013
अभिनव इमरोज में मेरी १३
छोटी-छोटी बाल-रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं जिनको छोटे बच्चे बड़ी आसानी से याद कर
सकते हैं अभिनव-इमरोज का धन्यवाद करते हुए आप सब लोगों के साथ शेयर करना चाहूँगी। आप
भी सोचते होंगे कि कहाँ गायब रही इतने दिनों से तो बस यही कहूँगी कि-
घेरा है अँधेरों ने कुछ इस तरह से हमको
भूले हैं प्यार अपना भूले हैं हर डगर को।
Bhawna
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