28 अप्रैल 2008
तो क्या ! अब मुझे हमेशा के लिये अपनी मिट्टी से दूर रहना होगा
अगर ये नेट परीक्षा पहले से ही होती तो अच्छा था हम भी देते, हो सकता है अभी भी अच्छा हो, पर अब हम जैसों का क्या?
अब मैं यहाँ युगांडा में हूँ जॉब कर रही हूँ वैसे तो सैटल्ड हूँ अपने वतन से भी जुड़ी हूँ ब्लॉग के माध्यम से लेकिन कभी-कभी एक हूक सी उठती जब अपने वतन की याद आती है तो मन करता है कि सब कुछ छोड़कर चली जाऊँ अपने वतन की छाँव में, पर अब ये खबर पढ़कर तो लगता है वो छाँव मुझे अब कभी भी नसीब नहीं होगी, क्या मैं भारत जाकर पहले नेट का पेपर दूँ? फिर से पढ़ूँ? तो मतलब ये हुआ की मेरी इतने सालों की नौकरी, मेरी इतने सालों की पढ़ाई सब बेकार थी और मैं घर में बैठकर मक्खियाँ मारूँ, नहीं ये सब कैसे कर सकूँगी पढ़ना पढ़ाना मेरी जिंदगी की साँसे है, मेरी धड़कन है तो क्या मैं अपनी धड़कन के बिना जिंदा रह पाऊँगी ? अब मैं बहुत असमंजस में हूँ कि क्या कभी मैं अपना ख्वाब पूरा कर पाऊँगी...
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डॉ० भावना
मेरा आशय किसी को भी आहत करने का नहीं था, जो बात इस समाचार को पढ़कर मेरे दिल में आई वही मैंने आप दोस्तों से शेयर करना चाही ....
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26 अप्रैल 2008
आईये थोड़ा सा लुत्फ आप भी उठा लीजिये
बच्चों ने बहुत-बहुत सुन्दर पेंटिग बनायी हुई थी आप लोग तो देखने से वंचित रह गये आप हमें यहाँ बैठे-बैठे हमारे देश हमारे शहर की हमें सैर कराते हैं तो चलिये आज़ हम भी यहाँ नन्हें-मुन्नों की कलाकारी आपको दिखाते हैं ...
यह एक ऐसा समूह है जो रंग भेद बिल्कुल नहीं जानता अगर कुछ जानता है तो वो है प्यार, इनकी नन्हीं-२ मुस्कानों में मैंने खुद को एक बंधन में बंधा हुआ पाया "प्यार के बंधन में" जिसने मुझे प्रोग्राम की समाप्ति तक बांधे रखा ...
सर्वप्रथम कुछ चित्र देखिये जो बच्चों ने बनाये हैं-
मेरी बेटी ऐश्वर्या (उम्र ७ वर्ष) द्वारा बनाया चित्र : 
ऐश्रवर्या द्वारा बनाया "ऐलियन मास्क":
ऐश्रवर्या द्वारा बनाया आईस्क्रीम स्टिक का हैट जिस पर पोस्टर कलर से बनाई खोपड़ी और हड्डी :
एक बच्चे द्वारा बनाया गया स्पाइडर मैन जो थर्माफोल से बने टी० वी० के अन्दर दिखाया गया :
कोल्ड ड्रिंक की स्ट्रा से बना घर, पिस्ते के छिलके से बना पेड़ और क्ले से बने फूल क्या शोभा दे रहे हैं:
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इसके बाद नम्बर आया फैशन शो का इसमें काफी बच्चों ने भाग लिया इसकी खासियत ये थी कि फैशन शो में पहने जाने वाले सभी वस्त्र बड़े अनोखे थे देखिये-


ये मोबाईल के रीचार्ज़ कार्ड से बनी ड्रैस हैः

19 अप्रैल 2008
आप सबके सहयोग और स्नेह की आभारी

10 अप्रैल 2008
अरे कोई आत्मा आ गई तो !

यूँ बने हम भी हँसी के पात्र …
" अच्छा" हमारे पतिदेव ने बस इतना ही कहा…
तभी उनके मित्र ने अमेरिका अपने बेटे को फोन मिलाया और बोले-" बेटे कल से नवरात्र शुरू हो रहें हैं तो तुम प्याज़, लहसुन मत खाना और हो सके तो सारे व्रत रख लेना या फिर पहला और आखिरी रख लेना और पूजा कर लेना" ।
बेटे ने भी एक समझदार बेटे की तरह " जी पापाजी" कहकर उनका मान बढ़ाया।
प्रगीत के मित्र बोले कि -"मेरी पत्नी का इंडिया से फोन आया है कि कल से नवरात्र शुरू हैं इसीलिये मैं आपको बता रहा हूँ"।
प्रगीत बोले-"ठीक है मैं भी घर में फोन करके बता देता हूँ कि वो भी तैयारी कर लें मैं तो ज्यादा जानता नहीं क्योंकि मेरे परिवार में तो मम्मी कबीर पंथी होने के कारण ये सब नहीं करती किन्तु मेरी पत्नी देवी जी की पूजा भी करती हैं और नवरात्र भी रखती हैं मैं और बच्चे भी उनका अनुशरण करते हैं"।
अब जैसे ही प्रगीत का फोन आया मैं तो जुट गयी तैयारी करने में जल्दी से कॉलेज़ से लौटी फटाफट सुपर मार्केट पहुँची व्रत की सामग्री लेने, कहीं कुछ मिला तो कहीं कुछ, खैर अन्त भला तो सब भला, बड़ी भागदौड़ के बाद जो कुछ मिला घर लेकर आई और आने वाले कल की तैयारी करके रख दी। हाउस गर्ल को बोला-" कल जल्दी आना हमारे व्रत शुरू हो रहें हैं तुमको जल्दी आकर घर की साज- सफाई करना हैं ताकि हम जल्दी से पूजा करके अपने-अपने ऑफिस निकल जायें"।
हम लोग बच्चों सहित जल्दी-2 उठे बहुत श्रद्धा के साथ पूजा पाठ किया और थोड़े फल लेकर अपने-अपने काम पर निकल पड़े, कोई १२ बजे मेरे पास प्रगीत का फोन आया वो बोले कि-“ आज़ हमें डिनर पर उनके दोस्त ने बुलाया है तो मैंने उनको बोल दिया कि हमारा तो व्रत है तो हम खाना तो नहीं खायेंगे हाँ मगर मिलने जरूर आ जायेंगे क्योंकि मिले हुये भी काफी समय हो गया है"।
मैंने कहा-“ ठीक कहा आपने” और शाम को ७ बज़े का प्रोग्राम तय हो गया। हम अक्सर वीक एंड पर दोस्तों के यहाँ बारी-बारी से डिनर का प्रोग्राम रखते हैं इससे मिलना जुलना भी हो जाता है और यहाँ परदेस में अपनों से हुई दूरी से दुखी मन को, अपने बीते हुये दिनों को, अपने बचपन को, एकदूसरे से कह सुनकर मन को हल्का करने की कोशिश करते हैं। कभी-कभी बच्चों के पेपर हों तो ये सब स्थगित करना पड़ता है। इसी कारण इस बार एक-दूसरे से मिले एक महीना बीत गया।
अभी दोपहर के २ बज़े थे कि मेरी मित्र का फोन आया वो मुझसे बोली कि - "नवरात्र तो सोमवार से हैं हमने अभी इंडिया फोन किया है क्योंकि जब से तुमसे बात हुई है हमारा तो मूड़ बहुत खराब हो गया था कि हमारे नवरात्र छूट गये पर उन लोगों ने बताया है कि वो तो सोमवार से हैं"।
अब अब चौंकने की बारी मेरी थी , मेरा तो दिमाग खराब हो गया, ऐसा पहली बार हुआ कि हमने ना तो न्यूज़ ही देखी ना ही इंड़िया फोन किया, मन पर विचारों की आँधियों ने हल्ला बोल दिया –“पर पापाजी तो हमेशा ही हमें सूचित करते हैं इस बार उन्होंने भी नहीं बताया” अपने आप से बड़बड़ाती रही, खैर हमने तुरन्त पापाजी को फोन मिलाया और अपना पूरा हाल कह सुनाया अब तो बारी पापाजी के बोलने की थी और हमारी सुनने की, वो बोलते रहे और हम मुँह लटकाये सुनते रहे, जब हम से नहीं रहा गया तो हमने कहा कोई बात नहीं अब रख लिया तो रख लिया अब क्या तोड़ना फिर एक बड़ी सी डाट खायी वो बोले- "तो क्या तुम अमावस्या की पूज़ा करके कोई सिद्धी पाना चाहते हो? चुपचाप जाओ और जाकर सब खाना खाओ"।
हमने सहमे हुये-" जी पापाजी" कहकर फोन रख दिया। अब घर आये मुँह लटकाये अब तो शरीर में जान भी ना बची खाना बनाने की ना ही खाने की पापाजी की डाट जो खायी थी खैर अब- जल्दी-जल्दी ढ़ोकला बनाया बच्चों को जैसे तैसे समझाया खुद भी खाया और पड़ोस में भी भिजाया। फिर प्रगीत को फोन मिलाया उन्हें भी खाने को उकसाया और पापजी की डाट का किस्सा सुनाया। फिर मैंने अपनी मित्र को फोन मिलाया उनको बताया कि तुम सही थी पर बिल्कुल सही नहीं थी -"क्योंकि नवरात्र सोमवार को नहीं रविवार को हैं "।वो बोलीं हो सकता है पर हमें तो सोमवार ही बताया है खैर जब भी हों आज़ नहीं हैं ना तो बस आप लोग आ जाईये हम इन्तज़ार कर रहें है…
अब खबर है तो फैलेगी ही ना हम वहाँ पहुँचे वहाँ हमारे काफी मित्र थे जो भी मिले वही पूछे क्यों साहब आज़ आपने व्रत रखा अमावस्या को? कौन सी सिद्धी प्राप्त की ? कोई कहता अरे आज़ आप लोगों से दूर ही रहना होगा कहीं आप किसी आत्मा को ना बुला लें या वो आपके पूज़ा करने से खुदबखुद ही ना आ जाये क्योंकि इस दिन तो तांत्रिक पूज़ा किया करते हैं। ये सब बातें चल ही रही थी कि पापाजी का फोन आ गया वो बोले -"बेटा नवरात्र सोमवार से ही हैं"।
अब हम उस महफिल में जाकर लटके मुँह से सबको कहते हैं कि- " पापाजी का फोन आया है वो बोले कि-“ नवरात्र सोमवार से हैं " बस वो सब हमारी शक्ल देखें और हँसे और हम ? हमारी हालत तो आप सोच ही सकते हैं कैसी हुई होगी तभी तो अपना दुख, अपना लटका चेहरा आप दोस्तों में शेयर करने आ गये प्लीज़ आप लोग मत हँसियेगा…
(यह लेख किसी भी व्यक्ति या धर्म पर कटाक्ष नहीं है अगर किसी भी व्यक्ति को किसी भी बात का बुरा लगे तो मैं पहले से ही माफी माँगती हूँ …)
झूठ नहीं बोलूँगी क्योंकि अब व्रत चल रहें हैं हम अपने बच्चों को और खुद को भी अपनी सभ्यता और संस्कृति से जुड़ा रखने का भरसक प्रयास करते हैं…
30 मार्च 2008
आइये बधाई देने का अवसर आया...

28 मार्च 2008
दिल को झकझोर देने वाले कुछ लम्हें....
दोनों के एक-एक पुत्र थे और वह भी पढ़ लिखकर पिता की तरह ही देश की सेवा के लिये सेना में भर्ती हुए थे अब A और B का भी रिटायरमेंट हो चुका था और सेना की अनुशासनता और दबंगता दोनों में अब भी उतनी ही थी जितनी सेना की नौकरी के समय हुआ करती थी । दोनों साथ-साथ ही अपने-२ संप्रदाय के तीज - त्यौहार भी साथ-२ मनाते थे। वह अकसर देश और समाज में फैली सम्प्रदायकता से जुड़ी बुराईयों पर विचार करते और दुखी होते थे। यही कारण था कि दोनों ने यह निर्णय लिया था कि' अपना समय समाज में फैली बुराईयों को दूर करने में ही लगायेंगे।
दोनों कभी अपना पुराना समय याद करने के लिये अपने दुपहिये वाहन को लेकर पुराने शहर की उन्हीं तंग गलियों में निकल पड़ते और पुराने हलवाई,पान वालों आदि की दुकान पर उनका लुत्फलेतेअपानीपेंशन का एक हिस्सा दोनों ही समाज के ऊपर खर्च करने में लगाते और समय-समय पर प्रौढ़ शिक्षा, चिकित्सा कैंप आदि का आयोजन करते रहते। यही कारण था कि दोनों ही आम लोगों में बहुत ही लोकप्रय हो चुके थे।
अब तो शहर में होने वाले किसी भी सरकारी आयोजनों में उनको आंमत्रित किया जाना जैसे अनिवार्य सा हो चुका था। चाहे जिलाधिकारी हों या पुलिस अधीक्षक आदि सब उनका अभिवादन करते थे। मगर ना जाने सांप्रदायिकता की आग ने क्यों पुराने शहर को अपने शिकंजे में बुरी तरह जकड़ रखा था। कोई तीज-त्यौहार आया नहीं कि सांप्रदायिक दंगे भड़क उठते थे पूरे शहर में और परिणाम कर्फ्यू। दोनों ही यह सब देखकर बहुत हताश हो जाते थे और भरपूर प्रयास करते थे लोगों में जागरूकता लाने की, पुलिस अधीक्सक भी अकसर उनसे राय मशवरा लेते थे इन हालातों पर ।
इस वर्ष फिर गुप्त सूत्रों द्वारा पुलिस को सूचना मिल रही थी कि कुछ बाहरी ताकतों की राय में फिर दंगाईयों ने दंगा करने की योजना बनायी है।पूरे शहर में रैड अलर्ट थी और आने आते जाते वाहनों की गहन जाँच पड़ताल चल रही थी । कुछ मौहल्लों से छुटपुट वारदातों की भी सूचना पुलिस महकमें में आये दिन आने लगी थी। मौके की गंभीरता को देखते हुए पुलिस अधीक्षक ने शहर के सभी प्रमुख व्यक्तियों के साथ एक सभा का आयोजन किया जिससे इस बात पर विचार किया जाना था कि कैसे इन हालातो को सुधारा जाये और पहले की तरह सामान्य बनाया जाये। Aऔर B भी '''इस आयोजन में आमंत्रित थे और हमेशा की ही तरह दोनों बिना अनुपस्थित B भी इस आयोजन में अपनी दुपहिया को लिये तैयार थे पुलिस अधीक्षक के आफिस तक जाने के लिये। हालांकि आज A कुछ अस्वस्थ थे और मगर B के लाख मना करने पर भी A उस सभा को छोड़ने के लिये तैयार न थे।आखिर B को भी उनके सामने झुकना पड़ा और साथ-साथ सभा में ले जाना पड़ा। सभा बहुत ही सफल रही और A और B के सुझावों की सभी गणमान्य व्यक्तियों ने बहुत ही सराहना भी की। सभा समाप्ति के बाद दोनों साथ ही आफिस से बाहर आये और दुपहिये पर बैठ गये।
A की तबियत में अ'भी भी ज्यादा सुधार नहीं था। मगर सेना की दबंगता A को झुकने के लिये तैयार नहीं थी। B ने सुझाव दिया कि अच्छा होगा कि लम्बे रास्ते की जगह पुराने शहर की पुलिया से चला जाये ताकि पूरा शहर भी पार न करना पड़े और घर भी शीघ्र पहुँच जायें। दोनों की सहमति होने पर A ने दुपहिये को ड्राइव करना शुरू किया और B हमेशा की तरह A के पीछे की सीट पर बैठ गये। दोनों ही सभा में हुई चर्चाओं के बारे में बात करते हुये पुराने शहर की पुलिया तक पहुँच गये। पुलिया पर चढ़ाई के समय A के दुपहिये ने भी अपनी हालत नासाज होने का सिग्नल दिया और दो व्यक्तियों को साथ ले जाने से साफ इंकार कर दिया। B ने A को कहा कि क्योंकि A की तबियत ठीक नहीं है इस लिये अच्छा है कि A अपने दुपहिये से अकेले ही पुलिया को पार कर ले और B पैदल ही चलकर पुलिया पार कर ले।
पहले तो A ने साफ इंकार किया और कहा कि दोनों पैदल ही दुपहिया को हाथ में लेकर पुलिया पार कर लेंगे। मगर B ने A को विवश कर ही दिया कि A अस्वस्थ होने के कारण A को अकेले पुलिया ही दुपहिया पर बैठकर पार करनी चाहिये और B पैदल पीछे-२ आ जायेंगे और फिर A चल पड़े अपने रास्ते और B पीछे-२।मगर होनी को कुछ और ही मंजूर था। दंगाई जो कि A के संप्रदाय के थे शहर में हल्ला करते हुए उसी पुलिया से गुजर रहे थे और जब उन्होंने रास्ते में B को अकेला पाया तो उन कठोर ह्रदय लोगों ने B के अस्तित्व को इस तरह तहस-नहस किया कि B की आह तक भी A तक नहीं पहुँच सकी। जब A ने धीरे-धीरे पुलिया पार की ओर पुलिया के दूसरी ओर B का इंतजार करने लगा मगर उसका इंतजार इतना लम्बा हो गया जायेगा उसको ये अंदेशा भी न था। जब B ने पुलिया के उस पार उस ओर से दंगाईयों को अक्रामक तरीके से आते हुये देखा तो उसके चेहरे पर चिन्ता की लहर दौड़ गयी और वह सब कुछ भूलकर पुलिया के दूसरी ओर दौड़े मगर जल्द ही उनको खून के धब्बे B का चश्मा और B के स्लीपर तितर-बितर नजर आये और अंत में वही भयानक दृश्य A की आँखों के सामने आ ही गया जिसका डर A के मन में अनचाहे ही आ चुका था। A की तो जैसे दुनिया ही उजड़ चुकी थी।आज उसके सामने उसका बचपन का साथी अन्तिम यात्रा पर निकल चुका था और A निशब्द उसको एकटक देखता ही रह गये क्योंकि उन्हें इस यात्रा में भी तो B का साथ जो देना था।
20 मार्च 2008
परदेश में, जब होली मनाई, तू याद आई ......
खोला था जब द्वार
मिला त्यौहार ।
आया फागुन
बिखरी कैसी छटा
मनभावन।
खेले हैं फाग
वृन्दावन में कान्हा
राधा तू आना।
तन व मन
भीगे इस तरह
रंगों के संग।
स्नेह का रंग
बरसे कुछ ऐसे
छूटे ना अंग।
रंगी है गोरी
प्रीत भरे रंगों से
लजाई हुई।
आई है होली
रंगी सब दिशाएं
दिल उदास ।
पिचकारी से
रंगों की बरसात
लाया फागुन ।
परदेश में
जब होली मनाई
तू याद आई ।
अगले साल
मिलेगें अब हम
फिर होली में ।
16 फ़रवरी 2008
डॉ० कुँअर बेचैन जी हिन्दी गौरव सम्मान से अलंकृत

इन पुरस्कारों में इस वर्ष "हिन्दी गौरव सम्मान" के लिये 'डॉ० कुँअर बेचैन' जी को चुना गया है। जिसके तहत 'डॉ० कुँअर बेचैन' जी को २ लाख रूपये एवं प्रशस्ति पत्र से सम्मानित किया जायेगा, जो उनके हिन्दी गज़ल में किये नये प्रयोगों एवं अन्यविधाओं में दिये गये योगदान के लिये दिया जायेगा।
24 जनवरी 2008
इन्तज़ार... सफ़र के अन्तिम पड़ाव का
उदासी के ये बढ़ते घेरे
मेरे अन्तर्मन में
काले सर्प की तरह
फन फैलाकर
बैठ गये हैं।
एक अँधेरे कुँए में
फेंक दिये गये
अजन्मे शिशु की तरह
डूबता जा रहा है
मेरा अस्तित्व।
सन्नाटे भरा हर पल
मेरे रोम-रोम को
भूखे शेर की तरह
नोंच-नोंच कर खाये जा रहा है।
जन्म से मृत्यु की ओर
बढ़ता ये सफ़र
साँसों की धूमिल डगर को
तार-तार किये जा रहा है।
अब तो है बस इंतजार
इस सफ़र के अंतिम पड़ाव का
ताकि फिर कर सकूँ तैयारी
इक नये सफ़र की।
शायद आने वाला नया सफ़र
दे सके मेरे सपनों को
एक पूर्णता
एक नयी उंम्मीद...
31 दिसंबर 2007
बस कुछ पल और थोड़ा सा इन्तज़ार... फिर खिलेंगे फूल ....महकेगी बगिया...
पुराने दिन
थे घमंड से चूर
लो बीत चले।
लो बीत चला
एक और सफ़र
नयी तलाश।
डाकिया लाया
खुशियों की चिट्ठियॉ
नये साल में.।
नये साल की
बगिया में खिलेंगे
सुखों के फूल ।
लो चल पड़े
नया साल खोजने
बर्फीले दिन।
आतंकित सा
पग-पग बढाये
ये वर्ष आये।
उज़ाडे घर
काहे का नया साल
आतंकियों ने।
आओ लें प्रण
न हो कोई गुनाह
इस वर्ष में।
डॉ० भावना
28 दिसंबर 2007
कुछ ऐसे चित्र जो नहीं मानते रंग भेद या जाति भेद, जानते हैं बस प्यार....
मेरी बेटी अपने अफ्रीकन मित्रों के साथ
डॉ॰ भावना
27 दिसंबर 2007
कैसे बीता गाजियाबाद में ४ दिसम्बर का दिन चलिये देखते हैं
गाज़ियाबाद में ४ दिसम्बर का दिन ओमप्रकाश चतुर्वेदी पराग जी, बी० एल गौड़ जी, कमलेश भट्ट जी और व्योम जी के साथ हाइकु दिवस में मेरी पुस्तक "तारों की चूनर" के विमोचन के कुछ चित्र और खबरें... डॉ० व्योम जी के सहयोग से..।
मित्रों की ख्वाहिश पर पुस्तक के कुछ अंश जल्दी ही पोस्ट करूँगी...


प्रवासी भारतीय हाइकुकार डा० भावना कुँअर (युगांडा) के हाइकु संग्रह तारों की चूनर का लोकार्पण करते हुए मुख्य अतिथि डा० जगदीश व्योम, अध्यक्ष ओमप्रकाश चतुर्वेदी पराग, विशिष्ट अतिथि बी०एल० गौड़ एवं संयोजक कमलेश भट्ट कमल

डॉ० भावना
6 दिसंबर 2007
छिड़ा जो युद्घ, रोएगी मानवता, हंसेंगे गिद्घ
गाजियाबाद, जागरण संवाद केंद्र
प्रसिद्घ साहित्यकार स्व. सत्यभूषण शर्मा के पचहत्तरवें जन्म दिवस पर हाइकू कवि गोष्ठी का आयोजन कविनगर में किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता ओमप्रकाश चतुर्वेदी ने की। संगोष्ठी के मुख्य अतिथि डा. जगदीश व्योम व विशिष्ट अतिथि बी.एल. गौड़ रहे। इस अवसर पर डा. अंजलि देवधर द्वारा लिखित पुस्तक हाइकू प्रवेशिका (विश्व के बच्चों की हाइकू) व डा. भावना कुंवर की हाइकू संग्रह तारों की चूनर का विमोचन किया।
कार्यक्रम की शुरूआत मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण तथा दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। सरस्वती वंदना अनुराधा भट्ट ने की। मुख्य अतिथि डा. जगदीश व्योम ने कहा कि स्व. सत्यभूषण शर्मा को भारत में हाइकू काव्य विधा के जनक हैं। उन्होंने बताया कि सत्रह अक्षरों में ही हाइकू में कविता निहित होती है। उन्होंने कहाकि आज के दौर में नेट पर विश्व में सबसे ज्यादा हिंदी भाषा पसंद की जा रही है। उन्होंने अपनी हाइकू 'छिड़ा जो युद्घ, रोएगी मानवता, हंसेंगे गिद्घ' के माध्यम से वाहवाही लूटी। गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे ओमप्रकाश चतुर्वेदी ने कहाकि हाइकू को जापानी भाषा में सेन्ड्रयू कहा जाता है। उन्होंने बताया कि जापान के कवि वासो ने भी हाइको एक विराट पूर्णता माना है। उन्होंने अपनी हाइकू 'बोये तुमने, काटने पड़े हमें पीड़ा के खेत' व 'पता न था, अंजाना सफर, कभी अंधा भी होगा' भी सुनाई। संगोष्ठी में मौजूद कवियों ने हाइकू के माध्यम से झकझोरा। व्यापार कर अधिकारी राजनाथ तिवारी ने सुख और दुख पर अपनी हाइकू 'पागल सुख, देता है, एक दिन दारुण दुख' कही तो लोग ताली बजाने लगे। डा. मधु भारती ने अंग्रेजी पर व्यंग्य कसते हुए कहा, देश प्रेमी वे, आंग्ल भाषा में हंसे, हिंदी में रोएं। अंजू जैन ने अपनी हाइकू 'खामोशी सदा हारती नहीं जीतती भी है।' सुनाई। संगोष्ठी के समापन पर संचालक कमलेश भट्ट ने अतिथियों को धन्यवाद दिया। महादेव प्रसाद, जितेंद्र साहू, नेहा बैद, विशारद भट्ट, कुसुम भट्ट, सुमन तिवारी, प्रत्युष यादव की गोष्ठी मौजूदगी उल्लेखनीय रही।
5 दिसंबर 2007
आप सबके स्नेह की आभारी
डॉ० भावना कुँअर
9 नवंबर 2007
जगमगाये दिल के दिये
दीप सजाएँ
स्नेह और प्रेम के
दीपावली में।
नेह चिराग
जलाकर रखना
घर-घर में।
जल उठेंगे
निर्दोष शलभ भी
इन दीपों से।
चीरता गया
अँधियारे का सीना
पावन दीया।
सच्ची दीवाली
जो पोंछ डाले आँसू
गरीबी के भी।
आँख के आँसू ,
उदर की आग को
डस लें दीये।
29 सितंबर 2007
ये खून के रिश्ते!!!
हर पल मेरी आँखों में
रह-रहकर आता है
जिसे किया गया मज़बूर
मुझे भुलाने के लिये
पर क्या मैं
भुला पाया वो चेहरा!
नहीं कभी नहीं
उसी चेहरे ने दिया था मुझे
मेरी माँ जैसा प्यार.
जब मैं भटका करता था
सड़कों पर
भूख और प्यास से बेहाल
सोया करता था फुटपाथ पर,
फिर वही ले गयीं मुझे
अपने घर, अपना बेटा बनाकार
पर वक्त की मार देखो
मुझे उस माँ को ही छोड़ने पर
मज़बूर कर दिया
उनके अपने ही बेटों ने
क्यों ?
क्योंकि मैं उनका सगा भाई नहीं था
था तो बस एक फुटपाथी,
मैं चला आया
उस माँ के आँचल से दूर
किन्तु आज़ तक नहीं भूला
उस माँ का प्यार
उसकी रोती तड़फती आँखें मेरे लिये,
मैं जीये जा रहा था
उन यादों के सहारे
किन्तु आज़ जिन्दा रहने की चाह
अचानक मर गयी
क्योंकि
आज़ देखा है मैंने
एक ऐसा मंजर जिसे देखने के बाद
नहीं जीना चाहता और अब
देखा है मैंने आज़
अपनी माँ को
यहीं फुटपाथ पर
चिथड़ों में लिपटे हुये
उलझे बिखरे बाल
पैरों में फटी बिवाईयाँ
चेहरों पर दर्द की परछांईयाँ
मात्र एक हड्डियों का ढ़ाँचा
नहीं देख पा रहा…
अपनी मुँह बोली माँ का ये हस्र
ये क्या हुआ? ये कैसे हुआ?
किसने किया ये हाल मेरी माँ का?
शायद उन्हीं बेटों ने
जिन्होंने एक दिन
मुझे घर से निकाल फेंका था,
उन्होंने अपनी माँ को भी नहीं बख्शा
जो न समझ पाये
माँ की भावनाओं को
तो फिर क्या समझेंगे
उसकी ममता को
क्या यही होते हैं अपने
क्या इन्हें ही
दी जाती है परिभाषा
‘अपने खून की”
तो अच्छा है
मैं उनका खून नहीं हूँ
मेरी माँ के इस हाल ने
झकझोर ड़ाला है
मेरा अस्तित्व,
एक साथ हज़ारों सर्प
मेरे शरीर में
बिलबिलाने लगे,
मेरा मस्तिष्क
शून्य हो गया
और मैं
जा गिरा
अपनी माँ के चरणों में
बनकर एक बुत…
डॉ॰ भावना
7 सितंबर 2007
जन्म दिन मुबारक हो माँ !
मेरी माँ के जन्मदिन पर उनको मेरे मन की भावनायें…
जन्म दिन मुबारक हो माँ !
लो माँ… एक साल और बीत गया
ना हो पाया
इस साल भी
हमारा मिलन,
सोचा था…
इस जन्म दिन पर
मैं तुम्हारे साथ रहूँगी,
पर मेरी विवशता देखो,
नहीं आ पाई इस साल भी,
क्योंकि…
मैं निभा रही हूँ
उन कसमों को, उन वादों को
जो तुमने मुझे निभाने को कहा था…
परिवार के उन दायित्वों को
जो तुमने मुझे सिखाया था…
जब मैं विदा हो चली थी
उस घर से इस घर के लिये
पर माँ !
मैं माँ और पत्नी के साथ-2
इक बेटी भी हूँ ना…
मुझे भी तुम्हारी याद आती है
तुम्हारी वो सुकून भरी गोद
जब मैं टूटती या बिखरती हूँ
पर, फिर लग जाती हूँ
निभाने दायित्वों को
तुम्हारी ही दी हुई
शिक्षा को
तुम भी तो मुझे याद करती होगी माँ !
पर
तुम भी तो घिरी हो
दायित्वों के घेरे में,
पर, तुम कभी नहीं थकती।
लेकिन, मैं देख पाती हूँ
वो मायूसी
जो मेरे दूर रहने से छा जाती है
तुम्हारी आँखों में
पर, माँ ! तुम उदास मत होना
शायद अगले साल
तुम्हारे जन्मदिन पर मैं
तुम्हारे पास होऊँ
इसी इन्तजार में…
आज से ही गिनती हूँ दिन…
३६५ हाँ पूरे ३६५ दिन…
फिर मिलकर काटेगें केक
मैं खिलाऊँगी केक का टुकडा तुम्हें
जो अपनी देश की धरती से दूर रहकर
नहीं खिला पायी
और तुमने भी तो..
मेरे ही कारण
केक बनाना ही छोड़ दिया
और छोड़ दिया जन्म दिन मनाना भी
माँ ! अगले साल मनाएँगे जन्म दिन
सजायेंगे महफिल
और तुम
केक बनाकार रखना
और फिर
मेरा इन्तजार करना...
मेरा इन्तजार करना...
5 सितंबर 2007
गोविन्दा आला रे !
28 अगस्त 2007
सूनी कलाई…
एक दिन था..
मैं!
अपनी सूनी कलाई को
निरखता हुआ
तुम्हारी राह देख रहा था,
मगर तुम नहीं आईं,
सुबह का सूरज
अपनी शक्ल बदलकर
चाँद के रूप में आ खड़ा हुआ
मगर तुम फिर भी नहीं आईं,
अब तो उम्मीद ने
भी साथ छोड़ दिया था,
कैसे बीता था वो दिन
आज तक भी नहीं भुला पाया।
लेकिन आज और कल में
कितना बड़ा फर्क है
आज़ वही तुम
मेरे लिये आँसू बहा रही हो,
सिसकियाँ भर रही हो,
कहाँ थी तुम जब मैं
दर-ब-दर की ठोकरें खा रहा था
अपने जख्मी दिल को लिये
इक अदद
सहारा ढूँढ रहा था
मैं अकेला
चलता रहा काँटों पर
अपने खून से लथपथ
कदमों को घसीटता हुआ
पर किसी ने नहीं देखा मेरी ओर
तुमने भी नहीं
तुम ने भी तो सबकी तरह
अपनी आँखे बन्द कर लीं
आज़ कैसे खुली तुम्हारी आँखे?
आज़ क्यों आये इन आँखों में आँसू?
क्या ये आँसू पश्चाताप के हैं?
या फिर मेरी पद, प्रतिष्ठा देखकर
फिर से तुम्हारा मन
मेरी सूनी कलाई पर
राखी का धागा
बाँधने का कर आया?
क्या यही होतें हैं रिश्ते?
उलझ रहा हूँ
बस इन्हीं सवालों में
यहाँ अपने वतन से दूर होकर
जिनका जवाब भी मेरे पास नहीं है
अगर है तो आज़ भी वही सूनी कलाई…