7 दिसंबर 2009

वापसी अपनों के पास

प्रिय मित्रों आज बहुत दिनों बाद आप सबसे बात करने का अवसर मिला है, मेरी बहुत सारी मजबूरियाँ रही बेटी की तबियत बिगडना, मेरा युगांड़ा से सिडनी जाना और भी इस बीच काफी उथल-पुथल रही, पर अब आप लोगों को पढ़ने का सिलसिला हाँ लिखने का भी कोशिश करुँगी की ना टूटे, आप लोगों का स्नेह मुझे फिर खींच लाया अपनों के बीच यूँ ही स्नेह बनाये रखियेगा अपनी एक रचना आज़ पोस्ट करती हूँ आशा है पंसद आयेगी...

उदासी के ये बढ़ते घेरे
मेरे अन्तर्मन में
काले सर्प की तरह
फन फैलाकर
बैठ गये हैं।
एक अँधेरे कुँए में
फेंक दिये गये
अजन्मे शिशु की तरह
डूबता जा रहा है
मेरा अस्तित्व।
सन्नाटे भरा हर पल
मेरे रोम-रोम को
भूखे शेर की तरह
नोंच-नोंच कर खाये जा रहा है।
जन्म से मृत्यु की ओर
बढ़ता ये सफ़र
साँसों की धूमिल डगर को
तार-तार किये जा रहा है
अब तो है बस इन्तज़ार
इस सफ़र के अंतिम पड़ाव का
ताकि फिर
कर सकूँ तैयारी
इक नये सफ़र की
शायद आने वाला नया सफ़र
दे सके मेरे सपनों को
एक पूर्णता
एक नयी उंम्मीद।
भावना

24 अगस्त 2009

मेरी बेटी अब बहुत ठीक है...

प्रिय मित्रो,
आप सबकी सच्चे मन से की गई दुआओं से मेरी बेटी अब बहुत ठीक है, मैं अब परिवार सहित आस्ट्रेलिया में-सिडनी में आ गई हूँ अब यहीं रहना है,मैं जल्दी ही यहाँ का अनुभव आप सब लोगों के साथ बाँटूगी बहुत सारी बातें हैं जो आप लोगों को सुनानी हैं आप लोगों से सुननी हैं जरा थोड़ा सा समय चाहिये सैट होने में ...
स्नेह
भावना

16 मई 2009

मेरी नन्हीं सी जान...

मेरी प्यारी सी बेटी ऐश्वर्या जो मात्र ९ साल की है ...अप्रैल से ही बहुत बीमार चल रही ...है अभी तीन दिन पहले ही अस्पताल रहकर आई ...है अभी भी घर पर काफी दवाईयाँ दी जा रही ...हैं उसकी पढ़ाई भी बन्द ...है स्कूल जाने को डॉ० ने मना किया ...है मैं उसके कारण बहुत अपसैट ,हूँ इसीलिए ना ही कुछ लिख पाती ,हूँ ना पढ़ पाती ,हूँ मेरी जान मेरी प्यारी नन्हीं सी जान में अटकी ...है आज काफी दिन बाद मेल देखी तो काफी दोस्तों की मेल आई ...मिली मेरे ना पढ़ने ना लिखने का कारण जानने के ..लिए मैं मेरे दोस्तों की आभारी हूँ उनका स्नेह देखकर ...इसीलिए ये पोस्ट डाली है ताकि सभी को जानकारी मिल जाये मेरे ना पढ़ने और लिखने का ,कारण जैसे ही मेरी बेटी ठीक होकर स्कूल जाने लगेगी मैं वापस अपने दोस्तों और पाठकों के बीच आऊँगी...
स्नेह और आभार
भावना

2 अप्रैल 2009

फर्स्ट अप्रैल की मधुर स्मृति...

कल फर्स्ट अप्रैल पर मुझे भी मेरे बचपन की शरारतों ने आ घेरा, नींद का आँखों में नामोनिशान न था, रह-रहकर मुझे अपना मासूम, चुलबुला, प्यारा सा बचपन याद आ गया, अब तो वो मासूमियत दुनिया के थपेड़ों से कठोरता में,चुलबुलापन बच्चे और परिवार की जिम्मेदारियों में और बडप्पन में बदल गया है. लेकिन दिल तो वही है जिसमें यादों का खज़ाना हुआ है। उसी खज़ाने का एक प्यारा सा मोती आप सबके साथ बाँटना चाहूँगी…

ऐसा ही एक दिन था फर्स्ट अप्रैल का दिन, हम सभी परिवार के लोग अपने फार्म हाऊस पर गए हुए थे। हम भाई-बहिन बहुत धमा-चौकड़ी मचाते थे, शरारतें करते थे, पर पापाजी से सभी डरते थे, उन्हें देखकर तो बस साँप ही सूँघ जाता था, भूख-प्यास सब गायब हो जाती थी।

शाम का वक्त था मम्मी ने हमें बुलाया, वो रसोईघर में काम कर रहीं थी, हमसे बोली- "जाओ अपने पापाजी से कहो फार्म से अच्छा सा सीताफल ले आयें आज खट्टा मीठा सीताफल,परांठे और खीरे का रायता बना दूँगी, तुम लोगों को बहुत पंसद है ना" हमने भी खूब उछल-उछलकर कहा -"हाँ हाँ बहुत मजा आयेगा।" हमारी उम्र ६ साल रही होगी हम अपने बड़े भाई के साथ पापाजी को मम्मी की बात बताने पहुँच गए पापाजी ने कहा-“ चलो तुम लोग भी चलो” हम भी खुशी-खुशी पापाजी के साथ चल दिए। दूर-दूर तक फैले फार्म हमें बहुत भाये, चारों तरफ हरियाली ही हरियाली ,बहुत सारे पेड़ -आम,अमरूद, केले, कटहल, जामुन और भी ना जाने कितने, एक जगह पर बहुत सारी बेल फैली हुई थी जो रंग बिरंगे फूलों से सजी थी ,तब उनका नाम नहीं जानते थे, वहीं उन बेलों के पास पापाजी को जाते हुए देखा, शायद सीताफल वहीं होता है, यही सोचकर हम पापाजी का इन्तजार करने लगे जैसा कि उन्होंने आदेश दिया था।

थोड़ी देर बाद पापाजी को खाली हाथ आते हुए देखकर हमने पूछा- "क्या नहीं मिला "? तो वो बोले कि - "पहले ये बताओ कौन ले जाकर देगा अपनी मम्मी को मैंने तपाक से कहा- "मैं"। पापाजी ने कहा- "ठीक है मैं कुछ लेकर आता हूँ जिसमें उसको रख लूँ फिर तुम्हें दे दूँगा" । हमने हाँ में गर्दन हिला दी थोड़ी देर बाद वो एक कम्बल का टुकड़ा लेकर आये और वापस बेल वाले स्थान पर चले गए, वापस आये तो उनके हाथ में उस कम्बल के टुकड़े में सीताफल है सोचकर हम खुश होते हुए उनके पास पहुँचे, पापाजी ने थोड़ी दूर तक खुद ही रखने के बाद देने को बोला, क्योंकि वो हमारे लिए बहुत भारी था।

अब दरवाजे के पास जाकर उन्होंने हमें वो भारी-भरकम सीताफल दे दिया, हम ठहरे सींकड़ी पहलवान, हमसे वो सँभाले ना सँभले, पर हमने भी हार ना मानी और हम लुढकते पुडकते मम्मी के पास पहुँच गए, जो अँगीठी में कोएले डाल रहीं थी और चौकी पर बैठी थी हमने पापाजी के निर्देशानुसार जाकर, उनकी गोद में वो कम्बल के टुकड़े में लिपटा सीताफल लगभग पटक सा दिया, ताकि बोझ से निजात मिले, खाना तो बहुत पंसद था, पर आज जब उसको ढोना पड़ा तो नानी याद आ गई मैं,पापाजी और हमारे भाई वही खड़े मम्मी को उसको खोलते हुए देख रहे थे मम्मी ने जैसे ही उसको खोला तो तेजी से कोई चीज कूदती नजर आई और पापाजी जोर से चिल्लाए अप्रैल फूल बनाया, अप्रैल फूल बनाया हम भी उनके साथ यूँ ही चिल्लाने लगे और सभी उस भागने वाले जीव के पीछे दौड़े, मम्मी सहित, जानते हैं वो क्या था जी हाँ वो तो एक कछुआ था जो दौड़े जा रहा था और हम उसके पीछे ताली बजा-बजाकर नाच रहे थे फिर वो बाहर बने एक बड़े से नाले में कूद गया और हम बस मम्मी की शक्ल देखते रहे, जो अब भी उसकी सिहरन को महसूस कर रहीं थी।

(आज़ मैं यहाँ बहुत अकेला महसूस करती हूँ, उस मिट्टी की खुशबू को, उस शीतल हवा को अपने साँसों में महसूस करती हूँ, इतने दूर बैठे अपने माँ, पा को और कभी-कभी बच्ची बन खो जाती हूँ यादों के जंगल में ...परदेसी हवा और अपने वतन की हवा में बस यही तो अंतर है...)

डॉ० भावना

19 मार्च 2009

“जब मौत को मैंने देखा अपने बहुत ही करीब…

अनिल कान्त जी का संस्मरण "एनोदर डे ऑफ़ माय लाइफ " को पढ़कर बीता बचपन याद आ गया…

उम्र तो ठीक से याद नहीं है, बस इतना याद है कि हम छोटे थे। हम मम्मी पापा के साथ शहर में रहते थे।हमारी इकलौती बुआजी गाँव में रहती थी। हमने कभी उनका गाँव देखा नहीं था कारण मम्मी पापाजी कभी लेकर ही नहीं गये।

हमारे बड़े भाई (बुआजी के बेटे) शहर हमारे घर आये और हम भाई,बहन को अपने साथ ले जाने की जिद करने लगे, पर हमारे पापाजी के सामने किसी की चल सकती है भला, जहाँ पापाजी वहाँ कोई टिकता भी नहीं था। मम्मी को पटाया गया हाँ वो अलग बात है कि उनको पटाने पर भी हमको भेजा तो नहीं गया एक वादा जरूर किया गया कि… वो हमें लेकर वहाँ जरूर जायेंगे।

कुछ दिनों बाद पता चला हमारी बुआजी की बड़ी बेटी की शादी तय हो गई है ।अब हमने अपनी मम्मी को उनका किया वादा याद दिलाया… बस फिर क्या था… मम्मी लगीं पापाजी की मख्खनबाजी में… और आखिरकार मम्मी ने किला फतह कर ही लिया और हम सब चल पड़े शादी का आन्नद उठाने।


शादी बड़ी धूमधाम से हुई अपने बहन -भाईयों के साथ खूब मन लगा… अब बारी थी… बिछड़ने की… हम सब लगे फूट-फूट कर रोने …हमारा रोना हमारी बुआजी से देखा नहीं गया और उन्होंने हुक्म सुनाया कि बच्चे अभी नहीं जायेंगे बाद में बुआजी भिजवा देंगी। गुस्से में हमारी बुआजी भी पापाजी की ही तरह थीं । ( वो अब इस दुनिया में नहीं हैं पिछले दिनों कैंसर से उनकी मृत्यु हो गई)पापाजी से उम्र में भी बड़ी थीं, तो पापाजी को भी उनकी बात माननी पड़ी। मम्मी पापाजी के साथ लौट गईं। हम भी बेफिक्र हो अपने भाई बहनों के साथ खूब खुश रहे, खेले कूदे, जाने की भी चिन्ता नहीं थी, स्कूल खुलने में कुछ ही दिन बचे थे तो हमारे दोनों भाई (हमसे दोनों ही बड़े हैं , दो बड़ी बहनें हैं।) हमें और हमारे बड़े भाई को छोड़ने आये, अब यहीं मुसीबत आ गई… हमें पता भी नहीं था कि हम वापस कैसे जायेंगे। अब सुबह-२ तैयार हुए और चल पड़े। अब भैया ने हमें ट्रैक्टर पर बिठाया और बढ़ लिए स्टेशन की तरफ …जब तक स्टेशन पहुँचे तो मारे पेट दर्द के बुरा हाल था, इससे पहले कभी ट्रेन में भी नहीं बैठे थे ट्रैक्टर तो बहुत दूर की बात थी। कार के आदी जो थे। बस अब आ गया स्टेशन, भैया ने सख्त हिदायत दी कि- हम हाथ ना छोड़े , बहुत भीड़ थी, भैया ने समझाया कि- "हमारी ट्रेन उधर आयेगी तो हमें नीचे उतरना है पटरियों से, पुल से जाने में ट्रेन छुट जायेगी जब मैं चलूँ तभी चलना।" हमने हाँ में गर्दन हिला दी जबकि वो बता हमारे बड़े भैया को रहे थे, बस हम इन्तजार करने लगे उनके आदेश का… हम तो वैसे बहुत एक्साइटिड थे ट्रेन में जाने के …भैया ने हम दोनों का हाथ पकड़ा और नीचे कुदा दिया, लाईन पार करने के लिए… बस यहीं हमसे चूक हो गई क्योंकि नीचे उतारने के बाद भैया ने हाथ छोड़ दिया और हम लगे अपनी धुन में ना जाने क्या सोचते हुए से चले गये सीधे और लाईन कर ली पार… हमने भैया को बोला-" ऊपर चढ़ाओ" अब भैया हों तो चढ़ायें देखा सब लोग चिल्ला रहें हैं – “अरे कोई बचाओ बच्ची मर जायेगी” हमें नहीं पता कि वो किसके लिए बोल रहे थे हमारा तो बस खून सूख गया… जब देखा कि हमारे भैया लोग उधर खड़े हैं… हमने तो बस उनकी सूरत देखी और वापस दौड़ पड़े उनकी तरफ, वो भी कुछ कह रहे थे, इशारा कर रहे थे , पर हमें कुछ समझ ही नहीं आ रहा था, आ रहा था बस इतना कि हम अपने भैया से बिछड़ जायेंगे अगर इधर ही खड़े रहे तो, चीखना, चिल्लाना जारी था… हम जब लाईन के बीच में आये तो कान फाड़ देने वाली आवाज को सुना, दायें मुड़कर देखा तो ट्रेन हमारे बिल्कुल पास थी, जब मौत को हमने देखा अपने बहुत ही करीब तो होश ही उड़ गए …वहाँ खड़ी औरतों की तो सिसकियाँ तक फूट पड़ी, ना जाने कैसे हमने बाकी बची लाईन पार की, उसके आगे का कुछ पता नहीं जब आँख खुली तो हम ट्रेन में थे और हमारे भैया सहित कुछ लोग हमारे ऊपर पानी के छींटे मार रहे थे, हम खुद को इसी दुनिया में पाकर आश्चर्यचकित थे और डर के मारे बोल नहीं फूट रहे थे भैया हमें समझाने में लगे थे कि -" मामाजी से कुछ मत बताना वरना वो मुझे बहुत मारेंगे "

जब
घर पहुँचे तो हमारा उतरा चेहरा देखते ही पापाजी भाँप गये कि कुछ हुआ है… उन्होंने हमारे भैया को जैसे ही आँख दिखाकर सच बोलने को कहा… हमारे भैया सुपर फास्ट ट्रेन की तरह एक ही साँस में सब कह गये… बस फिर क्या था हमारे भैया की जो धुनाई हुई,उन्हें आज तक याद है और हम हमारा तो पूछो ही मत आज भी अगर दूर कहीं ट्रेन की आवाज सुन लें तो दिल इतनी जोर से धड़कता है कि लगता है बस ये धड़कन कुछ और थोड़ी देर बस …उसके बाद एक लम्बी सी खामोशी…

डॉ० भावना कुँअर

10 मार्च 2009

दिल के दरमियाँ की ओर से सभी मित्रों को होली की ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ...

आओ मनाए होली...
रंग चुरा लें...
तितलियों से...
और मधुर सुर.
चिड़ियों से...
फूलों पर छिटकती
किरणों से...
लेकर चमक,
दूब पर फैली
ओस कण को...
भर मुट्ठी में,
वादियों में बिखरे
रंगों को...
प्रीत संग घोल
आज रंग दें...
हर कोना...
भावना,प्रगीत, कनु, किट्टू

26 फ़रवरी 2009

दो गहरे साये ...

झील के उस पार
दो गहरे साये
कभी घटते से
कभी बढ़ते से
मैं अक्सर देखा करता
लहरों में उठते
तूफानों से बेखबर
अपनी हसीन
दुनिया में व्यस्त
इक दूजे को
पूर्ण समर्पित।
मैं रोज सुबह उठता
अखबार पढ़ता
और इसी झील के किनारे आता।
उन सायों से
मेरा एक रिश्ता
बहुत घनिष्ट रिश्ता
बन गया।
बन गये वो भी
मेरी जिंदगी के अहं हिस्से।
रोजमर्रा की तरह
आज भी उठा
अखबार पर नजर दौडाई
पर हटा न सका
दहल गया खबर पढ़कर
झील में जोरों का तूफान जो आया था
बेतहाशा दौडा
झील के किनारे
पर वो किनारा
अब तहस-नहस हो चुका था
बर्बादी का आलम था
और
और वो दोनों साये
एक दूजे का हाथ थामें
खामोश पडे थे
जैसे कि रात और दिन
सदियों बाद मिलें हों
ऐसी खामोशी
जो अब कभी नहीं टूटेगी।
मैं बुत बना देखता रहा
सोचता जाता
कौन थे?
कहाँ से आते थे?
नहीं जान पाया इस रहस्य को
हाँ जाना बस इतना
निभाया साथ दोनों ने
आखिरी साँस तक
जो अब नहीं
निभाता कोई।

डॉ० भावना

25 जनवरी 2009

रूह की बेचैनी


फूलों जैसा मेरा देश मुरझाने लगा
शत्रुओं के पंजों में जकडा जाने लगा
रात-दिन मेरी आँखों में एक ही ख्वाब
कैसे हो मेरा 'प्यारा देश' आजाद
कैसे छुडाऊँ इन जंजीरों की पकड से इसको
कैसे लौटाऊँ वापस वही मुस्कान इसको
कैसे रोकूँ आँसुओं के सैलाब को इसके
कैसे खोलूँ आजादी के द्वार को इसके
कैसे करूँ कम आत्मा की तडप रूह की बेचैनी को
चढ़ जाऊँ फाँसी मगर दिलाऊँगा आजादी इसको
ये जन्म कम है तो, अगले जन्म में आऊँगा
पर देश को मुक्ति जरूर दिलाऊँगा।

जो सोचा था कर दिखलाया
भले ही उसको फाँसीं चढ़वाया
शहीद भगत सिंह नाम कमाया
आज भी सब के दिल में समाया।



वतन से दूर हूँ लेकिन
अभी धड़कन वहीं बसती
वो जो तस्वीर है मन में
निगाहों से नहीं हटती।


बसी है अब भी साँसों में
वो सौंधी गंध धरती की
मैं जन्मूँ सिर्फ भारत में
दुआ रब से यही करती।


बड़े ही वीर थे वो जन
जिन्होंने झूल फाँसी पर
दिला दी हमको आजादी।
नमन शत-शत उन्हें करती।


Dr.Bhawna

21 जनवरी 2009

दांस्ता...

धड़कता रहा
लफ़्जों का सीना
रात भर,
सिसकती रही
कलम भी,
कागज़ भी न दे पाया
अपना हाथ,
चाँद ने भी
करवट ले ली,
ओढ़ ली काली चादर
रोशनी ने,
तारों ने भी
फेर ली अपनी आँखें,
पिघलता रहा आसमां
मोम की मानिंद,
थरथराते रहे
रात्रि के होठ,
तो फिर!
कैसे लिखता वो
दर्दे दिल की दांस्ता?
डॉ० भावना

31 दिसंबर 2008

सभी मित्रों को नव वर्ष की हार्दिक बधाई!!



काँपते हाथ
पलटे कलैंडर
नये साल का।

मासूम आँखे
खोज़ती माता-पिता
सूने घर में।

सीढियाँ चढे़
सँभलकर सभी
नये वर्ष में।

उलझे रास्ते
जल्द ही सुलझेंगे
नव वर्ष में।

मोड़ भी बस
मुड़ते रहें सदा
मंजिल से दूर।

मंगलमय
सभी को नव वर्ष
दिल से दुआ।

आगे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

18 दिसंबर 2008

अनकही दास्ताँ...

आप सभी मित्रों के सहयोग और स्नेह के कारण आज़ मैं भी कर पूरी कर पाई सैंचुरी और कोई समय होता तो आप सबको केक खिलाया जाता पहले की तरह लेकिन कोई बात नहीं उधार रहा जैसे ही मूड़ अच्छा होगा आप सबको केक खिलाया जायेगा...


आज़कल कुछ अनजान सायों के बीच घिरी रहती हूँ मैं, चाहे रात का समय हो, या फिर दिन का, जिंदगी मानों थम सी गयी हो लाख चाहने के बावजूद भी खुद को सामान्य नहीं कर पाती हूँ। आज़कल बच्चों की छुट्टियाँ चल रहीं हैं, वो भी मेरा चेहरा देखकर रोज़ ही एक सवाल करते हैं-“ मम्मा आप इतना उदास और खोये-२ क्यों रहते हो ? ना ही हमारे साथ खेलते हो ना ही कहीं घूमने जाते हो, ना ही ठीक से बात करते हो हमारी तो सारी छुट्टियाँ आपके इसी मूड़ के साथ बीती जा रही हैं।“
मूड़ जी हाँ ये मूड़ भी अजीब चीज है कभी-२ कितना भी समझाओ खुद को, कि हमें दुखों से नहीं घबराना है, हिम्मत रखना है, संभालना है खुद को, पर हम हार जाते हैं,अब चाहे वह दुख मुम्बई में हुए हादसे से संबन्धित ही क्यों ना हो।

आँखों के आगे कभी शहीदों के परिवार वालों के चेहरे, कभी अपनों के बिछड़ने से रोते-बिलखते परिवार, कभी मोशे जैसे अनेक बच्चों की सिसकियाँ कानों में गूँजती रहती हैं। बस घर के अंदर बैठे-बैठे यही सब सोचते-२ तबियत भी जरा नासाज़ रहने लगी डॉ० ने कहा कि मुझे घूमना चाहिये, बस अब घर में सबकी डाँट शुरु –“चलो घूमने” अब बच्चों के प्यार और पतिदेव के प्रेमपूर्ण आग्रह के आगे भला कैसे इंकार कर पाते तो शुरू हुआ सिलसिला घूमने का कभी बाहर और कभी छत पर।

अभी कुछ हफ्तों से छत पर ही जा रहे थे क्योंकि जरा बाहर का माहौल इन दिनों यहाँ खराब सा हो जाता है, आप भी सोच रहे होंगे कि क्रिसमस और नया साल आने वाला है तो अच्छा होना चाहिये तो बुरा क्यों, जी हाँ यही तो कारण है बुरा होने का अब जिन लोगों को क्रिसमस मनाना है ,तो उनको पैसा तो चाहिये ही, पर मेहनत करना कुछ लोगों को पंसद नहीं आता तो हाथ साफ करते हैं,कभी सोने की चेन पर तो कभी मोबाईल पर हमारे कई मित्र इन अक्लमंदों के हत्थे चढ़ चुके हैं।

छत पर घूमते हुए निगाह पड़ी एक पंछी के जोड़े पर, बेहद उदास, ना ही कोई आवाज़, ना ही कोई हलचल एक दम पत्थर से बने एकटक एकदूसरे को निहारते हुए ना जाने कौन सी दुनिया में खोए हुए यूँ ही घंटों बैठे रहे। मैं जो अपनी उदासी दूर करने के लिए छत पर घूमने आई लेकिन उनकी उदासी देखकर फिर सोचने पर मज़बूर हो गई किस दुख के मारे होंगे ये बेचारे ? क्या इनके बच्चे इनसे बिछड़ गये? क्या किसी शिकारी की गोली का शिकार हो गए या फिर किसी ज्यादा ताकतवर पंछी ने इनके बच्चों को मार डाला, क्या कई दिन पहले आये तूफान ने इनका घर निगल लिया, क्या ये परदेसी हैं और अपनों की याद इनके अंतर्मन को झुलसा रही है, मैं कुछ भी नहीं समझ पाती और आकर बिस्तर पर लेट जाती हूँ, अब आँखों में नींद कहाँ बस वही पंछी का जोड़ा दिलो-दिमाग पर छाया रहता और बेसब्री से शाम होने का इंतज़ार।

अगले दिन फिर उस जोड़े को ठीक उसी समय, उसी मुद्रा में घंटों बैठे पाया एक अज़ीब सा लगाव हो गया मुझे जो बरबस ही मेरे कदम शाम होते ही छत की ओर बढ़ने लगते ये सिलसिला एक हफ्ते तक चलता रहा, तीन दिन पहले मैं जब छत पर गई तो उस जोड़े को वहाँ ना पाकर बहुत उदास मन से नीचे आ गई। अगले दिन फिर जाकर देखा वह जगह, वह मुंड़ेर सब वहीं था पर वह जोड़ा नहीं था ना जाने कहाँ गया होगा क्या अपने देश? या कि उसके बच्चे उसे मिल गये होंगे अगर ऐसा हुआ होगा तो बहुत अच्छा हुआ क्या कोई भी अपने घर परिवार से दूर रहकर सुखी हुआ है भला…

आज़ कुछ पड़ोसी मेरे पास आये और बोले कि वो हमारा नल देखना चाहते हैं हमने इज़ाज़त दे दी वो बिना कुछ कहे चले गये हमें तो समझ ही नहीं आया कि माज़रा क्या है थोड़ी देर बाद देखते हैं तो नीली वर्दी पहने कई सफ़ाई कर्मचारी धड़ाधड़ छत पर जा रहें हैं, हम बडे खुश हुए चलो इस बार नये साल पर बिना हमारे कहे छत तो साफ होगी, करीब दो घंटे बाद हम देखते हैं कि सभी मुँह पर मास्क पहने और ना जाने क्या-क्या बड़बड़ाते जा रहे थे, दिन भर सभी लोगों का आना जाना लगा रहा, जब पाँच घंटे बीत गए तो मुझसे भी सब्र नहीं हुआ मैं भी चली अपनी साफ सुथरी, सपनों की छत देखने, जब वहाँ पहुँची तो बदबू के मारे दिमाग घूम गया, समझ नहीं आया कि इतनी बदबू किस चीज़ की हो सकती है, तभी जो नज़ारा देखा उसे देखकर मेरे तो होश ही उड़ गए, दिमाग सुन्न हो गया और बरबस ही आँखों से आँसू बरस पड़े मेरी आँखों के सामने वो पंछी का जोड़ा था, जिसे पानी के बहुत बड़े टैंक से निकाला जा रहा था और उस जोड़े के शरीर में कीड़े चल रहे थे, अब मुझे सारी बात समझ आई …कि क्यों लोग हमारा नल चैक करने आये थे ? वो ये देखना चाहते थे कि क्या हमारे पानी में भी बदबू आ रही है? हुआ यूँ कि हमारे यहाँ बड़े-२ आठ टैंक हैं जिसमें से दो टैंक के ढक्कन शायद स्मैकियों ने निकलकार बेच डाले थे, जिनका हमें पता भी नहीं था, उनमें से ही एक टैंक में वो पंछी को जोड़ा मिला जिसके कारण कुछ घरों में पानी में बदबू की शिकायत थी, सभी लोग कह रहे थे-“ कि वे सभी दो दिन से उस पानी को इस्तेमाल नहीं कर रहे थे और मैं बहुत लक्की हूँ जो मेरी घर में वो पानी नहीं आ रहा था जिसमें बदबू आ रही थी, मेरा घर उस बदबू से अछूता था” लेकिन उन सभी लोगों में से ये कोई नहीं जानता कि मुझे वो बदबू नहीं मुझे छू गईं वो आँखे जो मरने के बाद भी किसी के इंतज़ार में खुली हुईं थी, मुझे छू गईं उनके प्यार की अनकही दास्ताँ...
Dr.Bhawna

6 दिसंबर 2008

मासूम पुकार...

मुम्बई में मची तबाही दिलो दिमाग से निकलने का नाम नहीं लेती तो क्या हुआ अगर परदेश में बैठे हैं हमारी आत्मा तो अपने देश की मिट्टी में बसी है नहीं सहा जाता इतना दुःख, आत्मा पर इतना बोझ की ना कुछ कहते बनता ना ही चुप रहते बनता। आज़ इतने दिन हो गये पर टी०वी० के न्यूज़ चैनल से आँखे ही नहीं हटती, ना ही थमता इन आँखों से आँसुओं का सैलाब जब भी देखती उन बच्चों को रोते बिलखते हुए, जिनका सब कुछ छीन लिया इस तूफान ने, उन बच्चों की पीड़ा को मैंने बहुत करीब से महसूस किया है उन बच्चों में मोशे और अन्य बच्चे भी हैं जिनकी दुनिया ही बदल गई । मैंने बच्चों के मन को कुछ ऐसे महसूस किया ...
माँ! कहाँ हो तुम?
कहीं भी दिखती क्यूँ नहीं?
माँ मेरी आँखों में,
दर्द होने लगा है…
तुम्हारी राह निहारते-निहारते
पर तुम नहीं आती!
माँ मुझे नींद आ रही है,
पर तुम तो जानती हो ना…
तुम्हारी गोद के बिना…
मैं सो नहीं पाता।
माँ मुझे भूख भी लगी है,
पर मुझे तुम्हारे ही हाथ से…
खाना पंसद है ना!
अब मैं बहुत थक गया हूँ…
पापा तुम भी नहीं आये!
तुम जानते हो ना पापा…
मैं तो बस तुम्हारे साथ ही घूमने जाता हूँ।
तुम्हारे बिना मुझे कहीं भी जाना अच्छा नहीं लगता!
फिर भी तुम क्यूँ नहीं आते?
पापा मुझे कोई खिलौना नहीं चाहिये!
ना ही टॉफी, ना चॉकलेट…
चाहिए तो बस आप दोनों का साथ।
आप दोनों कहाँ छिप गये?
आपको पता है ना मुझे अँधेरे से बहुत डर लगता है!
यहाँ चारों तरफ बहुत अँधेरा है…
यहाँ बहुत डरावनी डरावनी आवाजें आ रही हैं…
धुँए जैसी कोई चीज़ है यहाँ,
जिससे मेरा दम घुट रहा है!
यहाँ सब लोग जमीन में ही सोए पड़े हैं …
कोई भी हिलता डुलता नहीं है…
ना ही कोई किसी को आवाज़ ही देता,
माँ ना जाने यहाँ इतनी खामोशी क्यूँ है!
इक अज़ीब सा सन्नाटा…
मेरे चारों ओर पसरा पड़ा है,
और बाहर पटाखे चलने जैसी आवाजे आ रही हैं।
माँ मुझे बहुत डर लग रहा है,
आप दोनों कहाँ छिपे हैं?
प्लीज़ बाहर आ जाईये!
मैं तो अभी बहुत छोटा हूँ…
आप लोगों को ढूँढ भी नहीं सकता!
माँ! पापा! कुछ लोग बाहर बात कर रहें हैं…
कह रहें है आप दोनों को गोली लगी है…
आंतकियों की गोली…
माँ ये आंतकी क्या होते हैं?
पापा ये गोली क्या होती है?
क्या गोली लगने से…
दूर चले जाते हैं?
माँ कहो ना इन आंतकियों से,
एक गोली मुझे भी मार दें,
ताकि मैं भी आपके पास आ जाऊँ!
मुझे नहीं आता आपके बिना रहना!
माँ नहीं आता…
डॉ० भावना

29 नवंबर 2008

शहीदों को शत-शत नमन...

कफन में लिपटे…
अपने बेटे को देख !
माँ का कलेज़ा फट पड़ा !
आँसू आँख से नहीं
दिल से बहे थे…
ऊँगलियाँ थी कि…
उसके चेहरे से
नहीं हटती…
मुँह से बस यही
आवाज़ निकली !
वाह मेरे लाल !
मुझे नाज़ है तुझ पर
बचा लिया तूने कितनी ही…
माँ की गोद को उज़ड़ने से…
बचा लिया तूने कितनी ही…
पत्नियों के मांग का सिंदूर…
किसी पिता का दुलार !
किसी घर का अकेला चिराग !
जो नहीं बच सके उनके लिये …
रोता है मेरा दिल…
मेरे लाल !
तू फिर आना…
अगले जन्म में भी तू
मेरी ही कोख से जन्म लेना…
फक्र है मुझे तुझ पे !
Dr.Bhawna

27 नवंबर 2008

क्या आप इन्हें पहचानते हैं?

चित्र - साभार - NDTV 24x7


यही हैं वो दरिंदे जो बोट पर सवार होकर आये और मासूम लोगों का खून बहाने में जरा भी नहीं हिचके। ये दिल दहला देने वाले मंजर जो आँखों में बस गये हैं क्या कसूर था उन मासूमों का जिनका खून बहाया गया?

Dr. Bhawna

26 नवंबर 2008

सिलसिला…

आज़ सुबह जैसे ही टी०वी० खोला सबसे पहली खबर सुनने में आई एक नवजात बच्ची को मुम्बई के माँ बाप ने डस्टबिन में डाल दिया ये सुनते ही दिल दहल गया भावनाएँ उमड़ पड़ी उस बच्ची के लिए ….पिछले हफ्ते दिल्ली की भी ऐसी एक खबर पढ़ने में आई थी जिन्होंने अपनी बच्ची को फुटपाथ पर छोड़ दिया था ना जाने कब रुकेगा ये सिलसिला…


क्यूँ है मेरे हिस्से में
सिर्फ कचरे का डिब्बा !
क्यूँ नहीं माँ का आँचल !
पिता का दुलार !
ऐसा करते हुए
क्यूँ नहीं काँपते हाथ !
क्यूँ नहीं धड़कता दिल !
क्यूँ नहीं तड़पती आत्मा !
ऐ ! मुझे यूँ मारने वाले सुनो !
तुम तो मुझसे पहले मर चुके हो
तुम भला मुझे क्या मारोगे
भावनाओं से शू्न्य
तुम्हारा दिल बन चुका है
माँस का लोथड़ा
जिसे खायेगी
तुम्हारा दिल अब बन चुका है
माँस का लोथड़ा
जिसे खायेगी
तुम्हारी ही आत्मा
नोंच-नोंचकर
अभी जरा वक्त है…
एक दिन आयेगा
जब तुम्हें देना होगा
इस गुनाह का हिसाब
मेरा क्या !
मुझे तो मिल गई मुक्ति
तुम्हारे जैसे इन्सानों की दुनिया से
डॉ० भावना कुँअर

18 नवंबर 2008

नहीं उसके सिवा तेरा कोई, ये याद कर ले...

लीजिये आप सबके स्नेह के कारण अम्माजी की लिखी एक ओर ग़ज़ल...
नहीं उसके सिवा तेरा कोई, ये याद कर ले
खुदा की याद से तू अपना दिल आबाद कर ले।

न उसको याद रखना, करना है बर्बाद खुद को
कहीं ऐसा न हो तू खुद को यूँ बर्बाद कर ले।

अगर फ़रियाद सच्चे दिल की हो, सुनता है मालिक
तू सच्चे दिल से उससे, चाहे जो फ़रियाद कर ले।

जो उससे बँध गया, हर ओर से आज़ाद है वो
तू अपने आपको हर ओर से आज़ाद कर ले।

कोई तो काम इस दुनिया में ऐसा करके जा तू
कि जिससे दुनिया तुझको याद तेरे बाद कर ले।
लीलावती बंसल
प्रस्तुतकर्ता- भावना

10 नवंबर 2008

प्रेम का पाठ

प्रिय पाठकों आज मैं आप सबके लिये अपनी मातृतुल्य संतोष कुँअर जी की एक रचना लेकर आई हूँ आशा है आप सबको पंसद आयेगी।
मम्मी जी को लिखने का बचपन से ही शौंक है। बाल-कविताएँ एवं कहानियाँ उनकी खास पंसदगी हैं। उनकी "प्यारे बच्चे प्यारे गीत" पुस्तक बच्चों को बहुत लुभाती है, अनेक पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कहानियाँ और बाल-गीत छपते रहते हैं आज़ भी वे लगातार लिख रहीं हैं मैं जब भारत उनके पास गई तो मैंने असंख्य कहानियाँ और बाल-गीत उनके पास देखे जिनको मैं अपने साथ लाने से ना रह पाई और जो भी मैंने अपनी इस बार की भारत यात्रा पर पाया उस सबको अपने मित्रों के साथ बाँटना भी चाहा शायद आप लोगों का स्नेह ही मुझे ऐसा करने को प्रेरित करता है ये रचना शायद बच्चों को पंसद आये इसी आशा में… शीर्षक है …


प्रेम का पाठ
मोहन-सोहन हैं दो भाई
उनमें होती बहुत लड़ाई
एक बार मामाजी आये
साथ कई गुब्बारे लाये
सूखे-सूखे, गीले-गीले
लाल-हरे और नीले-पीले
मोहन बोला-'सिर्फ मुझे दो।'
सोहन बोला-सिर्फ मुझे दो।'
छीन-झपट में इतने सारे
फूट गये प्यारे गुब्बारे
मामा ने तब यह समझाया
और प्रेम का पाठ पढ़ाया-
'वो जो बात-बात पर लड़ता
बना बनाया काम बिगड़ता।
संतोष कुँअर

5 नवंबर 2008

बहुत सारी मीठी-मीठी यादों के साथ भारत यात्रा से वापसी...

मधुर यादों के साथ सपरिवार भारत लौटे, उन्हीं यादों में से कुछ यादें आप सब लोगों के साथ बाँटना चाहूँगी।
सबसे पहले बात करते हैं अम्माजी की जी हाँ हम उन्हें अम्माजी का सम्बोधन देते हैं क्यों? क्योंकि हमारे श्वसुर जी भी उनको अम्माजी जो कहते हैं अम्माजी जानी-मानी लेखिका, कवयित्री,शायरा, सितार वादिका, कला में पारंगत और भी ना जाने कितनी खूबियों की धनी हैं हमारी अम्माजी। जिनका पूरा नाम लीलावती बंसल है जो गाज़ियाबाद में रहती हैं ,उम्र है ९० खूब लिखती पढ़ती हैं किन्तु चलने में अब थोड़ा परेशानी है तो क्या हुआ लेकिन हौंसले तो बहुत बुलन्द हैं। कितने ही साल अमेरिका में रहने के बाद अपने वतन में वापिस आ गयी हैं अपने पतिदेव के साथ। बाकी सभी बेटे बहुएँ अमेरिका में हैं। अम्माजी कम्यूटर पर काम नहीं कर सकतीं मैं उनकी रचनाओं को आप सबके सामने लाना चाहती हूँ शायद आप सबको अच्छा लगे। उनकी किताबों की संख्या बहुत है जिसकी चर्चा अगली पोस्ट में करेंगे तब तक आप उनकी लिखी एक गज़ल का आन्नद लीजिये…

लीलावती बंसल जी की एक
गज़ल
माना कि कुछ नहीं हूँ मैं,लेकिन भरम तो है
यानि खुदा का मुझपे भी थोड़ा करम तो है।

दौलत खुशी की मुझपे नहीं है तो क्या हुआ
मुझपे मगर ये मेरा ख़ज़ाना-ए-गम तो है।

माना कि मुझको वक़्त ने बर्बाद कर दिया
इस पर भी मेरे हाथ में मेरी क़लम तो है।

पूछा उन्होंने हाल तो कहना पड़ा मुझे
शिद्दत ग़मे-हयात की थोड़ी-सी कम तो है।

चलिए, मैं बेशऊर हूँ, बे-अक़्ल हूँ बहुत
लेकिन हुज़ूर, बात में मेरी भी दम तो है।
प्रस्तुतकर्त्ता - भावना कुँअर

28 अक्टूबर 2008

रोशन दिये हम यूँ ही करते रहें...

--भारत से वापसी के बाद--
दिल के दरमियाँ की ओर से सभी पाठकों को दीपावली की ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ---

() () () () () () () () () () () () ()
रोशनी के दिये यूँ ही जलते रहें
लड़खड़ाये कदम भी सँभलते रहें
लाये त्यौहार सौहार्द हर दिल में यूँ
साथ कदमों से मंजिल पर चलते रहें।
भावना,प्रगीत,कनु और किट्टू

30 जून 2008

कुछ दिनों के लिये लिखने पढ़ने से विदा...

एक लम्बे अरसे बाद ८ जुलाई को भारत जाना हो रहा, अपने परिवार के साथ रहने का अवसर मिल रहा है अज़ीब सा एहसास है मन में , कभी २ या ३ साल में जो जाने को अवसर मिलता है, क्योंकि यहाँ भी कभी हमें छुट्टी नहीं, कभी हमारे साहब को, तो कभी बच्चों के पेपर, पर अब अच्छा लग रहा है,बस आप लोगों से और नेट से ज्यादा सम्पर्क नहीं रह पायेगा , आप सबको बहुत मिस करूँगी २ महीने बाद मुलाकात होगी ,कोशिश करूँगी इस पर bhawnak2002@gmail.com बने रहने की तब तक लिये लिखने पढ़ने से विदा...

Dr. Bhawna