22 अप्रैल 2011
आसमान को छू लें
13 अप्रैल 2011
मन के आँगन, वो महक चन्दन-सी...
आप सोचेंगे कि किताब देख कर इतना खुश होने जैसी क्या बात थी ? पर बात तो थी न...जैसे किसी बच्चे को उसका मनपसन्द खिलौना मिल जाए तो वो कैसे रिएक्ट करेगा, उसकी कल्पना कीजिए...। हाइकु -संग्रह देख कर मुझे ऐसा ही लगा । वह सिर्फ़ एक पुस्तक ही नहीं, बल्कि एक पूरा दस्तावेज़ ही है । अठारह सशक्त क़लमों से निकली सुन्दर सशक्त रचनाएँ...।
हाइकु एक ऐसी विधा है, जिसमें मेरे विचार से- ‘जितने गहरे जाओ, उतने मोती पाओ’ वाली बात लागू होती है । पाँच-सात-पाँच वर्णों के क्रम में सजी तीन पंक्तियों वाली नन्ही-सी कविता । पर जितना छोटा आकार, उतनी गहरी बात...। ‘देखन में छोटी लगे, घाव कर गंभीर’...। बस आपमें उसे महसूसने की, उसकी रसानुभूति करने की कितनी क्षमता है, हाइकु का आनन्द उठाना बस इसी बात पर निर्भर है ।
पुस्तक जिस समय मुझे मिली, वह वक़्त था मेरे बाकी कार्यों का...। शाम की चाय, नाश्ता...फिर खाने की तैयारी...बेटे की पढ़ाई...वगैरह, वगैरह...। सो मन मसोसकर सरसरी निग़ाह से पुस्तक देखी और रख दी...। तुरन्त पढ़नी इसलिए नहीं शुरू की ;क्योंकि मैं उसे पढ़ना नहीं, उसमें डूबना चाहती थी ।
और डूबने का वक़्त मिला मुझे रात को...। सब कर्त्तव्यों से खाली होक, पूरी फ़ुर्सत के साथ जब हाइकुओं की उस नदी में डूबने उतरी तो बस्स...। न जाने उन लहरों के साथ कितनी दूर तक तैर आई, पता ही नहीं चला...। बहुत सारे मोती भी चुन लिए मैने...अपने मन की माला में पिरोने के लिए...। सबकी तो नहीं, पर कुछ की बानगी आपके सामने भी प्रस्तुत करना चाहूँगी...।
डा.भावना कुँवर के हाइकु-
देवी नागरानी जी का हाइकु- ये मौन क्या/ कभी चुप बैठा है / कुछ कहे बिन ?- का मौन सच में बहुत कुछ बयान कर देता है ।
एक और सशक्त हाइकुकार हरदीप कौर सन्धु -
हाइकुओं में प्रकृति का भी बड़ा सटीक चित्रण कर दिया जाता है । जैसे कमला निर्खुपा जी का हाइकु-
इस संग्रह की एक वरिष्ठ हाइकुकार डा. सुधा गुप्ता जी के विभिन्न हाइकु साल के हिन्दी महीनों पर लिखे गए हैं । मेरी नज़र के सामने से ऐसे क्रमबद्ध (बारहमासा) हाइकु शायद ही गुज़रे हों । कुछ बानगियाँ पेश हैं-
जहाँ एक ओर डा. सतीशराज पुष्करणा जी ने समाजिक विसंगतियों पर व्यंग्य कसते हुए कहा है -
और अब अन्त में...अंग्रेजी में कहूँ तो - लास्ट, बट नॉट द लीस्ट - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी के हाइकु...
तो अब कितना लिखूँ...। मेरा मन तो इनसे भर ही नहीं रहा । तो अब बस हाइकुओं के बारे में इतना ही कहूँगी -
ज़िन्दगी अहसास का है नाम, धड़कन का नहीं
आदमी ज़िन्दा नहीं अहसास मर जाने के बाद । -(रेहाना क़मर)
4 अप्रैल 2011
माँ की डायरी
आओ मेरी नन्हीं गुडिया मेरे पास आकर बैठो...
बड़की तुम भी आ जाओ माना कि तुम बड़ी हो गई हो ...
सब सुख-दुख अच्छा-बुरा समझती हो ...
पर अभी भी ज़रूरत है तुम्हें कुछ बातों को समझने की ...
लगता नहीं अब मैं देख पाऊँगी अगला सावन...
बड़की तुम्हें छुटकी को , दिखाना होगा सही रास्ता ...
मत भटकने देना इसे बिन माँ की बच्ची की तरह...
सुबह उठना होगा तुम्हें,
तैयार करना होगा नन्हीं का
अब ! टिफिन क्या बनाना है
सब लिख दिया है मैंने एक डायरी में ...
क्या पहनाना है ?
कब स्कूल छोड़ना है ?
कब लाना है ?
होमवर्क कैसे कराना है ?
कब सुलाना है ?
क्या पंसद है ?
क्या नापंसद है ?
कब उदास होती है ?
क्यूँ उदास होती है ?
सब लिखा है मेरी डायरी में ...
तुम्हारे लिए भी कुछ लाइनें हैं
अगर जरूरत समझो तो पढ़ लेना ...
वैसे तो तुम समझदार हो गई हो ...
पर जरा बेख्याली में मत चुन लेना काँटे...
अपने दामन में संभाल कर रखना मेरी डायरी ...
जो पग-पग पर देगी तुम्हें सहारा
और मेरे जिंदा होने का एहसास ...
और छुटकी तुम घबराना मत
ना ही रोना मैं हमेशा ही तुम्हें देखूँगी ...
उस चमकीले तारे के माध्यम से ...
बस अब मेरे पास ही बैठो न जाओ दूर मुझसे ....
क्योंकि मुझे जाना है फिर अनन्त यात्रा पर ।
Bhawna
20 मार्च 2011
8 मार्च 2011
पहरे...

मेरी आँखों पर
इतने पहरे ...
पहले तो न थे ...
देख सकती थी मैं भी...
खूबसूरत ख्वाब ...
पर अचानक क्या हुआ?
जो निकाल ली गई
इनकी रोशनी ...
और अब तो ये
रो भी नहीं सकती ...
भावना
11 नवंबर 2010
रात का सन्नाटा...
4 नवंबर 2010
दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ

"दीपावली पर एक दीए की दर्द भरी कराह को महसूस करना चाहते हैं या उसका कुछ दुख बाँटना चाहते हैं तो इस लिंक को एक बार जरूर देखियेगा।"
http://gavaksh.blogspot.com/2010/11/2010.html
Bhawna
26 अक्टूबर 2010
14 अक्टूबर 2010
मेरा दर्द कुछ इस तरह भी...
7 अक्टूबर 2010
नहीं रही अब हिन्दी दूर ऑस्ट्रेलिया से...
जिसके मुख्य संपादक अनुज कुलश्रेष्ठ जी ने संपादन समिति में मुझे और रामेश्वर काम्बोज जी को भी सम्मिलित किया है। इस पत्रिका के प्रथम संस्करण में मेरी दो रचनाएं और गॉधी जी पर लेख प्रकाशित हुए हैं।
साथ ही सिडनी में एक कवि सम्मेलन का आयोजन भी ११ सितम्बर २०१० को किया गया जिसमें मुझे भी कविता पाठ करने का अवसर प्राप्त हुआ।
प्रस्तुत हैं "हिन्दी गौरव" पत्रिका में प्रकाशित उस कवि सम्मेलन पर समाचार और मेरी रचनाएं-


29 सितंबर 2010
क्या आप बता सकते हैं कि ये क्या है?
6 सितंबर 2010
अपनी जन्मस्थली को बहुत मिस कर रही हूँ ...
पर मैं अपने सभी शिक्षकों को तहे दिल से याद करते हुए शत-शत नमन करती हूँ, जिनके कारण आज़ मैं इस मुकाम तक पहुँची हूँ, आज मैं भी एक शिक्षक हूँ मुझे भी मेरे छात्र बहुत प्यारे हैं, हाल ही में मेरी एक छात्रा Great Barrier reef की यात्रा पर गई थी, १५ दिन पानी के जहाज का आंनद उठाते हुए उसने जो भी महसूस किया सब मुझे बताया और तोहफे के रूप में आज मुझे उसके खुद के खींचे फोटो मुझे भेंट स्वरूप दिए, जिसे मैं आप सबके साथ बाँटना चाहूँगी, वैसे हजारों फोटो आपको गूगल पर मिल जायेंगे पर उनमें मेरी छात्रा का मेरी प्रति स्नेह, सम्मान तो नहीं छलकेगा, जो मेरे लिए अमूल्य निधि है। मैं अपनी भावनाएँ आप तक पहुँचा पाई या नहीं ये तो मालूम नहीं, किन्तु मुझे आप सब अपने बहुत करीब लगे , आज के दिन में अपनी जन्मस्थली को बहुत मिस कर रही हूँ क्योंकि मेरे सारे शिक्षक भी तो वहीं हैं। 



भावना
24 अगस्त 2010
दिल में छाई उदासी..
बहुत-बहुत आभार
इस पर्व की बहुत सारी शुभकामनाएँ
नेह की गली
मन में खिली अब
आस की कली । R
आस की कली
ना मुरझाये कभी
ना, सूनी गली। B
नेह तुम्हारा
तोड़ बँधन सब
खींच ही लाया । B
न टूटे कभी
आशाओं की कलियाँ
आरज़ू यही । B
तुमको देखा
मिट गई मन से
चिन्ता की रेखा । R
परदेस में
जब याद तू आई
बड़ा रुलाई । B
चिन्ता ने तुम्हें
बना दिया बीमार
मेरे कारण। B
जाँऊगा नहीं
छोड़कर आँचल
माँ तेरा कभी। B
Bhawna
11 अगस्त 2010
हो गए पूरे ४ साल...आइये केक कर रहा है इंतज़ार...
केक आप सबके लिए...
अपना ही केक है, अपने घर में, चिन्ता मत कीजिए नुकसान नहीं देगा...
९ अगस्त २००६ का वो दिन था जब मैंने अपनी पहली पोस्ट डाली थी यानि की मैंने ब्लॉग लिखना शुरू किया था, अब ९ अगस्त को पूरे ४ साल हो गए,पता नहीं कितनी सफलता मिली, पर हॉ एक बड़ा परिवार मिला, मित्र मिले, उनका अथाह स्नेह मिला बस जिंदगी में सबकुछ मिल गया.
आज़ ११ तारीख हो गई लिखना तो ९ को ही चाहती थी, पर व्यस्तता ने हाथों में हथकडियाँ जो डाल दी थी। आप सबके बिना सेलिब्रेशन भी कैसा? अब तो देश भी बदल गया अब युगांडा ने आस्ट्रेलिया की जगह जो ले ली और यहाँ आये भी १ साल कैसे बीत गया पता नहीं चला। आप लोगों का स्नेह यूँ ही बना रहा तो कुछ न कुछ नया तो लेखन में आता ही रहेगा। अभी तो दो ही पुस्तक निकली हैं आगे जल्दी ही २ पुस्तक प्रकाशित करने का प्लान है देखिए कब तक सफलता मिलती है।
मैं और मेरी छोटी बेटी ऐश इंडियन रेस्टोरेंट में गए थे खाना खाने ....उसके बाहर का फोटो.... सूरज की किरणों ने हमारा कैसा श्रृंगार किया है देखिए..... है ना कमाल......
भावना
9 अगस्त 2010
दो मुँह वाला कछुआ...


अरे क्या देख रहे हो भाई मैंने मुंह साफ किया है ...

बहुत थक गया हूँ ...आराम करना चाहता हूँ ...चलिए इन महाशय का हाथ ही सही ...
बड़े प्यार से लिटाये हैं ...

चलना होगा ...दूसरे बच्चों से भी तो मिलना है ना...
बहुत तेज भूख लगी है ...आज पत्ते से ही काम चलता हूँ ...

अरे !ये तो बहुत स्वाद है ...

अरे रुको फोटो ले रहे हो
तो जरा पोज तो बनाने दो ...
Bhawna
3 अगस्त 2010
अनुभूति में...
http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/kamal/bhawna_kunwar.htm
१-
देखी चाँदनी
आँचल सँवारती
२-
खुश तालाब
कमलों की बारात
सच या ख्वाब।
३-
सुबके झील
दिलासा देता हुआ
४-
बार-२ नहाए
शैतान सा कमल
झील शर्माए।
५-
कमल पर
बिखरे पड़े हीरे
भावना
22 मार्च 2010
एक बीज ...
लीजिए जनाब अब पर्थ से वापसी हो गई है सिडनी में, अपने परिवार के बीच, अब यहाँ आकर फिर वही जिंदगी पहले की तरह ...
कभी-कभी दिल कुछ इस तरह भी सोचता ...आप लोग भी देखियेगा उदासी जरूर है... पर ऐसा होता भी है ना... आप लोगों की राय बहुत कीमती है ...
एक बीज
मैंने बोया
छोटे से
टीन के डब्बे में...
गमला खरीद सकूँ
हैसियत न थी...
अंकुर फूटा
मेरा चेहरा खिल उठा
मैं उसे प्यार से सींचती रही
अब वो पौधा बन चुका था ...
मगर ये क्या?
ये अचानक मुरझाने लगा
मेरा दिल काँप उठा
मैं देख नहीं सकती थी
उसे इस तरह मरते हुए ..
आनन-फानन में
खरीद डाला मैंने
एक बड़ा बगीचे वाला घर ...
क्या करती उन आभूषणों का
जो बहुत दिन से
बन्द पड़े थे अलमारी में ...
मैंने पौधे को
मुक्ति दिला दी
उस टीन के टूटे-फूटे डिब्बे से ...
रोप दिया उसे
बड़े बगीचे में
पौधा मुस्करा उठा
लहलहाने लगा, झूमने लगा ...
अनदेखा किया मैंने
डब्बे की दयनीय स्थिति को
लचीला पौधा अब
बलिष्ठ पेड़ बन चुका था
बड़ी-बड़ी शाखायें
मजबूत तना
बहुत सारी पत्तियां
जिसने पूरे घर को
अपनी शाखाओं से
जकड़ कर
धराशायी कर दिया
सीना ताने
अपने मद में चूर
अहं की चादर लपेटे
शान से खड़ा है...
मैं निरीह सी
सड़क पर चल पड़ी
भूखी प्यासी
तूफानी रात में
भटकती रही
आज भी भटक रही हूँ ...
खोजने उस डब्बे को
ताकि माफी माँग सकूँ उससे ...
जिसकी पीड़ा जानकर भी
किया था अनदेखा मैंने
जानती हूँ
ये उसी की आह थी
जो लगी थी मुझे ...
Bhawna
28 फ़रवरी 2010
12 फ़रवरी 2010
बस यूँ ही...
आज मन
कुछ अनमना सा है...
सब कुछ होते हुए भी
कुछ कमी सी ...
मिल रहा है
मेरे सपनों कों
एक साकार रूप ...
जिन सपनों को
टूटते, बिखरते से
बचाया था मैंने
फिर दिया ...
एक मुकम्मल मुकाम
तो फिर आज ...
ये उदासी मुझे
क्यूँ बींध रही है?
क्यूँ आज इन ओठों से
हँसी की जगमगाहट
धुँधली पड़ गई है?
क्यूँ दिल की धड़कन में
हलचल नहीं है?
और क्यूँ
मेरी इन आँखों में...
ठहरी हुई
ये नमी सी है?
हाँ जानती हूँ मैं
मेरी साँसों को
प्रवाह देने वाले
मेरे जीवन साथी
वो तुम ही हो ...
जिसकी
हर पल, हर लम्हा
इन धड़कनों में
कमी सी है ...
भावना कुँअर








