25 अक्तूबर 2006

हिन्दी का परचम लहरायें


सब मिलकर आज, कसम ये खायें
हिन्दी को उच्च स्थान दिलायें ।

लगे प्रचार में हम सब मिलकर
ऐसा ही इक प्रण निभायें ।

पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण
हिन्दी का परचम लहरायें।

इस भाषा के चाहने वालों
यादगार ये दिवस बनायें।

दुनिया भर के हिन्दी भाषी
इसको नत मस्तक हो जायें।
डॉ० भावना कुँअर

4 टिप्‍पणियां:

राकेश खंडेलवाल ने कहा…

चाँद सजा है ज्यों अंबर के माथे की बन बिन्दी
चलो आज संकल्प करें हम
अपनी हर कोशिश ऐसी हो
अखिल विश्व के भाल सजे यह अपनी भाषा हिन्दी

दुर्गेश गुप्त "राज" ने कहा…

भावना जी,
नमस्कार.
हिन्दी के प्रति आपकी भावनाएं पढकर अच्छा लगा. यह दिवस विदेशों
में रह रहे भारत-वंशियों को एक करने में अवश्य सहायक हो सकता
हॆ, लेकिन यहां अखबारों में हिन्दी-दिवस के अवसर पर सम्मान के
समाचार पढकर दु:ख होता हॆ. आप ही बताईए जिस देश की
राष्ट्रभाषा ही हिन्दी हॆ उस देश के नागरिकों द्वारा हिन्दी के नाम
पर सम्मान लेना या देना कहां तक उचित हॆ. ऒर फिर चलो
सम्मान ले भी लिया, लेकिन उसके लिए कुछ करो तो सही.

संभवत: विश्व में भारत ही एक ऎसा देश हॆ जहां उसकी अपनी
राष्ट्रभाषा के लिए सम्मान दिया जाता हॆ, ऒर फिर एक दिन का
समारोह या सप्ताह मनाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री. ऎसा लगता
हॆ जॆसे शहीद-दिवस जॆसे हिन्दी-दिवस को लोग श्रध्दांजलि देकर
वर्षभर के लिए भुला देते हॆं.

क्षमा करें, इस पत्र का आशय किसी की भावनाऒं को आहत
करना न होकर "ईकविता" के माध्यम से हिन्दीप्रेमियों तक अपने दर्द को व्यक्त
करना हॆ.

शुभकामनाओं सहित,

सादर,

दुर्गेश गुप्त "राज"

प्रियंकर ने कहा…

भावना जी ,
कविता के भाव अच्छे लगे . आपकी इस कामना में हम सब का स्वर शामिल है . समय मिले तो मेरे ब्लॉग पर भी तशरीफ़ लाएं आपको कुछ अच्छी कविताएं पढने को मिलेंगीं.

डॉ० भावना ने कहा…

राकेश जी, दुर्गेश जी,प्रियंकर जी रचना पसन्द आई उसके लिये शुक्रिया । दुर्गेश जी आपका कहना काफी हद तक सही है हम चाहे तो बहुत कुछ कर सकते हैं। प्रियंकर जी आपकी साईट भी देखी बहुत सुन्दर रचनायें पढने को मिलीं।

डॉ० भावना