6 सितंबर 2011

'द सन्डे- इन्डियन 'ने कहा - सात समंदर पार, हिंदी की अलमबरदार...

'द सन्डे- इन्डियन ' वीकली में वर्ष २०११ की सर्वश्रेष्ठ महिला लेखिकाओं का चयन किया गया जिसमें लगभग ५०० प्रतिभागी थे और १११ को चुना गया उनमें सौभाग्य से मुझे भी स्थान मिला जो वास्तव में मेरे लिए बहुत खुशी की बात है और ये खुशी मैं अपने प्रिय मित्रों के बिना कैसे मना सकती हूँ तो लीजिए ये केक खाईये और अपना स्नेह मुझे दीजिए 
इसे आप इस लिंक पर देख सकते हैं...


http://thesundayindian.com/hi/story/indian-women-writers-in-abroad/7/7336/


















आज


बहुत दिनों बाद...


थककर


गहरी नींद


सोई है पीड़ा...


शायद !


अब कभी


न उठने के लिए...














Bhawna

1 सितंबर 2011

मेरा जिगरी दोस्त



















मेरे सबसे करीब
मेरा जिगरी दोस्त
अँधेरा...
अक्सर मेरे पास 
आता है
और
छिपकर बैठ जाता है
मेरे मन के एकल कोने में...
घण्टों मुझसे बातें करता है
अकेले में
जब कोई नहीं होता...
सुबह से शाम
कैसे होती है
पता ही नहीं चलता...
और फिर अचानक...
आहट सुन
संध्या की आहट सुन
दूर कहीं छिप जाता है
झाडियों के पीछे...
और इंतज़ार करता है
सुबह होने का
फिर...
चिड़ियों की चहचहाट सुन
दौड़कर आता है
और खोज़ता है
मेरे मन का वही कोना
छिपकर बैठ जाने के लिए...


Bhawna

22 अगस्त 2011

यादों के सहारे ...


9 अगस्त २००6 को मैंने ब्लॉग लिखना शुरू किया था और मेरी सबसे पहली पोस्ट रक्षा बंधन थी, पूरे 5 साल हो गए हैं ये सफर अभी भी जारी है कब तक रहेगा नहीं पता, बहुत सी अड़चनें आईं कभी रूका, कभी धीमा हुआ मगर फिर मित्रों का स्नेह उनका अपनापन इस सफर को पूरा करने लिये मिला बस फिर क्या फिर से धीमी गति से ही सही निकल पड़े हैं मंजिल की तलाश में थोड़ा देर हो गई सेलीब्रेशन में... अगस्त में हालात कुछ अजीब से हो जाते हैं मिले जुले भावों से घिरी मैं प्रयास करती हूँ कि उन यादों से बाहर निकलूँ जो दिल को झंझोड कर रख देती हैं पर ऐसा हो नहीं पाता एक मासूम आते-आते रह गया थाअगस्त महीने में जो आज १३ साल का होता... जिसका नाम भी दे चुके थे नाम था ईषाण बस डॉ० की लापरवाही उसको बचा नहीं पाई वरना वो भी इस संसार को देख पाता ...मेरी ये रचना मेरे बेटे ईषाण को समर्पित है जो कभी भी मेरी यादों से, दिल दे दूर नहीं हो सकता ये रचना पहले भी बलॉग पर दी जा चुकी है...


















कल जब वो
मेरी गोद में आया,
बहुत मासूम !
बहुत कोमल !
इस संग दिल दुनिया से
अछूता सा,
शान्त!
बिल्कुल शान्त !
ना कोई धड़कन
ना ही कोई हलचल।
मेरा सलौना,
मेरा नन्हा,
बिना धड़कन के मेरी बाहों में।
नहीं भूल पाती
उसका मासूम चेहरा,
नहीं भूल पाती
उसका स्पर्श।
बस जी रहीं हूँ
उसकी यादों के सहारे।
देखती हूँ
हर रात उसका चेहरा
टिमटिमाते तारों के बीच
और जब भी कोई तारा
ज्यादा प्रकाशमान होता है,
लगता है मेरा नन्हा
लौट आया है
तारा बनकर
और कहता है-
"
मत रो माँ मैं यहीं हूँ
तुम्हारे सामने
मैं रोज़ देखा करता हूँ तुम्हें
यूँ ही रोते हुये
मेरा दिल दुखता है माँ
तुम्हें यूँ देखकर
मैं तो आना चाहता था,
किन्तु नहीं आने दिया
एक डॉक्टर की लापरवाही ने मुझे
मिटा ही डाला मेरा वज़ूद
इस दुनिया से,
पर माँ तुम चिन्ता मत करो
मैं यहाँ खुश हूँ
क्योंकि मैं मिलता हूँ रोज़ ही तुमसे
तुम भी देखा करो मुझे वहाँ से।
नहीं छीन पायेगी ये दुनिया
अब कभी भी
ये मिलन हमारा…




Bhawna

14 अगस्त 2011

वतन से दूर हूँ लेकिन, अभी धड़कन वहीं बसती






      


















वतन से दूर हूँ लेकिन


अभी धड़कन वहीं बसती


वो जो तस्वीर है मन में


निगाहों से नहीं हटती।




बसी है अब भी साँसों में


वो सौंधी गंध धरती की


मैं जन्मूँ सिर्फ भारत में


दुआ रब से यही करती।




बड़े ही वीर थे वो जन


जिन्होंने झूल फाँसी पर


दिला दी हमको आजादी।


नमन शत-शत उन्हें करती।


Bhawna

8 अगस्त 2011

मित्रता दिवस पर मेरी ओर से सभी मित्रों को हार्दिक शुभकामनाएँ









1.
अकेलापन
खलता नहीं अब
मित्र जो संग।







2.
विश्वास डोर
बाँधे सच्ची मित्रता
चारों ही ओर।

3.
छोड़े न हाथ
दुख हो चाहे सुख
मित्र का साथ।


4.
खुशबू बन
बिखरे चहुँ ओर
ये मित्रगण।

5.
ज्यूँ मित्र मिले
मन-उपवन में
फूल से खिले।

6.
बस था साथ
दुख की डगर में
दोस्त का हाथ।

7.
मन के दीए
जब मित्रों ने छुए
रोशन हुए।

8.
स्वर्ग आभास
टूटती साँसों संग
मित्र हो पास।

9.
साँसों में बसी
मित्रता की सुगंध
पनपे छंद।

10.
हाथ है तंग
रिश्ते नाते अपंग
है मित्र संग।


Bhawna

19 जुलाई 2011

"माँ का दर्द...


















क्या लिखूँ?
समझ नहीं आता
कलम है जो रूक-रूक जाती है...
और आँसू
जो थमने का नाम ही नहीं लेते...
एक हूक सी
मन में उठती है...
और आँसुओं का सैलाब फैलाकर
सिमट जाती है
अपने दायरे में...
नश्तर चुभोती है
और दर्द को दुगना कर
छिपकर एक कोने में बैठ जाती है
अगली बार उठने के लिए...
क्या दर्द की ये लहर
नहीं झिंझोड़ देती
हर माँ का अस्तित्व?
जिनकी नन्हीं जान
दूर हो जाती है उनके कलेजे से...
क्या अनचाहा दर्द
बन नहीं जाता माँ की तकदीर?
क्या जीना मुहाल नहीं हो जाता?
और क्या उसका सपना
आँखों को धुँधला नहीं कर जाता?
कैसे रहती है वो जिंदा
बस वही जानती है...
लोगों का क्या
वो तो सांत्वना देकर
चले जाते हैं अपनी राह...
पर माँ अकेली एकदम तन्हाँ
किसी उम्मीद के सहारे
बिना किसी से कुछ कहे
जी जाती है अपना पूरा जीवन...


Bhawna

1 जुलाई 2011

एक फूल की आत्मकथा...











एक फूल

जो हमेशा बनाए रखता था
एक घेरा अपने चारों ओर
उदासी का घेरा...
फिर न जाने कहाँ से एक माली आया
और करने लगा देखभाल...
फूल सकुचाता रहा
मगर माली के प्यार
उसके दुलार
उसके अपनेपन के आगे
फूल ने भी कर दिया आत्मसमर्पण ...
तोड़ डाला वो उदासी का घेरा
लगा मुस्कराने, खिलखिलाने
जीवन जीने की ललक,
साँसे लेने का साहस,
न जाने उसमें कैसे आ गया !
अब चारों तरफ
प्यार,दुलार,अपनापन पाकर
जी उठा फिर से...
पर ये क्या!
अचानक क्या हुआ इस माली को...
एक ही झटके में
ऊखाड़ डाला जड़ से...
पर मासूम फूल उदास नहीं हुआ
मुस्कराता रहा...
बस यही सोचकर
कि कुछ समय के लिए ही सही
उसने भी पाया था अपनापन,प्यार,दुलार...
पर नहीं समझ पाया
इतने बड़े बदलाव का कारण
क्या ये माली की अपनी सोच थी
या फिर वो भटक गया था
किसी की बातों से...
जो सोच भी नहीं सका
साथ बिताए वो खूबसूरत पल
क्या कभी याद नहीं आयेगा
उस फूल का मासूम चेहरा?
और क्या अब कोई फूल
किसी माली को देखकर
तोड़ पायेगा अपनी उदासी का घेरा
पैदा कर पायेगा अपने अन्दर
जीने की चाह
शायद नहीं
क्योंकि उदासी के बाद
मिलने वाला प्यार
कभी कोई कहाँ भूल पाता है
हाँ मर जरूर जाता है जीते जी
और छोड़ देता है साँसे
मंद-मंद मुस्कराते हुए
अपने माली के लिए...


Bhawna

13 जून 2011

मेरा घर


डॉ भावना

आई जून की भरी दुपहरी

छाया देता भाये घर।


नीम -निबौंली से अक्सर

बने बिछौना मेरा घर।


चीं -चीं चिड़िया की बोली से

चहका रहता मेरा घर।

हम यहाँ मिल जुलकर रहते

खिल-खिल करता मेरा घर ।
-0-

24 मई 2011

वीणा और लोक गंगा में हाइकु



वीणा मासिकश्री मध्यभारत हिन्दी साहित्य सभा , इन्दौर की  हिन्दी की एक मात्र सबसे पुरानी वह पत्रिका है जो  1927 से अब तक निरन्तर प्रकाशित हो रही है ।इस पत्रिका ने समभाव से हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं और सभी रचनाकारों को समान महत्त्व दिया है । दिसम्बर 2010 के अंक में डॉ भावना कुँअर के 28 हाइकु दिए गए हैं । सम्भवत इतने हाइकु पहली बार दिए हैं।इसी क्रम में लोकगंगा मासिक देहरादून ने भी अपने जनवरी 2011 के अंक मे  डॉ भावना कुँअर के छह हाइकु दिए गए हैं ।  हाइकु जगत में इसे उपलब्धि ही कहा जाएगा । सभी शुभचिन्तकों की ओर से हार्दिक बधाई !                                                                                                                                     रामेश्वर काम्बोज

15 मई 2011

"खुशी के फूल"





उदंती पत्रिका के जनवरी 2010 अंक में "खुशी के फूल" नाम से मेरे २० हाइकु आए हैं जो मेरे लिए बहुत खुशी की बात है,इस पत्रिका में हाइकु का प्रकाशन इसी अंक से शुरू किया गया है । ये सब मेरे पाठको,सहयोगियों के कारण ही संभव हुआ है आप सबका स्नेह यूँ बना रहे यही मेरी ईश्वर से कामना है...


























Bhawna

वस्त्र-परिधान-अंक-68


वस्त्र-परिधान-अंक-68[वस्त्र-मंत्रालय भारत सरकार की पत्रिका] में मेरे हाइकु। इस पत्रिका में हाइकु का प्रकाशन इसी अंक से शुरू किया गया है ।

3 मई 2011

गवाक्ष में कुछ इस तरह....

बुधवार, ३ नवम्बर २०१०
गवाक्ष – नवंबर 2010

“गवाक्ष” ब्लॉग के माध्यम से हम हिन्दी ब्लॉग-प्रेमियों को हिन्दी/पंजाबी के उन प्रवासी लेखकों/कवियों की समकालीन रचनाओं से रू-ब-रू करवाने का प्रयास करते आ रहे हैं जो अपने वतन हिन्दुस्तान से कोसों दूर बैठकर अपने समय और समाज के यथार्थ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर रहे हैं। “गवाक्ष” में अब तक विशाल (इटली), दिव्या माथुर (लंदन), अनिल जनविजय (मास्को), देवी नागरानी(यू।एस.ए.), तेजेन्द्र शर्मा(लंदन), रचना श्रीवास्तव(लंदन), पूर्णिमा वर्मन(दुबई), इला प्रसाद(यू एस ए), भगत धवन (डेनमार्क), चाँद शुक्ला (डेनमार्क), वेद प्रकाश ‘वटुक’(यू एस ए), रेखा मैत्र (यू एस ए), तनदीप तमन्ना (कनाडा), प्राण शर्मा (यू के), सुखिन्दर (कनाडा), सुरजीत(कनाडा), डॉ सुधा धींगरा(अमेरिका), मिन्नी ग्रेवाल(कनाडा), बलविंदर चहल (न्यूजीलैंड), बलबीर कौर संघेड़ा(कनाडा), शैल अग्रवाल (इंग्लैंड), श्रद्धा जैन (सिंगापुर), डा. सुखपाल(कनाडा), प्रेम मान(यू.एस.ए.), (स्व.) इकबाल अर्पण, सुश्री मीना चोपड़ा (कनाडा), डा. हरदीप कौर संधु(आस्ट्रेलिया) आदि की रचनाएं और पंजाबी कथाकार-उपन्यासकार हरजीत अटवाल के उपन्यास “सवारी” के हिंदी अनुवाद की तीसवीं किस्त आपने पढ़ीं। “गवाक्ष” के नवंबर 2010 अंक में प्रस्तुत हैं - डा. भावना कुँअर(आस्ट्रेलिया) की कविताएं तथा हरजीत अटवाल के धारावाहिक पंजाबी उपन्यास “सवारी” की इकत्तीसवीं किस्त का हिंदी अनुवाद…

आस्ट्रेलिया(सिडनी) से
डा. भावना कुँअर की कविताएँ

॥एक॥
दीये की व्यथा
(दीपावली पर विशेष)

शाम के वक्त
घर लौटते हुए
चौंका दिया मुझे एक
दर्द भरी आवाज़ ने
मैं नहीं रोक पाई स्वयं को
उसके करीब जाने से
पास जाकर देखा तो
बड़ी दयनीय अवस्था में
पड़ा हुआ था एक "मिट्टी का दीया"
मैंने उसको उठाकर
अपनी हथेली पर रखा
और प्यार से सहलाकार पूछा
उसकी कराहट का मर्म?
उसकी इस अवस्था का जिम्मेदार?
वह सिसक पड़ा
और टूटती साँसों को जोड़ता हुआ -सा
बहुत छटपटाहट से बोला-
मैं भी होता था बहुत खुश
जब किसी मन्दिर में जलता था
मैं भी होता था खुश जब
दीपावली से पहले लोग मुझे ले जाते थे अपने घर
और पानी से नहला-धुलाकर
बड़े प्यार से कपड़े से पौंछकर
सजाते थे मुझे तेल और बाती से
और फिर मैं
देता था भरपूर रोशनी उनको
झूमता था अपनी लौ के साथ
करता था बातें अँधियारों से
जाने कहाँ-कहाँ की मिट्टी को
एक साथ लाकर
कारीगर देता था एक पहचान हमें
"दीये की शक्ल"
और हम सब मिलजुलकर
फैलाते थे एक सुनहरा प्रकाश
पर अब
हमारी जगह ले ली है
सोने, चाँदी और मोम के दीयों ने
अब तो दीपावली पर भी लोग दीये नहीं
लगातें हैं रंग बिरंगी लड़ियाँ
और मिटा डाला हमारा अस्तित्व
एक ही पल में
तो फिर अब भी क्यों रखा है
नाम "दीपावली" यानी
दीयों की कतार?
आज फेंक दिया हमें
इन झाड़ियों में
तुम आगे बढ़ोगी
तो मिलेंगे तुम्हें मेरे संगी साथी
इसी अवस्था में
अपनी व्यथा सुनाने को
पर तुमसे पहले नहीं जाना किसी ने भी
हमारा दर्द, हमारी तड़प
आज वही भुला बैठे हैं हमें
जिन्हें स्वयं जलकर
दी थी रोशनी हमने
0

॥दो॥
आँखें जाने क्यों

आँखें जाने क्यों
भूल गई पलकों को झपकना...
क्यों पसंद आने लगा इनको
आँखों में जीते-जागते
सपनों के साथ खिलवाड़ करना …
क्यों नहीं हो जाती बंद
सदा के लिए
ताकि ना पड़े इन्हें किसी
असम्भव को रोकना ।
०
॥तीन॥
स्याह धब्बे ...

आँखों के नीचे
दो काले स्याह धब्बे ...

आकर ठहर गए

और नाम ही नहीं लेते जाने का...
न जाने क्यों उनको
पसंद आया ये अकेलापन।
0

॥चार॥
दस हाइकु

1-भटका मन
गुलमोहर वन
बन हिरन।

2-नन्ही चिरैया
गुलमोहर पर
फुदकी फिरे।

3-जुगनुओं से
गुलमोहर वृक्ष
हैं झिलमिल।

4-था पल्लवित
मन मेरा -देखा जो
गुलमोहर।

5-मखमली सा
शृंगार किये,खिले
गुलाबी फूल।

6-झूम गाते हैं
खेत खलिहान भी
आया बंसत।

7-नटखट -सी
चंचला,लुभावनी
ऋतु बसन्त ।

8-दुल्हन बनी
पृथ्वी रानी,पहने
फूलों के हार।

9-खेत है वधू
सरसों हैं गहने
स्वर्ण के जैसे ।

10-रंग बिरंगी
तितलियों का दल
झूमता फिरे ।

00
डॉ० भावना कुँअर
शिक्षा - हिन्दी व संस्कृत में स्नातकोत्तर उपाधि, बी० एड०, पी-एच०डी० (हिन्दी)
शोध-विषय - ' साठोत्तरी हिन्दी गज़लों में विद्रोह के स्वर व उसके विविध आयाम'।
विशेष - टेक्सटाइल डिजाइनिंग, फैशन डिजाइनिंग एवं अन्य विषयों में डिप्लोमा।
प्रकाशित पुस्तकें - 1. तारों की चूनर ( हाइकु संग्रह)
2. साठोत्तरी हिन्दी गज़ल में विद्रोह के स्वर
प्रकाशन - स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानी, गीत, हाइकु, बालगीत, लेख, समीक्षा, आदि का अनवरत प्रकाशन। अनेक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय अंतर्जाल पत्रिकाओं में रचनाओं एवं लेखों का नियमित प्रकाशन, अपने ब्लॉग http://dilkedarmiyan.blogspot.com पर अपनी नवीन-रचनाओं का नियमित प्रकाशन तथा http://drbhawna.blogspot.com/ पर कला का प्रकाशन अन्य योगदान
स्वनिर्मित जालघर - http://drkunwarbechain.blogspot.com/
http://leelavatibansal.blogspot.com/
सिडनी से प्रकाशित "हिन्दी गौरव" पत्रिका की सम्पादन समिति में
संप्रति - सिडनी यूनिवर्सिटी में अध्यापन
अभिरुचि- साहित्य लेखन, अध्ययन,चित्रकला एवं देश-विदेश की यात्रा करना।
सम्पर्क - bhawnak2002@yahoo.co.in
प्रस्तुतकर्ता सुभाष नीरव पर ५:४७ अपराह्न
लेबल: कविताएं
12 टिप्पणियाँ:

सहज साहित्य ने कहा…
'दीये की व्यथा' में कथ्य का नयापन और नए ढग से उसकी प्रस्तुतिमें डॉ भावना जी का गहन चिन्तन-मनन प्रतिबिम्बित होता है।'आँखे जाने क्यों' और 'स्याह धब्बे' अन्तस की व्यथा का सूक्ष्म चित्रण है । भाषा पर गहरी पकड़ पाठक को छोटी सी कविता में भी भाव की गहन अनुभूति करा देती है। हाइकु तो भावना जी का प्रिय छन्द है । 17 वर्ण के इस लघु छन्द में उनकी भाषा -साधना के दर्शन होते हैं। गुलमोहर और वसन्त ॠतु पर का मनोरम चित्रण उन्हें श्रेष्ठ हाइकुकारों की श्रेणी में रखता है । बिम्ब विधान का सफल निर्वाह उनके हाइकुओं को और प्रभावशाली बनाता है । कम से कम उन कलमकारों से उनके हाइकु कहीं बेहतर हैं , जो पिछले दो दशकों से ख़लीफ़ा होने का दम भरते रहे हैं ।
३ नवम्बर २०१० ७:०१ अपराह्न

भगीरथ ने कहा…
सभी हायकू सुंदर
३ नवम्बर २०१० ७:४४ अपराह्न

PRAN SHARMA ने कहा…
BHAVNA KEE KAVITAAON MEIN MUJHE
" FRESHNESS " MAHSOOS HUEE HAI.
SUBHASH JEE , AESE RACHNAKAR KEE
SASHAKT KAVITAAYEN PADHWAKAR AAPNE
MUJH JAESE KAVITA PREMI PATHAK
PAR UPKAAR KIYA HAI .KRIPYA MEREE
BADHAEE AUR SHUBH KAMNA BHAVNA JEE
KO PAHUNCHAAEEYEGA .
३ नवम्बर २०१० ८:४० अपराह्न

बलराम अग्रवाल ने कहा…
भावना की सभी कविताएँ विशिष्ट हैं, लेकिन उनकी प्रथम कविता 'दीये की व्यथा' उस समूचे समाज की व्यथा है जों नवीन तकनीक, पूँजी और बाज़ार के बढ़ते दबावों के चलते पीछे धकेल दिया जा रहा है। 'सभी को साथ लेकर' चलने का चलन आज का आदमी भूल-सा गया है। बेहतरीन सामयिक भावाभिव्यक्ति।
४ नवम्बर २०१० ७:५२ अपराह्न

rachana ने कहा…
bhavna ji ki kavitayen jahan bhi milti hai me jaroor padhti hoon .
bahut gahre bhav liye huye kabhi muskati hai kabhi rulati hai inki kavitayen
bahut bahut badhai
saader
rachana
४ नवम्बर २०१० ९:०२ अपराह्न

KAHI UNKAHI ने कहा…
भावना जी के हाइकू को सुन्दर हैं ही , उनकी कविता ‘ स्याह धब्बे ’...बहुत अच्छी...।
आँखों के नीचे के काले धब्बे सभी के होते हैं , पर उनका यूँ भावपूर्ण अभिव्यक्तिकरण करने के लिए वे बधाई की पात्र हैं...।

प्रियंका गुप्ता
५ नवम्बर २०१० ८:५६ पूर्वाह्न

रूपसिंह चन्देल ने कहा…
डॉ. भावना कुंअर की ’दीये की व्यथा’ ने सच ही व्यथित कर दिया. दीपावली के दिन इस सच को कितनी ही बार महसूस किया, भावना जी ने शब्द दिए---आभार.

चन्देल
६ नवम्बर २०१० ८:५१ पूर्वाह्न

ashok andrey ने कहा…
bhavna jee ki inn sundar rachnaon ke liye badhai deta hoon
६ नवम्बर २०१० ११:४२ पूर्वाह्न

उमेश महादोषी ने कहा…
सभी रचनाएँ भावपूर्ण हैं। प्रभावित करती हैं।
....... उमेश महादोषी
७ नवम्बर २०१० ४:२६ अपराह्न

सुरेश यादव ने कहा…
भावना जी की कवितायें पढ़ने का अवसर गवाक्ष ने दिया ,नीरव जी को हार्दिक धन्यवाद |संवेदना में ताज़गी भरती सभी कविताओं के लिए भावना जी को हार्दिक बधाई |हाइकु भी सुन्दर और कसे हुए हैं |
९ नवम्बर २०१० ८:५६ अपराह्न

डॉ. हरदीप संधु ने कहा…
भावना जी की ’दीये की व्यथा' बहुत अच्छी लगी ।
सभी हाइकु एक से बढ़कर एक हैं ।
अक्षर-अक्षर दिल को छू जाने वाला है।
भावना जी को हार्दिक बधाई हो!
१२ नवम्बर २०१० ३:५५ अपराह्न

अनुपमा पाठक ने कहा…
सुन्दर रचनायें!




Bhawna

22 अप्रैल 2011

आसमान को छू लें

 भावना 


आओ बच्चों खेलें हम

आसमान को छू ले हम ।


थाली में जो तारे हैं
वे चमकीले - प्यारे हैं ।

क्यों न इनको ले लें हम
कर दें ये अँधियारा कम।