27 जुलाई 2007

अनभिज्ञ चिड़िया


एक चिड़िया
आयी फुदकती सी
नाज़ुक सी, चंचल सी
अपनी मस्ती में मस्त सी
बेपरवाह
स्वछन्द
अनभिज्ञ सी
अपनी सपनों की दुनिया में
खोई सी
अचानक रुकी
डरी, सहमी
भय से
विस्फरित आँखें
एक झटका सा लगा
और कदम वहीँ रुक गए
साहस जुटाया
पर धैर्य टूट गया
बचना चाहा
पर गिर पड़ी
साँसे बिखरने लगीं
शरीर बेज़ान होने लगा
पल भर में ही
सारी चंचलता, कोमलता
नष्ट हो गयी
जुटा पायी साहस
उस दीर्घकाय परिंदे से
खुद को बचाने का

डा भावना

20 जुलाई 2007

तभी तुम्हें लिक्खी है पाती


अब ये दुनिया नहीं है भाती
तभी तुम्हें लिक्खी है पाती।

खून-खराबा है गलियों में,
छिपे हुए हैं बम कलियों में,
है फटती धरती की छाती,
तभी तुम्हें लिक्खी है पाती।

उज़ड़ गये हैं घर व आँगन,
छूट गये अपनों के दामन,
यही देख के मैं घबराती,
तभी तुम्हें लिक्खी है पाती।

है बड़ी बेचैनी मन में,
नफ़रत फैली है जन-जन में,
नींद भी अब तो नहीं है आती,
तभी तुम्हें लिक्खी है पाती।



डॉ० भावना

8 जुलाई 2007

यादों के सहारे


कल जब वो
मेरी गोद में आया,
बहुत मासूम !
बहुत कोमल !
इस संग दिल दुनिया से
अछूता सा,
शान्त!
बिल्कुल शान्त !
ना कोई धड़कन
ना ही कोई हलचल।
मेरा सलौना,
मेरा नन्हा,
बिना धड़कन के मेरी बाहों में।
नहीं भूल पाती
उसका मासूम चेहरा,
नहीं भूल पाती
उसका स्पर्श।
बस जी रहीं हूँ
उसकी यादों के सहारे।
देखती हूँ
हर रात उसका चेहरा
टिमटिमाते तारों के बीच
और जब भी कोई तारा
ज्यादा प्रकाशमान होता है,
लगता है मेरा नन्हा
लौट आया है
तारा बनकर
और कहता है-
"मत रो माँ मैं यहीं हूँ
तुम्हारे सामने
मैं रोज़ देखा करता हूँ तुम्हें
यूँ ही रोते हुये
मेरा दिल दुखता है माँ
तुम्हें यूँ देखकर
मैं तो आना चाहता था,
किन्तु नहीं आने दिया
एक डॉक्टर की लापरवाही ने मुझे
मिटा ही डाला मेरा वज़ूद
इस दुनिया से,
पर माँ तुम चिन्ता मत करो
मैं यहाँ खुश हूँ
क्योंकि मैं मिलता हूँ रोज़ ही तुमसे
तुम भी देखा करो मुझे वहाँ से।
नहीं छीन पायेगी ये दुनिया
अब कभी भी
ये मिलन हमारा…

5 जुलाई 2007

कैसे मुस्काया अमलतास...



1
झुलसा तन
देख अमलतास
खिला था मन।


2
दुख सदृश
सहे भीषण गर्मी
अमलतास।

3
वर्षा ‍ऋतु में
फूटे अंकुर, खिला
अमलतास।

4
आया यौवन
अमलतास वृक्ष
लगा झूमने।

5
बिछा कालीन
बुनकर जो बने
अमलतास।

6
नवयौवना
बनाये उबटन
पीत पुष्प से।

7
पीली चूनर
पहन इतराये
अमलतास।

8
रिझाने लगा
सोने के गहनों से
अमलतास।

9
उछले खूब
पंछियों के समूह
खिले जो फूल।

10
छनकी धूप
अमलतास तले
स्वर्ण समान।

11
घिरे हुये हैं
अमलतास वृक्ष
पंछी दल से।

12
था प्रातःकाल
अलसाया ही रहा
अमलतास।

13
चहकी धूप
हंसे अमलतास
बच्चों समान।

28 जून 2007

रिश्तों की खातिर



बहुत दुखी हूँ मैं
इन रिश्ते नातों से
जो हर बार ही दे जाते हैं-
असहनीय दुःख,
रिसती हुई पीडा,
टूटते हुए सपने,
अनवरत बहते अश्क
और मैंने---
मैंने खुद को मिटाया है
इन रिश्तों की खातिर।
पर इन्होंने सिर्फ--
कुचला है मेरी भावनाओं को,
रौंद डाला है मेरे अस्तित्व को,
छलनी कर डाला है मेरे दिल को।
लेकन ये मेरा दिल है कोई पत्थर नहीं---
अनेक भावनाओं से भरा दिल
इसमें प्यार का झरना बहता है,
सबके दुःखों से निरन्तर रोता है,
बिलखता है, सिसकता है
और उनको खुशी मिले
हरदम यही दुआ करता है।
पर उनका दिल ,दिल नही
पत्थरों का एक शहर है
जिसमें कोई भावनाएं नही
बस वो तो तटस्थ खडा है
पर्वत की तरह
उनके दामन को बहारों से भर दो
तो भी उनको कोई फर्क नहीं पडता।
मैं हर बार हार जाती हूँ इन रिश्तों से
पर,फिर भी हताश नहीं होती
फिर लग जाती हूँ इनको निभाने में
इस उम्मीद से कि कभी तो सवेरा होगा
कभी तो ये पत्थरों का शहर
भावनाओं का शहर होगा
जिसमें मेरे लिए भी
अदना सा ही सही
पर इक मकां होगा।
डॉ० भावना

28 मई 2007

ऊँचे सपने


एक चिड़िया
हमेशा मेरे कमरे में आया करती
दीवारों पर उछल-कूद करती
और फिर एक ऊँची
और लम्बी उड़ान भरती
फिर लुप्त हो जाती।
उसकी इस क्रीड़ा को
मैं समझ नहीं पाती।
वह रोज़ आती
और इसी प्रक्रिया को दोहराती।
आज़ भी हमेशा की तरह
देखा मैंने उसको
आते हुए
उसी स्वच्छन्दता से
उछलते-कूदते हुए
और फिर
फिर उसने उड़ान भरी,
आज़ भी
उसकी उड़ान में
हमेशा की तरह
कोई ठहराव न था
चाह थी
कुछ और ऊँचाई पाने की
अभी कुछ दूर ही
उड़ पायी थी वो
खुली खिड़की की ओर,
कि अचानक देखा मैंने
उसकी उड़ान में
यह ठहराव कैसा?
हाँ एक न मिटने वाला ठहराव
क्योंकि
अपनी उड़ान की तीव्रता में
नहीं देख पायी वो
खिड़की पर लगे शीशे को,
नहीं देख पायी
अपनी छवि उस चमक में,
लुप्त हो गयी उसकी उड़ान
दूर कहीं अंतरिक्ष में
हमेशा के लिये।

23 मई 2007

रूह से मुलाकात



मेरी मुलाकात
एक रूह से हुई
एक पवित्र और सच्ची रूह से
मैंने देखा उसको तड़फते हुये
और भटकते हुये ।
मैंने महसूस किया
उसकी धड़कन को,
मैंने पूछा-
“क्या मैं ही तुम्हें देख सकता हूँ?”
उसने कहा- “हाँ सिर्फ तुम ही-
मुझे सुन सकते हो,
देख सकते हो
और महसूस कर सकते हो”
मैंने पूछा-
“लेकिन तुमने शरीर क्यों छोड़ा?
वो तड़फ उठी,
उसकी आँखों से नफ़रत बरसने लगी,
मैं सहम गया !
वो मेरे करीब आकर बैठ गयी
और बोली-
“मुझे नफ़रत है उस दुनिया से
जिसमें जीवन शरीर से चलता है
उस दुनिया में बस छल है
कपट है, फरेब है।
मैंने भी फ़रेब खाया है
उस दुनिया से
तो छोड़ दिया शरीर
उसी संसार में
और ये देखो-
ये है रूहों का संसार
ये बहुत अच्छा है तुम्हारी दुनिया से।”
मैं अपलक उसको देखता रहा
बरबस मेरी आँखे छलक पड़ीं
क्योंकि-
मैंने भी खाया था धोखा
उसी दुनिया से।
हम दोनों की एक ही कहानी थी,
तभी शायद मैं उसको
सुन सकता था, और महसूस कर सकता था।
मैं गहरे सोच में डूब गया
रूह मेरे अन्तर्मन को पढ़ चुकी थी
क्योंकि वो रूह थी
एक सच्ची और पवित्र रूह
उसने आगे बढ़कर
मेरी ओर हाथ बढ़ाया
मैं भी इन्कार न कर सका
अपना हाथ उसके हाथ में दे दिया
और अचानक
मेरे पैरों के नीचे से जमीन निकल गयी
और मैं
पहाड़ी से नीचे गिरा
मैंने देखा था अपना शरीर
गहरी खाई में,
निर्ज़ीव शरीर
और मैं उस रूह के साथ
उड़ता चला गया
एक खूबसूरत दुनिया में
जहाँ छल, कपट
और फरेब नहीं होता।

9 मई 2007

लीजिये आप लोगों की फरमाईश पर प्रगीत कुँअर जी द्वारा लिखी एक कहानी "जोशी जी"

जोशी जी


शायद कम ही लोग ऐसे होते होंगे जो जोशी जी जैसा सामर्थ्य रखते हैं। जोशी जी आज़ भी ऑफिस में चर्चा का विषय बने रहते हैं। कभी-२ हँसी की चुटकियों के बीच उन्हें याद किया जाता तो कभी मुश्किल क्षणों में भी जब सारा ऑफिस रात-रात तक काम करता नज़र आता। जोशी जी थे ही ऐसी हस्ती, नहीं-नहीं हैं ही ऐसी हस्ती जो जहाँ भी जायें अपनी यादों की छाप सदा के लिये छोड़ जायें। आप भी सोच रहे होंगे कि कब से मैं जोशी जी-जोशी जी कहे जा रहा हूँ, आखिर कौन हैं ये जोशी जी? ऐसी क्या बात है उनकी शख्सियत में?
अच्छा ठीक है मैं अब आपको उस लीक पर लेकर आता हूँ जहाँ से आपको उनसे परिचय कराया जा सके। मगर उसके लिये आपको मेरे साथ वर्तमान से कुछ पीछे चलना होगा। जब एक कम्पनी में एक नवयुवक के रूप में मैंने अपनी शिक्षा पूर्ण करने के बाद Accounts Officer के रूप में ज्वाईन किया था। बहुत ही अविस्मरणीय था वह पहला ऑफिस का दिन जब मैं एक अनुभवहीन बालक के समान हाथ मे नया ब्रीफकेस लेकर ऑफिस में प्रवेश कर रहा था। ऑफिस में प्रवेश होते ही सबसे पहले अधेड़ उम्र की रिशेपस्निस्ट से सामना होते ही 'गुड मॉर्निग मैड़म' से अपनी ज़ुबान को खोला। बदले में रिशेपस्निस्ट ने भी मुस्करा कर “सर वेलकम टू अवर ग्रुप” से उत्तर दिया। इण्टरव्यू के तीन चार चरणों के कारण वह पहले से ही मुझसे परिचित हो चुकी थी। मैंने औपचारिकतावश उनसे अपने डिमार्टमेंट का रास्ता पूछा और उन्होंने सिक्योरिटी गार्ड को मेरे साथ जाने का इशारा किया। गार्ड मुझे लिफ्ट के रास्ते पाँचवीं मंजिल पर ले गया और लिफ्ट का दरवाज़ा खुलते ही मुझे बताया कि यही आपका डिपार्टमेंट है और वापिस लौट गया। सामने ही जी० एम० : मिस्टर जोशी जी के नाम का बोर्ड लगा था मैंने सीधे ऊपर जाकर दरवाज़ा नॉक किया और 'मे आइ कम इन सर' ? कहकर धीरे से दरवाज़ा खोला तो सामने जोशी जी कम्प्यूटर पर किसी कार्य में व्यस्त नज़र आये और उन्होंने 'कम इन' कहकर अन्दर आने का सकेंत दिया और मुझे उनके सामने रखी विशालकाय मेज़ के सामने रखी कुर्सी पर बैठने को कहा।
जोशी जी का अनुभव उनके चेहरे से झलक रहा था। उनकी आयु तकरीबन साठ के आसपास थी। मेरे बैठते ही उन्होंने अपने काम को रोककर मेरी ओर मुख़ातिब होकर मुझसे एक संक्षिप्त परिचय पूछा और कहा कि-“हाँ सेठ जी (हमारे एम० डी०) ने मुझे तुम्हारे बारे में बताया था कि उन्होंने तुम्हें यहाँ के लिये स्लैक्ट किया है। बहुत खुशी हुई तुम्हारे जैसे नौज़वान को यहाँ पाकर। क्योंकि अभी जब तुम अपने डिपार्टमेंट के लोगों से मिलोगे तो तुम वहाँ अपने को सबसे छोटा पाओगे। यहाँ सभी अपने १५ से २० वर्ष इस ऑफिस में व्यतीत कर चुके हैं। मगर तुम बिल्कुल चिन्ता मत करना मैं एक-२ करके तुम्हारा परिचय सबसे करा दूँगा और आशा है तुमसे उनको और उनसे तुमको बराबर का कॉपरेशन मिलेगा।“ मुझे उनके शब्दों से मन के कोने में बैठे एक डर से तुरन्त ही छुटकारा मिल गया।
अब शुरु हुआ एक-एक करके सभी स्टाफ मेम्बर से परिचय का सिलसिला। ये गुप्ताजी.. ये खान साहब… ये दीक्षित साहब…ये थामस…ये कुलतार सिंह आदि-२। पहले दिन मुझे उन सबके चेहरे और नाम आदि को अपने स्मरण में रखना बहुत मुश्किल था मगर मैं मुस्कराहट से उनके अभिवादन को स्वीकार करता गया। इसी मुलाकात के सिलसिले में पता नहीं कब पूरा दिन निकल गया। इसी तरह धीरे-धीरे मैं गुप्ता जी, शर्मा जी आदि के नाम और चेहरे से परिचित होना शुरु हो गया। अब तो मेरी जुबान पर भी गुप्ता जी आज़ की बैंक पोज़ीशन क्या है? शर्मा जी आपकी रिपोर्ट अभी नहीं मिली, जल्दी कीजिये मुझे वो रिपोर्ट जोशी जी को देनी है। सेठ जी कभी भी माँग सकते हैं उस रिपोर्ट को जोशी जी से…आदि बातें अभ्यस्त हो चुकी थीं।
कभी ऑडिट कभी ईयर एंड रिपोर्ट आदि की व्यस्तताऐं रहतीं तो जोशी जी मेरे केबिन में आकर पीठ थपथपाते रहते और कहते- “बेटा तुम्हारे आने के बाद मुझे बहुत आराम हो गया है। पहले मैं रात में रोज़ देर तक इन कामों को निपटाने में ही लगा रहता था।“ मैं भी उन्हें उत्तर में कहता- “सर आप ही मेरे गुरु हैं जो आपने मुझे इन सब अनुभवों से अवगत कराया और मुझे इस योग्य समझा कि मैं इन कामों को आपके अनुरूप कर सकूँ।“ वह कहते कि- “मैंने अपने ३० साल के कार्यकल में पूरे स्टाफ को अपने परिवार की तरह ही समझा है और ईश्वर ने मेरा हमेशा साथ दिया है कि मुझे भी बदले में अच्छे लोग ही मिले हैं।“
मुझे ऑफिस के बाकी लोगों से जोशी जी द्वारा उन्हें समय-२ पर की गयी मदद संबंधी बातें पता चलती रहीं और मेरे मन में भी जोशी जी के प्रति एक अलग सी आदर भावना रहने लगी। मेरी छोटी मोटी गलतियों को भी जोशी जी ने हमेशा नज़र अंदाज़ किया था और मुझे बुलाकर प्यार से समझा दिया करते थे। उन्होंने मुझे ऑफिस के काम की सभी बारीकियों से जल्दी ही अवगत करा दिया था। सही मायने में हम उन्हें 'मैन ऑफ प्रिंसिपल' कह सकते थे। जोशी जी का परिवार भी उन्हीं के समान बहुत सौम्य और मृदुभाषी था। अक्सर ऑफिस पार्टियों में उनके परिवार से मिलने का मौका मिलता रहता या उनकी अनुपस्थिति में उनके फोन बज़ने पर, उठाने पर परिज़नों से परिचय का मौका मिलता रहता था।
जोशी जी अपने स्वभाव के कारण न सिर्फ अपने ऑफिस में ही बल्कि बैंक एवं उन सभी लोगों में लोकप्रिय थे जिनसे रोज़मर्रा में हमारे ऑफिस का संपर्क रहता था। स्टाफ में जो गुप्ताजी थे वो १५ वर्ष का अनुभव लिये हुये थे मगर पूरी तरह जोशी जी के आदेशों का निर्वाह करने को ही अपने कार्य का हिस्सा मानते थे। जोशी जी हमेशा गुप्ता जी को प्यार से समझाते थे कि- “गुप्ताजी क्यों हमेशा मेरे इशारों पर ही काम को आगे बढ़ाते हो, कभी खुद अपनी बुद्धि से भी डिसीज़न लेने की सामर्थ्य लाओ। मैं हमेशा ही नहीं रहने वाला तुम्हें रास्ता दिखाने के लिये। अब खुद भी कुछ करना सीखो” बदले में गुप्ताजी हमेशा हँसकर एक ही जवाब में जोशी जी को चुप कर देते कि- “हम तो आपके हनुमान हैं आप जहाँ जायेंगे हम भी वहाँ चले चलेंगे”। जोशी जी भी सिर हिलाकर मुस्कराकर बस इतना ही कह पाते कि- “गुप्ता तेरा मैं क्या करूँ”।
सेठ जी को भी हमारे डिपार्टमेंट में जोशी जी के होते हुये कभी किसी जानकारी के लिये किसी भी डिपार्टमेंट के अन्य व्यक्ति से सीधे संपर्क करने की जरूरत ही नहीं हो पाती थी। जोशी जी को भी मैंने कभी छुट्टी आदि लेते हुए ही नहीं देखा था।बल्कि जोशी जी तो रविवार में भी ऑफिस आने के अवसर से नहीं चूकते थे। वह कहते कि- “बेटा अब मैं ऑफिस के काम में इतना रम गया हूँ कि कोई काम अधूरा होने पर मैं छुट्टी के दिन भी घर में नहीं बैठ पाता”। माना कि मिसेज़ जोशी जी को उनकी इस बात से हमेशा शिकायत ही रहती थी मगर वह भी जोशी जी के स्वभाव से अच्छी तरह परिचित थीं कि वह ऐसे में किसी की भी नहीं सुनने वाले और वह उनकी इस क्वालिटी की कद्र भी करती थीं।
मुझे अच्छी तरह याद है वह सोमवार का दिन था। हफ्ते का पहला दिन होने के कारण सोमवार हमेशा ही बहुत बिज़ी डे हुआ करता था। हमेशा की तरह हम सब ठीक ८ बज़े ऑफिस के रिस्पेशन पर थे। जोशी जी हमसे १०-१५ मिनट पहले ही आया करते थे। ऊपर जाकर जोशी जी को मॉर्निग बोलने गया तो जोशी जी कुछ चिन्तित से लग रहे थे। बोले- “बेटा मेरे बड़े भाई के बेटे का आज़ सुबह ही बहुत सीरीयस एक्सीडेंट हो गया है और आज़ ही दूसरी कंपनी से मेरी बहुत जरूरी मीटिंग है। मैं समझ नहीं पा रहा कि मैं क्या करुँ, मुझे हॉस्पिटल भी जाना है और मीटिंग भी जरूरी है”। मैंने तुरंत उनसे कहा कि- "सर आप चिन्ता न करें में मीटिंग में चला जाऊँगा। वैसे भी मीटिंग की फाईल मैंने ही तैयार की है इसीलिये मुझे आईडिया तो है ही बाकि आप मुझे ब्रीफ कर दें”। जोशी जी के चेहरे पर आयी चिन्ता की लकीरें इस बात से कुछ कम होती दिखाई दी। बोले- “ठीक है फिर ऐसा करते हैं कि अभी ही निकलते हैं। तुम मेरे साथ चलो मुझे हॉस्पिटल छोड़ने के बाद मेरा ड्राइवर तुम्हें मीटिंग प्लेस पर छोड़ देगा और रास्ते में मैं तुम्हें मीटिंग के बारे में भी गाईड कर दूँगा”। उन्होंने पूरे स्टाफ के लोगों को बुलाकर ये जानकारी दी और सबको उनका काम समझा कर चलने को कहा। मैं और जोशी जी तो ऑफिस से निकल गये बाद में सेठ जी के पी० ए० की कॉल जोशी जी के लिये आयी तो स्टाफ मेम्बर्स ने बताया कि जोशी जी अभी हॉस्पिटल गये हैं और २ घण्टे बाद लौटेगें। सेठ जी को भी शायद कुछ ज्यादा ही अर्जेंट काम था, उनके पी० ए० की कॉल फिर आई और पूछा कि- “बैंक के काम कौन डील करता है”। गुप्ता जी का नाम लेने पर उन्होंने तुरंत गुप्ता जी को ऊपर मिलने के लिये बुलाया। गुप्ता जी बहुत सहमे हुये से सेठ जी से मिलने के लिये लिफ्ट से टॉप फ्लोर के लिये अपनी बगल में अपनी फाईल दबाये हुए निकले। सेठ जी ने कम शब्दों में गुप्ता जी से कहा कि- “फलां व्यक्ति के नाम १० लाख का चैक अभी बनाकर उसे आज़ ही उनके एकाउंट में ट्रांसफर कराना है”। गुप्ता जी सीधे नीचे आकर अपनी सीट पर बैठ गये और अस्त व्यस्त कागज़ों को सभाँलते हुये जोशी जी के लौटने का इन्तज़ार करने लगे। माना की उन्होंने उससे संबंधी सभी कागज़ भी जोशी जी को दिखाने के लिये ढूँढ निकाले थे। १० मिनट बाद फिर सेठ जी के पी० ए० की कॉल गुप्ताजी के लिये आयी। गुप्ता जी घबराये हुये से फिर लिफ्ट की ओर दौड़े और सेठ जी के सामने पहुँच गये। सेठ जी ने गुस्से से कहा कि- "चैक कहाँ है?" घबराहट में गुप्ता जी ने ब्लैंक चैक बुक सेठ जी की ओर बढ़ायी। अब ब्लैंक चैक देखकर सेठ जी का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया और अंग्रेज़ी में गुप्ता जी को डाँटते हुये अपने पी० ए० को बुलाया और कहा कि- "इस आदमी का अभी हिसाब करो और कल से मैं इसका चेहरा ऑफिस में न देखूँ।" गुप्ता जी के तो जैसे पैरों के नीचे से जमीन ही निकल गयी। सॉरी सर के अलावा उनके मुँह से कुछ भी नहीं निकल सका और वो वापस अपनी सीट पर लौटकर फफक-फफक कर रोने लगे। तभी जोशी जी हॉस्पिटल से वापस लौट आये और लोगों ने उन्हें स्थिति से अवगत कराया। जोशी जी ने किसी की भी न सुनते हुये सीधे सेठ जी के केबिन की ओर दौड़ लगायी, उन्होंने अपने भतीज़े की चिन्ता को भी भुला दिया और सेठ जी के केबिन को नॉक किया। सेठ जी उन्हें देख तुरंत अन्दर बुलाया। जोशी जी ने सेठ जी से गुप्ता जी द्वारा किये गये कृत्य पर माफी माँगी और उनको जॉब से न निकालने का आग्रह किया। मगर सेठ जी तो बस किसी की बात सुनने के मूड में ही नहीं थे। उन्होंने कहा- "जोशी गुप्ता की पैरवी करने की जरूरत नहीं है मैं जो डिसीज़न ले चुका सो ले चुका। अब वो नहीं बदल सकता। जोशी जी ने सेठ जी से पूछा कि- "यदि गुप्ता जी की गलती न हो तो?"
सेठ जी बोले कि- "फिर जिसकी गलती है उसे जॉब से जाना होगा”। जोशी जी ने तुरंत ही मेज़ पर पड़े एक कागज़ पर कुछ लिखा और सेठ जी को दे दिया। सेठ जी पेपर को पढ़कर स्तब्ध रह गये। बोले- "जोशी जी ये क्या मज़ाक है?" जोशी जी बोले -"यही सही है गुप्ता ने मुझसे मोबाईल पर इस चैक के बारे में पूछा था और मैंने ही उसको मेरे आने तक इंतज़ार के लिये कहा था इसलिये मैं ही गुनहगार हूँ और इसीलिये मैं रिज़ाइन दे रहा हूँ।" सेठ जी तो अच्छी तरह सच जानते थे कि जोशी जी जो कह रहे हैं गलत है और गुप्ता जी को बचाने के लिये ही ये ऐसा कर रहे हैं। मगर अपनी ईगो के सामने सेठ जी को जोशी जी का रिज़ाईन मजूंर करना पड़ा। जब यह बात सेठ जी के केबिन से हमारे फ्लोर तक पहुँची तो सारे डिपार्टमेंट में जैसे सन्नाटा छा गया और जोशी जी के लौटने पर सब लोगों ने उनको घेर लिया। इसी बीच मैं भी खुशी-खुशी मीटिंग खत्म करके ऑफिस लौटा तो सब बदला हुआ पाया। जोशी जी स्टाफ के लोगों से घिरे बैठे थे और मुझे भी इशारे से अपने करीब की कुर्सी पर बिठा लिया। गुप्ता जी तो बार-बार रोते हुये कह रहे थे-"सर आपने ऐसा क्यों किया? मुझ जैसे नालायक के लिये आपने अपनी जॉब को दाँव पर लगा दिया।" जोशी जी ने मुस्कराते हुये कहा- "गुप्ता अब तुम काम करना सीख जाओगे। मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे बिना रहने की आदत डालो।" गुप्ता जी बोले-"मैं भी यहाँ नहीं रहने वाला। जहाँ आप जायेंगे मैं भी वहीं जाऊँगा।" जोशी जी बोले- "ऐसी गलती मत करना। अपनी दोनों बेटियों की सोचो तुम्हें उन्हें पढाना लिखाना है, उनकी शादी करनी है, मेरा क्या है, एक बेटा है वह भी बहू के साथ यू० एस० में सैटल्ड है।" सबने बड़े ही भारी मन से जोशी जी को अश्रुपूर्ण विदाई दी। तो ऐसे थे हमारे जोशी जी। उनके जाने के बाद मेरा भी मन उस कंपनी में नहीं लगा और दूसरी जॉब मिलते ही मैंने भी उस कंपनी को छोड़ दिया।
आज सुना है जोशी जी भी यू० एस० में अपने बेटे के साथ परिवार सहित रह रहे हैं और गुप्ता जी को अब बिना ऊँगली पकड़े चलना आ चुका है।

16 अप्रैल 2007

कविता कोश द्वारा सम्मानित

चित्रनामसम्मान चक्रटिप्पणी
डा. भावना कुँअर
कामायनी के हिन्दी यूनिकोड में टंकण के लिये
डा. भावना कुँअर को जयशंकर प्रसाद कृत कामायनी रचना को हिन्दी यूनिकोड में टंकित कर कविता कोश में जोडने के लिये कोश द्वारा ग्रंथ सम्मान चक्र से सम्मानित किया जाता है।

३१ मार्च २००७





















इसको देखने के लिये यहाँ क्लिक करें

11 अप्रैल 2007

होली मुबारक !!!

आप सबको परिवार के सभी सदस्यों सहित होली की हार्दिक शुभकामनाएँ





28 फ़रवरी 2007

हाज़िर हैं एक ब्रेक के बाद राकेश जी के लिये:

राकेश जी आपके प्रश्नों के उत्तर कविता में ही देने का एक छोटा सा प्रयास किया है-

प्रश्न १- क्यों लिखते हो?

उमड़-घुमड़कर भाव हृदय के
शब्द रूप जब लेते हैं
तभी लेखनी को संग लेकर
काग़ज़ पर रच देते हैं।


प्रश्न २-क्या लिखने को प्रेरित करता?

दुखी व्यवस्था व दानवता
देख कवि मन रोता है
हो प्रेरित उन सबसे ही फिर
शब्द बेल को बोता है।


प्रश्न ३-कला पक्ष से भाव पक्ष का कितनी दूर रहा है रिश्ता?

कलापक्ष से भावपक्ष का
रिश्ता बहुत ही गहरा है
बिना भाव के सूनी रचना
जैसे पानी ठहरा है।


प्रश्न ४-कितना तुम्हें जरूरी लगता,लिखने से ज्यादा पढ़ पाना?

लिखने से ज्यादा पढ़ पाना
ज्ञान में वर्धन करता है
अच्छी रचनाओं को पढ़कर
लेखन साथ निखरता है।



प्रश्न ५-मनपसंद क्यों विधा तुम्हारी, और किताबों का गुलदस्ता?

बाल्यकाल से ही मुझ पर तो
कविताओं का रहा प्रभाव
'कामायनी' व 'मधुशाला' से
सदा रहा है बहुत लगाव।


और जैसी की प्रथा है मैं भी प्रथा का पालन करते हुये कुछ प्रश्न निम्न सदस्यों से पूछना चाहूँगी-

प्रश्न १- साहित्यिक जगत से जुड़ा हुआ कोई अनुभव बतायें?
प्रश्न २- किस साहित्यिक विभूति से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ और मिलने की इच्छा रही?
प्रश्न ३- किस उम्र के पड़ाव से लिखना प्रारम्भ किया और क्यों?
प्रश्न ४- होली उल्लास को लिये हुये आपके दरवाजे पर दस्तक दे रही है उस सन्दर्भ में कुछ लिखें?
प्रश्न ५- युवा वर्ग में अपनी भारतीय संस्कृति को जीवित बनाये रखने एवं उनमें साहित्यिक अभिरुचि पैदा करने के लिये क्या प्रयास होने चाहियें?
प्रश्न ६- अपनी रुचि की ५ साईट जो ब्लॉग से अलग हों बतायें?

जिनको प्रश्नों के उत्तर देने हैं वो हैं-

१- अनूप भार्गव जी

२- अनुराग मिश्रा जी

३- शैलेश भारतवासी जी

४- सोनल जी

५- नीरज दीवान जी

चमत्कार हो गया ! भई चमत्कार...

आज सुबह जैसे ही मेरी आँख खुली तो सीधे आकर लैपटॉप ऑन किया। दो दिन छुट्टी में आराम जो कर लिया था, ना ही कॉलेज जाने की चिन्ता रही, न ही बच्चों को स्कूल भेजने की। बस आराम से सैर सपाटा और अपनी शादी की सालगिरह कैसे मनाई जाये? कौन से होटल में खाना खाया जाये? किस-किस को बुलाया जाये? इन्हीं योजनाओं को बनाने में शनिवार और इतवार कब बीत गया पता ही नहीं चला।

अब तो सोमवार का प्रस्थान हो चुका था मैं जल्दी-२ कॉलेज को तैयार हुई बच्चों को तैयार किया और पतिदेव सहित सब अपने-अपने गन्तव्य पर चल दिये,परन्तु इतनी भाग दौड़ में भी आदतन लैपटॉप को नहीं भूली धड़ाधड़ एक तरफ मेल खोली तो दूसरी तरफ एक-एक करके ४-५ पेज़ खोल डाले ब्लॉग पढ़ने के लिये जैसे ही पहला ब्लॉग खोला अरे ये क्या ! एकदम नया सा…… एक, दो, तीन.......चार, पाँच….. छह …लगता है अब नया चलन आ गया है चिट्ठाजगत में, माधुरी दीक्षित हिट्स गानों को लिखने का, बस फिर क्या था पढ़ते गये पढ़ते गये पर ये क्या अन्दर तो कुछ ओर ही नज़ारा था। देखते क्या हैं कि समीर जी कटघरे में खड़े थे और 'जीतू' जी ओर 'रचना' जी उन पर प्रश्नों की बौछार लगा कर उनको पसीना-पसीना किये दे रहे थे। अभी समीर जी एक सवाल का जवाब दे ही पाते हैं कि दूसरा दाग दिया जाता है। भई वाह! ये भी खूब रही हम मन ही मन बहुत खुश हो रहे थे कि आज तो समीर जी बहुत अच्छे फँसे, अब देखते हैं कि वो अपनी जान कैसे छुड़ाते हैं, पर ये क्या!!!!!!!! समीर जी तो सारे प्रश्नों के लाजवाब उत्तर देकर निकल लिए पतली गली से।

अब हम जैसे ही टिप्पणी पढ़ने के लिये नीचे देखने लगे तो हमारा मुहँ आश्चर्य के मारे खुला का खुला ही रह गया अरे भई ये क्या !हमने तो कोई टिप्पणी दी ही नहीं फिर हमारे नाम की टिप्पणी देने की किसकी हिम्मत हुई बात कुछ समझ नहीं आ रही थी लगा कि हम अभी भी नींद में ही हैं जल्दी से जाकर फिर से मुँह पर पानी के छींटे मारे और फिर पढ़ना शुरु किया, परन्तु हमें हमारा नाम फिर से दिखाई दिया डॉ भावना कुँवर माज़रा क्या है समझने के लिये हमने 'माऊस' को ऊपर नीचे किया तो जो लाईन समझ में आई वो ये थी-"और जिन्हें मैं इसमे फंसाना चाहता हूँ कि जवाब दें वो हैं”:

आशीष श्रीवास्तव: अंतरीक्ष वाले

लक्ष्मी गुप्ता जी

रंजू जी

प्रमेन्द्र प्रताप सिंह

डॉ भावना कुँवर


बस ये सबसे नीचे जो नाम था वो हमारा ही था। अब दिमाग में घण्टियाँ बजनी शुरु हो गयी कि क्या किया जाये? बस फिर तो लैपटॉप बन्द किया और तैयार होकर कॉलेज को निकल पड़े पर रास्ते भर ध्यान चिट्ठे में ही लगा रहा, क्लास में भी पढ़ाते वक्त बार-बार वही प्रश्न कानों में गूँजते रहे, जैसे-तैसे वापिस आये और लग गये अपनी शादी की सालगिरह की तैयारी में।

जब होटल से वापिस घर आये तो रात के १२ बज चुके थे पर हमने भी ठान रक्खी थी कि बिना जवाब दिये हम नहीं सोने वाले चाहे रातभर जागकर ही सही, फिर तैयार होकर निकल पड़ेगें अपने कॉलेज के लिए तो बस लिखना शुरु किया। अब रात के २ बजकर ३० मिनट हुए हैं और हमारा लेख है कि पूरा होने का नाम ही नहीं लेता तो सोचा क्यों न बचकर निकल लिया जायें लेकिन फिर आत्मा से आवाज़ आई नहीं भागने की तो कोई वजह नहीं है ये तो हमारा चिट्ठा परिवार है जो हमारे बारे में कुछ जानना चाहता है तो अच्छा है न इस परिवार का प्यार और निकटता और ज्यादा बढ़ जायेगी, जो कि आज़कल बहुत करीबी रिश्तों में भी ढूँढ़े से भी नहीं मिलती।

तो चलिये शुरु करते हैं - समीर जी के प्रश्नों के उत्तर-


१.आपके लिये चिट्ठाकारी के क्या मायने हैं?
२.क्या चिट्ठाकारी ने आपके जीवन/व्यक्तित्व को प्रभावित किया है?
३.आप किन विषयों पर लिखना पसन्द/झिझकते है?
४.यदि आप किसी साथी चिट्ठाकार से प्रत्यक्ष में मिलना चाहते हैं तो वो कौन है?
५.आपकी पसँद की कोई दो पुस्तकें जो आप बार बार पढते हैं.


सही मायने में चिट्ठा ही ऐसा सरल एवं सुलभ माध्यम हाथ लगा है जिसके माध्यम से अपने को दूसरे तक पहुँचाने एवं दूसरों को अपने तक बहुत ही आसान हो गया है। नये-२ विचारों एवं रचनाओं से अवगत होने का अवसर भी प्राप्त हुआ है, और सबसे बड़ी बात इसने देश और विदेश की दूरी को भी कम कर दिया है।
चिट्ठा तो जैसे अपनी दिनचर्या का अभिन्न अंग बन चुका है। कम शब्दों में यही कहना चाहूँगीं कि अपनी जीवन शैली पर चिट्ठे ने ऐसा प्रभाव छोड़ा है कि कुछ न कुछ नया करने की इच्छा सदैव मन में बसी रहती है। परिणाम स्वरूप कुछ नये विचार मन में हिचकोले खाते रहते हैं और अलग-अलग विधाओं में प्रस्फुटित होते रहते हैं।
ज्यादा अभिरुचि तो गंभीर एवं ज्वलन्त विषयों पर लेखन की है। इसके अतिरिक्त श्रृंगार भी अपना प्रिय विषय है जिसका रंग आप मेरी अधिकतर रचनाओं में देख सकते हैं।

मैं प्रकृति को अपनी रचनाओं में सम्मिलित किये बगैर कुछ न कुछ अधूरापन महसूस करती हूँ और ‘हाइकु’ विधा ने मुझे इस रूप को साकार करने में पूर्ण सहयोग प्रदान किया है, इसीलिये मेरी अधिकतर हाइकु रचनायें प्रकृति पर ही आधारित हैं जिसे आप मेरी आने वाली पुस्तक (हाइकु-संग्रह) "तारों की चूनर" में देख व पढ़ सकते हैं।

जब भी समाज में कुछ नया घटित होता है जो को मन को भीतर तक झकझोर देता है ऐसी स्थिति में अपने भावों को शब्दों का रूप देकर आप तक पहुँचाने का प्रयास करती रहती हूँ ताकि अपनी अकेली आवाज़ को आप सबकी आवाज़ के साथ मिला सकूँ, और वह एक ऐसी बुलंद आवाज़ बन सके जो ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति पर विराम चिन्ह लगा सके। मैं तो एक ऐसे ही स्वप्न को चिट्ठे के माध्यम से साकार करने के लिये प्रयत्नरत हूँ।

राजनीति मुझे एक ऐसा नीरस विषय लगता है जिसका अध्ययन और लेखन मुझे बहुत ही नापसन्द है। चिट्ठा उस समय अभिशापित नज़र आता है जब व्यक्ति एक दूसरे के प्रयासों की सराहना करने की बजाय उनकी टाँग खींचने में ज्यादा रुचि लेते हैं, कितना अच्छा हो कि टाँग खींचने की बजाय कुछ अच्छी सलाह दी जाये जिससे उनकी लेखनी में और ज्यादा निखार आये जैसा कि बहुत लोग करते भी हैं, इससे लेखक\ लेखिका का मनोबल भी बढ़ता है।

जहाँ तक सवाल आता है चिट्ठाकारों से मिलने का तो मेरी दिली इच्छा तो ये है कि यदि किसी एक मंच पर सभी चिट्ठामित्रों से रुबरू होने का अवसर मिले तो वो मेरे जीवन का सबसे सुखद क्षण होगा, लेकिन साथ-साथ उन चिट्ठाकारों से मिलने से बचना चाहूँगी जिन्हें मुझसे मिलने में लेशमात्र भी रुचि न हो।


अध्ययन में तो मेरी विशेष रुचि है इसका भरपूर अवसर मुझे मेरे शोधकार्य के दौरान प्राप्त हुआ। जिसमें मैंने लोकप्रिय एवं उभरते रचनाकारों को साथ-साथ पढ़ा। लोकप्रिय रचनाकारों में जैसे -'गोपालदास नीरज', 'बालस्वरूप राही', 'दुष्यन्त कुमार', 'बलबीर सिंह रंग' एवं 'डॉ० कुअँर बेचैन' जी आदि। किन्तु कुछ पुस्तकें जो मुझे बाल्यकाल से ही प्रभावित करती आयीं हैं उनमें "कामायनी"( जयशंकर प्रसाद), और "मधुशाला" (हरिवशं राय बच्चन) प्रमुख हैं। इसलिये "कविता कोष" में मैं "कामायनी" के सभी अध्यायों को "बारहा" में टंकित करने में प्रयत्नरत हूँ।

आशा है समीर जी आपके सभी प्रश्नों के उत्तर देने का मेरा प्रयास तृण मात्र पूर्ण हो सका होगा।

अब आप इज़ाजत दीजियेगा ४ बज चुके हैं थोड़ा सा सोना है फिर कॉलेज जाना है और आकर फिर पाँच सवालों के जवाब देना है क्योंकि जो आपने हमारा हाल किया है वही राकेश जी ने भी किया हुआ है अब उनको हम नाराज़ तो नहीं कर सकते ना कल उनके लिये हम ४ बजायेंगे, क्योंकि एक तो उनको जवाब कविता में ही देने हैं दूसरे हमारी टाईपिंग स्पीड़ जरा कम है तो समय तो लगेगा ही ना। फिर मिलेंगे राकेश जी के सवालों के साथ।

7 फ़रवरी 2007

सच्चाई को बयान करते हुए चन्द शेर



"हैं रिसते दिल के जब छाले, बहुत ही टीस उठती है

जिधर देखो ये दुनिया तो, लिए बस सूई दिखती है।"



"था मैंने दिल की क्यारी को, लगाया चाव से लेकिन

मगर गुज़रा वहाँ से जो, उसी ने बो दिये काँटे।"



"ये माना फूल में है नूर भी, खुशबू भी है उसमें

मगर सच ये भी है कि फूल के ही संग हैं काँटे।"



डॉ० भावना

28 जनवरी 2007

शोध प्रबन्ध का विमोचन



अन्तर्राष्टीय हिन्दी उत्सव के अन्तर्गत- १३ जनवरी २००७ में रात्रि ७.४५ पर त्रिवेणी सभागार, नई दिल्ली में मेरे शोध प्रबन्ध का विमोचन हुआ जिसका विषय है -"साठोत्तरी हिन्दी गज़ल में विद्रोह के स्वर एवं उसके विविध आयाम"



16 जनवरी 2007

मेरे द्वारा बनाई कुछ पेन्टिंग

मेरे द्वारा बनाई कुछ पेन्टिंग देखिए और अपनी प्रतिक्रिया दीजिए:

8 जनवरी 2007

HAPPY NEW YEAR TO YOU FROM BHAWNA, PRAGEET, KANUPRIYA AND AISHWARYA !

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MAY ALL YOUR WISHES COME TRUE

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31 दिसंबर 2006

दिल के दरमियाँ की ओर से आप सबको नव-वर्ष हार्दिक शुभकामनाएँ

ओढ़े हुए है
कोहरे की चादर
नूतन वर्ष।


सर्द हवाएँ
करती आलिंगन
नव-वर्ष का।



पछीं समूह
गाये मधुर गीत
नये साल के।




करें स्वागत
खुशियाँ ले के हम
नव-वर्ष का।




ये नव-वर्ष
प्रेम संदेश लिये
खड़ा द्वार पे।



डॉ० भावना कुँअर

26 नवंबर 2006

फुरसत से घर में आना तुम



फुरसत से घर में आना तुम

और आके फिर ना जाना तुम


मन तितली बनकर डोल रहा

बन फूल वहीं बस जाना तुम ।


अधरों में अब है प्यास जगी

बन झरना अब बह जाना तुम ।


बेरंग हुए इन हाथों में

बन मेहदी अब रच जाना तुम ।


पैरों में है जो सूनापन

महावर बन के सज जाना तुम ।


डॉ० भावना